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Showing posts from June, 2019

हम उत्सवधर्मी!...

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                                  हम उत्सवधर्मी!...               हमारे समाज की यह एक विशेष बात है कि हम अपनी सदियों पुरानी परंपराओं को छोड़ने को तैयार नहीं होते। उससे नुकसान हो या फ़ायदा- हम ज़्यादा नहीं सोचते!...यूरोपीय देशों के लोगों और हममें यह अंतर आसानी से देखा जा सकता है। राहुल सांस्कृत्यायन इसे 'मानसिक गुलामी' कहते हैं। क्या यह सही है?... https://youtu.be/cQ9jkepzJiE ऐसी परंपराओं में ही एक परंपरा ज़िंदगी भर की कमाई से पाई-पाई जोड़कर धर्म-कर्म, तीर्थ यात्रा, भागवत कथा है। मरते-मरते भी एक साधारण हिन्दू व्यक्ति की यह ख्वाहिश रहती है कि वह अपना 'अगला जीवन' भी सार्थक करने का इंतजाम करके मरे!..         पर यह ख्वाहिश मात्र इतनी नहीं है। कम से कम जीवन में एक बार वह सामाजिक तौर पर प्रतिष्ठा पा सके, उसके घर नाते-रिस्तेदार आ जाएं, कुछ खान-पान, मनोरंजन हो, यह विचार भी इस परंपरा के साथ जुड़ा है।... क्या यह सब, ये अपूर्ण ख्वाहिशें कोई बु...

कुनिथा लोक-नृत्य

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                                               कर्नाटक का                                     कुनिथा लोक-नृत्य हमारे देश के लोकगीत और लोकनृत्य  जनता की धरोहर हैं।  इन्हें बचाए रखना, इन्हें प्रचारित-प्रसारित करना  हम सबकी ज़िम्मेदारी है।         दरअसल, हमारे लोकजीवन और लोक-संस्कृति को  विकृत करने ,ध्वस्त करने या फिर remix के नाम पर  नष्ट कर देने की प्रक्रिया  उदारीकरण-वैश्वीकरण की शुरुआत के साथ  पिछली शताब्दी में तेज कर दी गई। ... ताकि कम्पनियों की गुलामी के साथ  उनकी उपभोक्ता-संस्कृति को भी  लोग स्वीकार कर लें। ... हम देखते हैं कि  साम्राज्यवादी शक्तियाँ इसमें  काफी हद तक सफल भी हो गई/रही हैं।... कैसे बचेगा हमारा लोकजीवन, हमारी लोक-संस्कृति?  यह सवाल हम सबके सामने है।  हमा...

कर्नाटक की एक पूजा

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                        धर्म-प्राण देश, विचित्र पूजाएं! https://youtu.be/hOW9xNbNnG8 हमारा देश एक धर्म-प्राण देश है! देश के विभिन्न हिस्सों में यहां तरह-तरह के धर्म, भगवान और पूजा-पद्धतियाँ पाई जाती हैं!.. इन सबमें विभिन्नता है, विचित्रता है!.. एकता भी है, एकरूपता भी है!... है न विचित्र? विभिन्नता भी, एकरूपता भी!... तरह-तरह के रंग-रूप और कलात्मकता वाले मंदिरों के साथ भगवान और उनकी पूजाओं के स्वरूप भी विविध-वर्णी हैं! मन्दिरों और भगवान के सामने भिक्षावृत्ति की विचित्र प्रवृत्ति भी जुड़ी है!... पता नहीं क्यों?... आपको पता हो तो टिप्पणी जरूर लिखें!... क्या यह विरोधाभास है?...या इसी का हिस्सा?... यह सदियों का सवाल है!... आज भी है!... ★★★★★