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Showing posts from 2020

केंद्रीय श्रमिक संगठनों का व्यापक प्रदर्शन

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प्रकाशनार्थ:           कामगारों की बढ़ती दुर्दशा के खिलाफ़                      देशव्यापी विरोध प्रदर्शन                      श्रम अधिकारों पर हमले के खिलाफ सभाएं दिल्ली:          श्रम कानूनों के खिलाफ  आहूत  व मासा द्वारा समर्थित देशव्यापी प्रदर्शन  के दौरान इंक़लाबी मज़दूर केंद्र,मज़दूर एकता समिति, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र,घरेलू कामगार महिला संगठन व परिवर्तनकामी छात्र संगठन के कार्यकर्ताओं ने मज़दूर बस्ती शाहबाद डेरी में जुलूस निकाला और जगह जगह सभाएं कीं।  सभाओं के दौरान वक्ताओं ने जोशो खरोश के साथ श्रम कानूनों में संशोधन के खिलाफ नारे लगाए । सभा में वक्ताओं ने मोदी सरकार को पूंजीपतियों के इशारों पर नाचने का आरोप लगाते हुए श्रम कानूनों में संशोधनों को लॉक डाउन और मंदी से उत्पन्न संकट का बोझ मज़दूरों पर डालने की कवायद करार  दिया। वक्ताओं ने इसे आज़ाद भारत में मज़दूर वर्ग पर सबसे बड़ा हमला बताया।वक्ताओं ने मज़दूर...

रहम की उम्मीद, किससे?...

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आप उनसे रहम की कोई उम्मीद नहीं रख सकते जो मानते हैं कि सुख-दुःख सब पूर्वजन्म के कर्मों का फल है!..यह भी कि दुखी दुख लायक ही है और सुखी सुख के ही लायक! पूंजी के इस दर्शनशास्त्र को धर्म कहा जाता है।  आप विश्लेषण करेंगे तो पाएंगे कि अपराधियों का ऐसा ही नीतिशास्त्र  होता है जिसकी तराजू पर वे पूरे ब्रह्मांड को तौलते हैं। आप उसे अनीति-अधर्म-मूर्खता कहें-समझें तो उनकी बला से!..वे आपको भी कुछ नहीं सेटते!  ऐसा नहीं कि ये अनपढ़ हैं और इसे अनीति मानते हुए भी नीतिशास्त्र समझते हैं। ऐसा नहीं है, घण्टे भर पूजा करने के बाद वे मान लेते हैं की पापयोनि में पैदा हुए इस प्राणी को प्रभु समझते हैं और वह जो कुछ करता है उन्हीं के इशारे पर करता है। आखिर उनकी मर्जी के बगैर एक पत्ता भी तो नहीं हिल सकता!... इसलिए, अगर लॉकडाउन के चलते असहाय लोग छटपटाते हुए अपने घर पहुँचने की जद्दोजहद कर रहे हैं, रोते-चीखते बच्चे आपको भी रुला रहे हैं अथवा पैसा और/या शराब के नशे में नशेड़ी खाली सड़क को अपने बाप की  मान लोगों को रौंद रहे हैं तो इसे अस्वाभाविक मत मानिए! मूर्खों और अंधविश्वासियों को जब पूँजी का बल मिलता...

कोरोना_टाइम्स में जीवन की कल्पना

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                                और हम जिंदा हैं!...                                                 -  अशोक प्रकाश                                           ज्ञात इतिहास की पूरे संसार के स्तर पर घटित हुई यह एक अनोखी घटना है!....कुछ-कुछ विज्ञान-कल्पना की कहानियों जैसी या मिथकों में उद्धृत अजूबे कारनामों जैसी!...स्वर्ग-नरक की कल्पनाओं के भी ऐसे ही न जाने कैसे-कैसे किस्से गढ़े गए हैं। जैसे उनको सच मानने वालों की कमी नहीं है, वैसे ही इतिहास के इस सन्नाटे के रंग-बदरंग किस्सों की भी कमी नहीं है! आखिर हो क्या रहा है ये?... ऐसा लगता है जैसे हम किसी दूसरी दुनिया में आ गए हों!..लगता है जैसे यह हमारी वह दुनिया नहीं जिस पर एक मनुष्य के रूप में हमें सुकून महसूस मिलता था!... लगता...

कार्ल मार्क्स, मार्क्सवाद और उनके विरोधी

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            कार्ल मार्क्स, मार्क्सवाद और उनके विरोधी                                          हम देख रहे हैं कि आज पूरी दुनिया का शासकवर्ग आज या तो मार्क्सवाद को एक फेल विचारधारा मानता है या मार्क्सवाद की अपनी पूंजीवादी व्याख्या को सही मानता है। यहाँ तक कि तथाकथित 'समाजवादी' सरकारों द्वारा भी अपने 'सुधार' कार्यक्रमों और तत्सम्बन्धी नीतियों को इस तरह निर्मित किया जा रहा है कि वह जनता को देखने में तो समाजवादी लगे किन्तु वास्तविक रूप में पूँजीवादी ढर्रे पर ही चले। जब मार्क्सवादी समाजवाद के अकाट्य तर्कों को व्यवस्थाएं खण्डित न कर सकीं और जनता का इस विचारधारा पर विश्वास दृढ़तर होता गया तो शासकों ने यह छद्मनीति अपनाकर जनता को भ्रमित कर मार्क्सवाद से दूर करने का प्रयास किया। यह प्रयास आज और तेज हो गया है। लेकिन जैसे-जैसे पूँजीवादी विचारधारा का संकट बढ़ता जा रहा है और उसका साम्राज्यवादी स्वरूप भी इस संकट को हल करने में बुरी तरह विफल हो रहा है, वैसे-वै...

चीनी #कोरोना_वायरस

         ⚫ चीनी #कोरोना_वायरस पर एक देसी विचार ⚫ 🔴 चीनी कोरोना से डरना बेकार है ! कोरोना तो वैसे ही पिलपिला है ! ठंडे देश से आया ठंडा वायरस ! एकाध हफ़्ता और रुक जाइये ! ग़ुस्सैल सूरज महाराज चढ बैठेंगे इस पर ! चीं निकल जायेगी इसकी ! वैसे भी कोरोना में दम नहीं कि वो हिंदुस्तानियों को मार सके ! हमने ये ज़िम्मेदारी टीबी और मलेरिया को सौंप रखी है ! टीबी और मलेरिया के होते हम किसी विदेशी वायरस से मर जाये ये स्वदेशी की भावना के ख़िलाफ़ है ! टीबी- मलेरिया की दवा ढूँढ़ी जा चुकी और कभी- कभार सरकारी अस्पतालों में मिल भी जाती हैं ! आदमी पूरा कोर्स कर लें तो ठीक भी हो जाता है, इसके बावजूद जब हम ठान लें और हमारे डॉक्टर हमारा मरना तय कर ही दें तो हम बतौर बहाना इन्हीं बीमारियों को चुनते है !  हर साल मलेरिया से दो लाख हिंदुस्तानियों का राम-नाम-सत्य होता है तो साढ़े चार लाख मरने के लिये टीबी को चुनते है ! ये भले लोग इस देश से इन बीमारियों के देशी वायरस से इतना प्यार करते हैं कि बिना हल्ला-गुल्ला किये चुपचाप मर जाते हैं ! देश पर मरने वाले इन जवानों की कहीं कोई चर्च...

हम देश, ये हमरा देश!

                                        धत्तेरे की...                                                   - देसीराम धत्तेरे की पाकिस्तानी निखट्टुओं, तुम्हारा बेड़ा गर्क तो हो ही रहा है और क्या होगा!... मगर ये बताओ, अगर तुम्हारा ये पाकिस्तान नहीं बना होता और हमारा भारत महान आर्यावर्त बना रहता तब तुम्हारा क्या होता?...तुम लोग मूली छीलते कि आलू?... इसीलिए कहे देते हैं कि पाकिस्तान-पाकिस्तान कहकर राजनीति मत करो वरना जनता तुम्हें सचमुच चौराहों पर खड़ा करने लगेगी!..सारा रंग-रोगन भूल जाओगे!! पाकिस्तान न हुआ गंगूबाई का मोहल्ला हो गया जहाँ तुम छिप-छिपकर कुकरम करने जाते हो!... अरे मंगरू की औलाद, क्या कभी हैदराबादी बिरियानी भी खाई है?...चख के देख, तेरा पाकिस्तान ट्रम्पवा के घर पानी माँगने न दौड़े तो कहना!... और सुन, तेरा पाकिस्तनवा तो चुल्लू भर पानी में डूबेगा ही, तु...

केंद्रीय बज़ट में खेती और किसान

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                        केंद्रीय बज़ट में खेती और किसा :           कॉरपोरेट खेती को बढ़ावा, देसी किसानी से छलावा                   - अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति                                             (एआईकेएससीसी)                         बजट ग्रामीण मांग व क्रय क्षमता को प्रोत्साहित नहीं करता जिससे कुल अर्थव्यवस्था सुधर सकती थी! एआईकेएससीसी ने कहा कि बजट ग्रामीण मांग व क्रय क्षमता को प्रोत्साहित नहीं करती जिससे कुल अर्थव्यवस्था सुधर सकती थी। यह कारपोरेट मुनाफे को बढ़ावा देती है।                                               बजट 2020 के प्रस्ताव विदेश...

केंद्रीय बज़ट में शिक्षा

                          #केंद्रीय_बज़ट में #शिक्षा                                              - डॉ.रमेश बैरवा                                               प्रांतीय संयुक्तसचिव                                               (RUCTA), राजस्थान         *केंद्रीय बजट 2020-21 में शिक्षा की भी की गई है घोर उपेक्षा *शिक्षा के व्यावसायीकरण को बढ़ावा देना जनविरोधी कदम  *इस बजट का विरोध करने की शिक्षक साथियों से है पुरजोर अपील मोदी सरकार का  बजट 2020-21 घोर जन विरोधी है। इस बजट में शिक्षा की भी घोर उपेक्षा की गई है,जिस पर शिक्षक समुदाय भी कड़ा विरोध...