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Showing posts from September, 2019

नोटबन्दी की तरह 'भाषा - बंदी'

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अंग्रेज़ी_माध्यम क्यों?                                          भाषा की बंदी                                                             -  रहीम पोन्नाड नोटबंदी की तर्ज पर केरल के एक कवि #रहीम_पोन्नाड ने मलयालम में एक कविता लिखी थी #भाषा_निरोधनम जिसका अनुवाद ए आर सिन्धुऔर वीना गुप्ता ने किया और हमने थोड़ा सा संपादन ! एक नए किस्म का प्रयोग है, भाषा के जरिए नोटबंदी की स्थितियों को फिर से जिया गया है ! #बादल_सरोज की वाॅल से यह कविता हिंदी दर्शन के जरिए प्राप्त हुई है ! आप भी आंनद लें :                                      प्रस्तुति:   गुरचरन सिंह  (फेसबुक- साभार)                ...

प्रेरणा- ऐप बनाम 'शिक्षक की जासूसी'

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'शिक्षक की जासूसी' का   डिज़िटल  संस्करण 'प्रेरणा-ऐप' : वे हमें चोर समझते हैं!... वे, जिनकी चोरी की समानान्तर व्यवस्था पूरे समाज में बदबू की तरह फैली है... वे, जो अंग्रेजों के दलालों के रूप में हमारे देश और उसकी  भोली-भाली जनता को  गुलाम बनाए रखे खून चूसा... वे, जो खुद बंगलों में रहते रहे और झोपड़ियों को खाक में मिलाते रहे... वे, जो रोबदाब मतलब  शोषण और अत्याचार के पर्याय हैं वे,'आखर का उजियारा फैलाने वाले' देश के भविष्य की एक मात्र उम्मीद शिक्षक को चोर समझते हैं!... पूंजी के संचार माध्यमों से शिक्षकों को  बदनाम करने  वालों असली चोरों के असली सरदारों, समाज की चेतना के एकमात्र वाहक शिक्षक भी तुम्हें   अच्छी तरह समझते हैं!...                           - अशोक प्रकाश 'प्रेरणा-ऐप' की प्रेरणादायी परिस्थितियाँ                महान जासूस 008 जेम्स बांड के डिजिटल-अवतार       ...

वोट और शादी...

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                                   वोट और शादी                                          -  गुरचरन सिंह पहले कहा, कुछ दिन की ही बात है, पचास दिन में कर दूंगा सब सही बस ये नोटबंदी की मुश्किलें थोड़ा बरदाश्त कर लो ! फिर कहा, जीएसटी शुरू तो होने दो सब ठीक हो जाएगा धीरे धीरे। फिर कहा गंदगी मत फैलाओ, शौचालय जाओ, भले ही उसमें पानी न हो ! . फिर कहा, योग करो, व्यायाम करो देसी 'दवा दारू' करो भूल जाओ सरकारी अस्पताल, अपनी फिटनेस पर ध्यान दो ! अब फरमाते हैं, गाड़ी में सब काग़ज़ात और जेबों में नोट भर कर निकलना और दारू पीने के बाद तो गाड़ी कतई न चलाना ! भैयाजी हमने तो सिर्फ वोट ही दिया था कोई शादी थोड़ी न की थी, जो हुक्म पर हुक्म दिए जा रहे हो !!!                                  ...

'प्रेरणा' ऐप के खिलाफ दो पोस्ट

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'प्रेरणा' ऐप के खिलाफ़ दो whatsapp पोस्ट:                                         एक चिन्ता हमारे प्रिय शिक्षक साथियों !!! हमारे जो साथी यह समझ रहे है कि प्रेरणा एप्प केवल समय से आने जाने भर के लिए बनी है उनसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया इस विश्लेषण को पूरा पढ़े और सरकार की गहरी साजिश को समझे। देश मे महामन्दी की शुरुआत हो चुकी है। GDP ग्रोथ रेट कम हो गयी है,  अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में मंदी है , प्राइवेट सेक्टर से कर्मचारियों की छटनी चालू हो चुकी है । अब सरकारी क्षेत्रों से कर्मचारियों को निकालने की बारी है। हमारे राज्य में यह काम होमगार्ड से चालू हो चुका है । अगली बारी प्राथमिक के शिक्षकों की है। चुकी प्राथमिक विद्यालय कोई फैक्ट्री तो है नही जिसका आउटपुट सरकार को दिखाई दे इसलिए सरकार हमे खजाने पर बोझ मानती है। हम लोग संख्या में अधिक है, हमारा वेतन भी अच्छा है और हमारा कोई भी ताकतवर  संग़ठन  नही है ,इसलिए हम लोगों की छटनी करना आसान है। यहाँ माननीय मंत्री जी के ...

जल संकट- कैसे और किससे?...

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                                                                      'जल-बचाओ, जीवन-बचाओ'                                          पर                                कैसे और किससे?...                  https://youtu.be/Hq0XQa57FkA                        दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन शहर के बाद हमारे देश के खूबसूरत समुद्र के किनारे बसे चेन्नई शहर को भूमिगत जल-शुष्क शहर प्रचारित किया जा रहा है। और ऊपर से लेकर नीचे के स्तर तक इसका दोष आम जनता पर मढ़ा जा रहा है। ध्यान देंगे तो पाएंगे कि हमेशा हर समस्या की जड़ जनता और उसक...

#शिक्षक-दिवस...-क्या शिक्षक-दिवस?..

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शिक्षक-दिवस?...क्या शिक्षक-दिवस?           प्राथमिक शिक्षा और उसके शिक्षकों की व्यथा-कथा !            पांच सितम्बर, 2019 को पूरे उत्तर प्रदेश के शिक्षक 'प्रेरणा ऐप' को दुष्प्रेरणा ऐब यानी बुरी नीयत से जबरन सेल्फी-प्रशासन लागू करने की कोशिश मानते हुए विरोध-प्रदर्शन एवं धरने पर रहे! शिक्षकों का मानना है कि तथाकथित 'प्रेरणा' ऐप अमेरिकी सर्वर द्वारा संचालित एक ऐसा असुरक्षित ऐप है जिसका परिणाम शिक्षकों को गैर-ज़िम्मेदार, कामचोर, लापरवाह, अनुशासनहीन आदि सिद्ध करके उनका वेतन काटना, अनुपस्थित दिखाकर दंडित करना, नौकरी से बर्खास्त करना आदि होना है। पिछले कुछ समय से शिक्षकों को फंसाने के इस तरह के हथकण्डे अपनाए जा रहे हैं जिससे ऐसा प्रतीत होता है शासन-प्रशासन की नज़र में समाज का जैसे सबसे बड़ा दोषी और नाकारा वर्ग शिक्षकों का ही है! लेकिन अर्थव्यवस्था की खामियों से जूझ रही सरकारों का असल मकसद शिक्षा-व्यय  में  कटौती ही प्रतीत होता है! शायद इसीलिए शिक्षकों की नौकरी मांग रहे न केवल लाखों बेरोजगार नौजवान बल्कि किसी तरह नौकरी पा ग...