Posts

Showing posts from January, 2019

चुनाव-चर्चा:1: जनता मुखौटे उतरना चाहती है...

 चुनना क्या है?...                        ●  जनता अब उनके मुखौटे उतारना चाहती है! :                                              - साकेत सिसोदिया               2019 के आम चुनाव में विभिन्न स्तरों पर होने वाला मुक़ाबला 'मुखौटा बचाव' बनाम 'मुखौटा उतार' वर्गों में होगा।  इस चुनाव में सरकार, विपक्ष, राजनीतिक दल, नेता, मीडिया, पत्रकार, विश्लेषक, सोशल मीडिया योद्धाओं द्वारा अपनी लोकछवि के मुखौटे की यथास्थिति बचाये रखने का पुरजोर प्रयास होगा क्योंकि अंदरखाने यह सब जानते हैं कि इस बार किसी विशेष राजनीतिक दल की हवा के अभाव में एवं जटिल सामाजिक-आर्थिक समीकरणों के चलते मतदाता के अंतर्मन में झांक कर एक सुनश्चित राजनीतिक धारा प्रवाह का आंकलन करना उन सभी के बूते से बाहर है।                  उधर जनता भी इन 70 सालों में राजनीति...

आत्मालाप-20: शातिर से सावधान

🔴    * शातिर से सावधान! *   🔴                                    - अशोक प्रकाश 🔹वह अफवाहें फैलाता है झूठ बोलता है तिल का ताड़ बनाता है... कभी रोता है कभी गिड़गिड़ाता है कितने मूर्ख हैं लोग- सोच मन्द-मन्द मुस्काता है...  सफल हो जाने पर  खिलखिलाता है समझ न जाए कोई इसलिए रिरियाता है सबको उल्लू बनाता है... शातिर भावनाएं भड़काता है आप सब लड़ें ऐसा माहौल बनाता है निगाहें कहीं और होती हैं मीठी-मीठी बातें सुनाता है बिन बुलाए आता है फंसाकर चला जाता है... उसे ऐसी कला आती है दुअन्नी अठन्नी बन जाती है एक रुपये का सामान खरीद लाता है संभलने से पहले शातिर चला जाता है... वह असली नेता है न लेता है न देता है अपनों को ही चूना लगाकर लुटिया डुबो देता है... बेनक़ाब होने पर चिढ़ता है चिड़चिड़ाता है प्रणाम भी करो तो मारने दौड़ा आता है बचाओ-बचाओ चिल्लाता है मार नहीं पाने पर कुढ़ता है बिलबिलाता है... शातिर पक्का शिकारी है बनता ऐसे है जैसे बिलकु...

आत्मालाप-19: खबरदार!...

                                     🔴   खबरदार! 🔴                                                            - अशोक प्रकाश हर ख़ास-ओ-आम को खबरदार किया जाता है उससे पहले आप सबको होशियार किया जाता है कि लूट गैर-कानूनी है और क़ानून के अनुसार की गई लूट लूट नहीं आपकी की धन-सम्पदा पर कब्जा करने की सरकारी छूट होती है इसका बीज लोकतंत्र के नाम पर जनता खुद बोती है... यह भी जान लिया जाय कि आपके बैंक खाते दरअसल सरकार के बैंक खाते होते हैं इसलिए इनमें रखे डेढ़ हज़ार हों या डेढ़ हज़ार करोड़ आपके सर नहीं सरकार के घर ढोते हैं और अब ये सरकार पर है कि वो कैसे कब और किसको इसे देती है बदले में क्या और कितना लेती है... इसलिए सरकार-बहादुर की बात सुनें मन में गुनें ज़िंदगी जीने का जैसा कहें वैसा तरीक़ा चुनें... यह भी...