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Showing posts from April, 2018

अटेवा: सरकार की 'ना' को 'ना'!

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                      ' पुरानी पेंशन बहाली' आंदोलन:                                   बढ़ता जनाक्रोश            कोई भी सरकार अपने आदेशों के खिलाफ़ जनाक्रोश का उभार नहीं देखना चाहती!...लेकिन लोगों के बर्दाश्त की भी एक हद होती है! आप सत्ता में होते हैं तो अपने सारे वायदों, सारे भाषणों को भूलकर अपने या अपने लोगों के नफ़े-नुक़सान के हिसाब से फैसले करने लगते हैं। आपको अपना वर्गीय हित सबसे ऊपर नज़र आता है। आप यह भी भूल जाते हैं कि आपको दुबारा जनता के बीच जाना है। नहीं, आप समझते हैं कि आप जनता की इच्छाओं से नहीं अपने हितैषियों के कंधे पर चढ़कर सत्ता पाते हैं। इसीलिए आपको जनता की कोई फिक्र नहीं होती। आप ऐसा कर सकते हैं, इसलिए ऐसा करते हैं!...            पर जनता क्या करे?...वह सिर्फ आपका विरोध कर पाती है। आपको वह भी अच्छा नहीं लगता! आप नहीं चाहते कि आपको लोग बेनक़ाब करें!...पर ऐसा नहीं होता। ऐसा कभ...

अटेवा-30 अप्रैल: पुरानी पेंशन बहाली आंदोलन

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                         पुरानी पेंशन बहाली आंदोलन               पुरानी पेंशन बहाली आंदोलन का आज एक जीवंत नाम हो गया है - 'अटेवा'! अटेवा 'बुढ़ापे की लाठी' अर्थात् 'पुरानी पेंशन' की एकमात्र मांग को लेकर आज एक व्यापक आंदोलन का रूप ले चुका है। सभी सरकारी-सहायता प्राप्त शिक्षक-कर्मचारियों के अलावा लगभग हर सार्वजनिक क्षेत्र से जुड़े कर्मचारियों का इसे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन प्राप्त है। लम्बे समय से संघर्षरत और उत्तर प्रदेश के अलावा देश के अन्य राज्यों में भी जन-जागरूकता फैला चुका यह संगठन 30 अप्रैल को दिल्ली में बड़ी रैली कर रहा है। यह रैली एक तरह से केंद्र सरकार के लिए एक और चुनौती खड़ी करेगी।              एक तरफ सार्वजनिक क्षेत्र को पूरी तरह कूड़ा-कबाड़ा सिद्ध करने और बनाने में जुटीं सरकारें एक-एक कर शिक्षकों-कर्मचारियों की सारी सुविधाओं में कटौती करती जा रही है, दूसरी तरफ बढ़ते जन-दबाव एवं आक्रोश का उसे सामना करना पड़ रहा है। अटेवा में अन्य लोगों ...

ज्ञान और धर्म- 1:

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                                    धर्म, तर्क और ज्ञान                                                     - अर्पित द्विवेदी सेमटिक रिलिजन्स(यहूदी, ईसाई, इस्लाम) के धार्मिक ग्रंथों में आदम और हव्वा को प्रथम मानव कहा गया है जिनको ईश्वर ने रचना के उपरांत जन्नत के बाग़ में रखा था लेकिन शैतान द्वारा उकसाने पर उन्होंने ज्ञान के वृक्ष का फल खा लिया और उनको ज्ञान हो गया जिसके कारण ईश्वर ने उनको जन्नत से निष्कासित कर दिया। शैतान का चरित्र सेमेटिक धर्मों के ग्रंथों में एक ऐसे पात्र की तरह है जो लोगों के मन में धर्म के प्रति संदेह डालता है और उन्हें ईश्वर के बताये मार्ग से भटका देता है। क्या कभी आपने विचार किया कि इस कथा और इसके पात्रों के जरिये वास्तव में क्या सन्देश देने की कोशिश की गई है? धर्मगुरु इस बारे में कुछ भी कहते रहें लेकिन सन्देश साफ़ है- “ईश्वर मनुष्य के ज्...

कहानी: 'दुर्गा'- सत्यवीर सिंह

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                                     🔵 दुर्गा... 🔵                                                                          - सत्यवीर सिंह             रसोई से बर्तन खड़कने की आवाज़ आ रही है. आज लेकिन कुछ अलग आवाज़ क्यों आ रही है? अच्छा, बाई जैसे किसी बच्चे से बात कर रही है, बीच बीच में डांटती है , हंसती भी है. ये दुर्गा आज बच्चा किसका ले आई ? देखें ! ये क्या , दुर्गा बच्चे से बातें किये जा रही है, हंस भी रही है लेकिन आँखों से आंसू बह रहे हैं, प्लेट पर ऐसे हाथ फेर रही है मानो बच्चे के  सर पर हाथ फेर रही हो, दुलार रही हो. बोल समझ नहीं आ रहे, कैसे आएंगे, मुझे बंगला कहाँ आती है और दुर्गा को बंगला के सिवा कुछ नहीं आता , वो तो हिंदी भी बंगला में ही बोलती है. ऐसी खोई हुई है की ...

धर्म और अध्यात्म:

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                                      अधूरी चर्चा...                 वे कहते हैं-मनुष्य का विषय 'ईश्वर' नहीं है, अनीश्वर नहीं है, आस्तिकता नहीं है, नास्तिकता नहीं है क्योंकि गौतम बुद्ध ने इसके बारे में कोई चर्चा नहीं की!...आज बुद्ध के नाम पर उसी तरह पालि भाषा का शब्द 'धम्म' है, जैसे उनके समय/उससे भी पहले से पण्डित/आचार्यों का शब्द 'धर्म' था। स्वाभाविक रूप से इन पर चर्चाएं ईश्वर-अनीश्वर के साथ जुड़ती रही होंगी। दोनों के पक्ष-विपक्ष आज की ही तरह तब भी होते रहे होंगे!...अनीश्वरवादी-नास्तिकों को सजाएं और उनके 'अधर्म' का नाश हो -के फ़रमान धार्मिक राजाओं के माध्यम से ही निकलते रहे होंगे!...'कुधर्म का नाश हो' का नारा आज भी नहीं है, पर 'हर-हर महादेव' के साथ 'अधर्म का नाश हो' का नारा है। 'धम्म' का इस विषय में क्या योगदान रहा है, सम्राट अशोक से लेकर बृहद्रथ तक -इस पर चर्चा क्यों नहीं होना चाहिए? चर्चा पुष्यमित्र शुंग के धर्म पर भी होना चाहिए और उसके कृत्यों-...

लेनिन:

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                    लेनिन के जन्‍मदिवस (22 अप्रैल) पर                              बेर्टोल्‍ट ब्रेष्‍ट की कविता लेनिन की मृत्‍यु पर कैंटाटा* 1. जिस दिन लेनिन नहीं रहे कहते हैं, शव की निगरानी में तैनात एक सैनिक ने अपने साथियों को बताया: मैं यक़ीन नहीं करना चाहता था इस पर। मैं भीतर गया और उनके कान में चिल्‍लाया: 'इलिच शोषक आ रहे हैं।' वह हिले भी नहीं। तब मैं जान गया कि वो जा चुके हैं। 2. जब कोई भला आदमी जाना चाहे तो आप कैसे रोक सकते हैं उसे? उसे बताइये कि अभी क्‍यों है उसकी ज़रूरत। यही तरीक़ा है उसे रोकने का। 3. और क्‍या चीज़ रोक सकती थी भला लेनिन को जाने से? 4. सोचा उस सैनिक ने जब वो सुनेंगे, शोषक आ रहे हैं उठ पड़ेंगे वो, चाहे जितने बीमार हों शायद वो बैसाखियों पर चले आयें शायद वो इजाज़त दे दें कि उन्‍हें उठाकर ले आया जाये, लेकिन उठ ही पड़ेंगे वो और आकर सामना करेंगे शोषकों का। 5. जानता था वो सैनिक, कि लेनिन सारी उमर लड़ते रहे थ...

जंतर-मंतर:

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                  हर दिन अस्वीकार और क्षोभ का मंजर                        भारतीय सत्ता के केंद्र दिल्ली में एक स्थान है- जंतर-मंतर! वैसे तो यह जंतर-मंतर महाराजा जयसिंह द्वितीय द्वारा समरकंद के रिगिस्तान स्थित एक वास्तु को टक्कर देने के लिए 1724 ई. में बनवाया गया, किन्तु यह दिल्ली के एक अजूबे के रूप में ही ज़्यादा विख्यात रहा है। आज इस स्थान की प्रसिद्धि 'धरना-प्रदर्शन स्थल' के रूप में ही ज़्यादा है। यहाँ से राजसत्ता के प्रतीक 'संसद' की दूरी ज़्यादा न होने के कारण ऐसा मान लिया जाता है कि सत्ताधारी लोग यहाँ आई जनता के आवाज़ को सुन लेंगे, समझ लेंगे और शायद समस्याओं का समाधान भी कर देंगे! लोकतंत्र में जनता अपनी आवाज़ उठाने के सिवा और कर भी क्या कर सकती है?...इसलिए जब देश के विभिन्न भीतरी भागों में जनता की समस्याओं की सुनवाई नहीं होती तो मजबूर होकर वह लोकतंत्र के सबसे बड़े प्रतीक संसद के समक्ष अपना दुखड़ा सुनाने आती है। पिछले कुछ समय से शासकों को शासितों का यह रवैय्या ठीक नहीं लग रहा और व...

'सितमगरों जवाब दो!....'

                       🔵 बच्चियों पर आफ़त... 🔵                                 समाधान क्या है?                     ⁉⁉⁉⁉⁉⁉⁉⁉⁉⁉ इधर कठुआ में आठ साल की मासूम से एक मंदिर में हुए सामूहिक बलात्कार और हत्या तथा उन्नाव में एक लड़की के साथ बलात्कार और न्याय की मांग करने गए उसके पिता की हत्या में विधायक की संलिप्तता के खिलाफ़ राष्ट्रीय स्तर पर आक्रोश और आततायियों के खिलाफ़ नफ़रत बढ़ रही है, उधर 'आग लगाने के बाद राख पर पानी' डालने का काम शुरू हो गया है। विशेषकर दोनों ही मामलों में सामाजिक और राजनीतिक सत्ताधारियों की संलिप्तता के कारण तरह-तरह के बेरोजगारी-नोटबन्दी-जीएसटी आदि के हमलों की मार झेल रही आम-आवाम का धैर्य जैसे जवाब देने लगा है! जो लोग सोचते हैं कि चुनाव में जीत के बाद जनता उन्हें हिटलर का हौसला दे देती है, वे भूल जाते हैं कि जनता यह भी जल्दी समझ जाती है कि ये चुनाव कैसे जीते जाते हैं। छले जाने का अ...

आत्मालाप-10: सपने सच होते हैं...

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                          हमारे पुरखे और उनके सपने                                            - अशोक प्रकाश अगर हमारे पुरखों ने बहस-मुबाहिसा को महत्त्व नहीं दिया होता अगर वे सिर सिर्फ़ ऊपर-नीचे ही करते रहते अगर वे जानवरों की तरह आ-आ...ऊ-ऊ ही करते, वाणी को तोड़-मरोड़कर विविध ध्वनियाँ न विकसित करते अगर वे अपने, अपने जैसों-मनुष्यों के लिए प्रकृति से संघर्ष करने के साथ तालमेल न बिठाते जानवरों को भी सुधार कर यथा-संभव अपने लिए उपयोगी न बनाते तो हम न होते!... उन्होंने हमारे लिए सुंदर सपने देखे, सच होते सपनों की कहानियां बनाई, उन कहानियों को सच बनाया.... इसलिए हमें भी सुंदर भविष्य, बेहतर मनुष्य, बेहतर मानव-सभ्यता के सपने देखना चाहिए, उन्हें पूरा करने का उद्यम करना चाहिए.... सपने देखिए, उन्हें पूरा करने की कोशिश कीजिए... सपने  सच होते हैं!    ★★★

अम्बेडकरवाद से बड़े अम्बेडकरवादी?..

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जय भीम!..जय अर्जुन!!       अम्बेडकरवाद से बड़े अम्बेडकरवादी?..   राजनीतिक चोर-डकैत-नीति         चोरों-डकैतों का गिरोह  जनता से ज़्यादा संगठित देखा गया है। शहरों में चोर आग लगाने और आग बुझाने दोनों काम मिल-बांटकर तयकर करते हैं! ध्यान बंटाने का काम भी बंटा होता है। जनता से ज़्यादा तेज बोलना, हो सके तो अपने आदमी को बचाने के लिए जनता के बीच के ही किसी कमजोर आदमी को पीटने लगना और साथी की भगा देना, ये सब चोर-नीति का हिस्सा है।...           कुछ  राजनीतिक लोग और दल चोर डकैत क़िस्म के होते हैं। आसानी से काम हो जाय तो चोरी, गुंडई के साथ काम सिद्ध करना पड़े तो डकैती। वे यह चोर-डकैत-नीति तमाम राजनीतिक मसलों पर भी  लागू करते हैं।....उदाहरण के तौर पर डॉ. अम्बेडकर के साथ जुड़े दलित-वोट को पाने और भरमाने के लिए सबसे बढ़-चढ़कर डॉ. अम्बेडकर की पूजा, ज़्यादा चंदा, ज़्यादा बड़ी झांकी, प्रसाद आदि का इंतज़ाम उनकी इस नीति का सफल प्रयोग है। गरीबी, समुचित चेतना के अभाव, सदियों से चली आई पूजा-पद्धति का प्रभाव और विशेषकर दलाल टाइप नेताओं क...

उनका दर्द: किसानी संवाद

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                                  किसानी-संवाद                                                     प्रस्तुति  : अशोक प्रकाश           खेती-किसानी राजनीति से ही नहीं, बुद्धिजीवियों-लेखकों के दिल-दिमाग से भी जैसे गायब होती जा रही है। यह अनायास नहीं है। यह एक ऐसा सायास फ़रेब है जिसकी कीमत सदियों को चुकानी पड़ सकती है। क्योंकि विकास की रफ्तार की जितनी और जैसी गति किसानों की रगों तक पहुंच पा रही है वह उसे स्वस्थ बनाने की जगह अस्वस्थ ही बना रही है। खाद-बीज-पानी-जुताई-बुआई सब पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का कब्ज़ा होते जाने से किसान इनका एक उपभोक्ता मात्र बनकर रह जा रहा है। यह बहुत घातक और दूरगामी परिणाम वाला कुचक्र है। समझा और रोका जाना चाहिए इसे!             फेसबुक-मित्र मोती लाल और अन्यत्र इससे संबंधित कई संवाद इधर च...

आत्मालाप-9: दोस्तों के पाँव

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                                    दोस्तों के पाँव                                                  - अशोक प्रकाश काश! आसमान सर पर  उठाए बिना धरती पर होते दोस्तों के पाँव... धीरे-धीरे  हम साथ चलते पहुंच ही लेते सपनों के गाँव! थके होते जख़्मों पर झुके होते  सहलाती पुरवैया दुलराती छाँव! जंगल में मंगल नहीं होता भले ही मिलती तो फिर भी एक सुबह  एक ठाँव! काश! सूरज छुपा होता भले ही बादलों में किरणें बतातीं पता उसका रंग उसका दांव!... ★★★

मर्म-कथा

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                                      त्रिशंकु                                                   - नज़्म सुभाष             शांतिपूर्ण चल रहे आंदोलन ने अंततः  रौद्र रूप धारण कर लिया । बीस लोग मारे गये हैं।  ये मारे गये लोग सवर्ण थे या दलित अथवा मात्र मनुष्य.... इसको लेकर पक्ष -विपक्ष में अफवाहों का बाजार गर्म है। जैसा तर्क वैसी फोटो!...कौन असली कौन नकली?...कुछ नहीं सूझता...सबकुछ गड्मड्ड है!        सैकड़ों दुकानें फूंक दी गयी हैं....जनजीवन अस्त-व्यस्त है।... स्कूल, अस्पताल, रेल,  बस सब कुछ  अराजकता की भेंट चढ़ चुके हैं। टीवी पर भोंपू लगातार यही चीख रहा है।        सोशल मीडिया भी उबल रहा है ।सबके अपने - अपने पक्ष और तर्क हैं । सवर्ण चीखता है -"आरक्षण संविधान के माथे पर कलं...

अंग्रेजी बनाम हिंदी

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                                 लड़ोगे तो जीतोगे!           अंग्रेज़ी वैश्विक-आर्थिक-आक्रमण या वैश्वीकरण की भाषा है, जबकि हिंदी सिर्फ़ भारत के एक(बड़े)क्षेत्र की भाषा! दोनों की तुलना ठीक नहीं!...     ....देश के बाहर ही नहीं, देश के अंदर भी हिंदी लिखने-बोलने-पढ़ने वालों को इज़्ज़त और पैसा यानी रोज़गार मिलता है। किंतु यह केवल भाषायी ग़ुलामी नहीं है। यह वास्तविक गुलामी का द्योतक है। .....देश की भाषाओं के अस्तित्व का संघर्ष अनिवार्यतः इस गुलामी (मुख्यतः आर्थिक) से मुक्ति का संघर्ष है! लड़ोगे तो जीतोगे वरना ऐसे ही सड़ोगे!         हिंदी भाषियों के सामने यह चुनौती सबसे बड़ी है...क्योंकि उन्हीं को सबसे कम अंग्रेज़ी आती है! और यह अच्छी और सकारात्मक बात है। बड़े क्षेत्र के लोगों को रोज़गार नहीं मिल रहा! मिलने की संभावनाएं और क्षीण होती जा रही हैं। उन्हें रोज़गार के लिए लड़ना पड़ रहा है। यह लड़ाई एक भाषायी और सांस्कृतिक लड़ाई भी है। दरअसल, यह गुलामी के खिलाफ़ लड़ाई...

आत्मलाप-8: चलो, लड़ा जाये...

                                      चलो, लड़ा जाये...                                                                 - अशोक प्रकाश चलो, लड़ा जाये कुछ आगे बढ़ा जाये! तुम मेरा सिर फोड़ो मैं तुम्हारा थाने चलें थानेदार का होगा वारा-न्यारा... कुछ नया इतिहास गढ़ा जाये! तुम वो हो मैं ये हूँ तुम खटिया के खटमल हो मैं सिर की जूं हूँ... खटमल और जूं पे चलो, और अड़ा जाए! इतिहास तुम्हारा भी है इतिहास हमारा भी गाय-गोबर और गोबरधन के साथ लाते हैं दोनों भैंस का चारा भी... बकरी को चलो, एक डंडा जड़ा जाये! तुम रोटी खाते हो में चावल खाता हूँ तुम्हें सब्ज़ी नहीं मिलती में दाल नहीं पाता हूँ.... रोटी और दाल का सब्ज़ी और चावल का चलो, उल्टा पहाड़ा पढ़ा जाये! तुमने चोटी कटवा ली है मैंने दाढ़ी मुड़वा ली है मालिक की मर्ज़ी थ...