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Showing posts from March, 2020

कार्ल मार्क्स, मार्क्सवाद और उनके विरोधी

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            कार्ल मार्क्स, मार्क्सवाद और उनके विरोधी                                          हम देख रहे हैं कि आज पूरी दुनिया का शासकवर्ग आज या तो मार्क्सवाद को एक फेल विचारधारा मानता है या मार्क्सवाद की अपनी पूंजीवादी व्याख्या को सही मानता है। यहाँ तक कि तथाकथित 'समाजवादी' सरकारों द्वारा भी अपने 'सुधार' कार्यक्रमों और तत्सम्बन्धी नीतियों को इस तरह निर्मित किया जा रहा है कि वह जनता को देखने में तो समाजवादी लगे किन्तु वास्तविक रूप में पूँजीवादी ढर्रे पर ही चले। जब मार्क्सवादी समाजवाद के अकाट्य तर्कों को व्यवस्थाएं खण्डित न कर सकीं और जनता का इस विचारधारा पर विश्वास दृढ़तर होता गया तो शासकों ने यह छद्मनीति अपनाकर जनता को भ्रमित कर मार्क्सवाद से दूर करने का प्रयास किया। यह प्रयास आज और तेज हो गया है। लेकिन जैसे-जैसे पूँजीवादी विचारधारा का संकट बढ़ता जा रहा है और उसका साम्राज्यवादी स्वरूप भी इस संकट को हल करने में बुरी तरह विफल हो रहा है, वैसे-वै...

चीनी #कोरोना_वायरस

         ⚫ चीनी #कोरोना_वायरस पर एक देसी विचार ⚫ 🔴 चीनी कोरोना से डरना बेकार है ! कोरोना तो वैसे ही पिलपिला है ! ठंडे देश से आया ठंडा वायरस ! एकाध हफ़्ता और रुक जाइये ! ग़ुस्सैल सूरज महाराज चढ बैठेंगे इस पर ! चीं निकल जायेगी इसकी ! वैसे भी कोरोना में दम नहीं कि वो हिंदुस्तानियों को मार सके ! हमने ये ज़िम्मेदारी टीबी और मलेरिया को सौंप रखी है ! टीबी और मलेरिया के होते हम किसी विदेशी वायरस से मर जाये ये स्वदेशी की भावना के ख़िलाफ़ है ! टीबी- मलेरिया की दवा ढूँढ़ी जा चुकी और कभी- कभार सरकारी अस्पतालों में मिल भी जाती हैं ! आदमी पूरा कोर्स कर लें तो ठीक भी हो जाता है, इसके बावजूद जब हम ठान लें और हमारे डॉक्टर हमारा मरना तय कर ही दें तो हम बतौर बहाना इन्हीं बीमारियों को चुनते है !  हर साल मलेरिया से दो लाख हिंदुस्तानियों का राम-नाम-सत्य होता है तो साढ़े चार लाख मरने के लिये टीबी को चुनते है ! ये भले लोग इस देश से इन बीमारियों के देशी वायरस से इतना प्यार करते हैं कि बिना हल्ला-गुल्ला किये चुपचाप मर जाते हैं ! देश पर मरने वाले इन जवानों की कहीं कोई चर्च...