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नियमकाल में बुलडोजर के नियम

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बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर की जयंती पर आपके लिए एक कविता:                           नियमकाल                                      -- मुकुल सरल आप शोर मचाते हैं कि यह आपातकाल है नहीं यह नियमकाल है आपातकाल भी एक नियम है और सबकुछ हो रहा है नियम अनुसार नियम के तहत ही हथियाई गई है सत्ता नियम के तहत ही चल रहा है बुलडोज़र नोटबंदी, लॉकडाउन से लेकर ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स के छापे भी यहां तक कि विपक्ष का संसद निकाला और जेल भेजा जाना भी सबकुछ है नियम अनुसार आप बेवजह घबरा रहे हैं नियम के तहत ही निकाले जा रहे हैं जुलूस नियम के तहत ही किए जा रहे हैं दंगे नियम के तहत ही मारे जा रहे हैं निर्दोष लोग कुछ भी नियम विरुद्ध नहीं नियम के तहत ही बदला जा रहा है इतिहास नियमों के तहत ही गढ़ा जाएगा आपका नया भविष्य बिल्कुल चिंता मत कीजिए संविधान में बदलाव भी नियमों के तहत किए जा रहे हैं नियमों के तहत ही गढ़ा जा रहा है नया विधान नियमों के तहत ही कुचला जा रहा है लो...

एक सवाल आधी आबादी का

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                                महिला को         अपनी देह पर नियंत्रण के अधिकार  को पाने में          और कितने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस लगेंगे?                                                   - एड आराधना भार्गव                                                                    अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस समान काम के लिए समान वेतन , समान काम के घंटे , और मताधिकार की मांग से शुरू होने वाला यह प्रतीक दिवस हर साल महिला सशक्तिकरण के लिए नवीन और अतिरिक्त प्रयास के लिए प्रेरित करता  है | तीन मार्च को हाथरस प्रकरण का फैसला आ गया जिसमे हाथरस काण्ड में प्राशनिक लापरव...

वादा-खिलाफ़ी के खिलाफ़ तेज होगा किसान आंदोलन

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                              नया रूप धारण कर                  और तेज होगा किसान आंदोलन                    ★ सरकार द्वारा किसानों से वादाखिलाफी के खिलाफ 31 जनवरी को संयुक्त किसान मोर्चा की तरफ से देशव्यापी "विश्वासघात दिवस" का ऐलान। ★ लखीमपुर खीरी हत्याकांड में बीजेपी की बेशर्मी और संवेदनहीनता के विरुद्ध संयुक्त किसान मोर्चा पक्का मोर्चा लगाएगा, मिशन उत्तर प्रदेश जारी रहेगा। ★ 23 और 24 फरवरी को मजदूर संगठनों द्वारा घोषित राष्ट्रव्यापी हड़ताल का समर्थन और सहयोग करेगा संयुक्त किसान मोर्चा। ★ चुनाव में संयुक्त किसान मोर्चा का नाम नहीं होगा इस्तेमाल, चुनाव में भाग लेने वाले किसान संगठन और नेता संयुक्त किसान मोर्चा में नहीं।  हाल ही में दिल्ली के सिंघु बॉर्डर पर हुई संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक में मोर्चे के कार्यक्रम व भविष्य की दिशा पर कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। मोर्चे ने घोर निराशा और रोष व्यक्त किया और कहा कि भारत...

शादीकार्ड की फजीहत

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                    विवाह का शुभकामना संदेश!       आजकल ज़्यादातर शादियाँ घर पर नहीं होतीं। प्रायः लोग कहीं कोई मैरिज होम/हाल बुक करते हैं। शायद इसीलिए कॉर्ड का चलन हुआ। ताकि पता लग सके कि आमंत्रितों को कहाँ जाना है।          अजीब बात है कि इसे इस बात से भी जोड़ दिया गया है कि किस रिश्ते को महत्व देना है, किसे नहीं। दामाद, बहनोई, मामा, फूफा, उनके नजदीकी रिश्तेदार, दोस्त-यार से होते हुए लिस्ट समाज के महत्त्वपूर्ण परिचित व्यक्तियों, काम में आने वाले या आ सकने वाले व्यक्तियों तक पहुँचती है। जातिगत रिश्तों में एम.पी.-एम.एल.ए., भूतपूर्व मंत्री-संत्री, मठाधीश, संस्थाओं के अध्यक्ष-मंत्री आदि विशेष आमंत्रित व्यक्ति होते हैं।              इधर कुछ सालों से वैचारिक रिश्तों को भी महत्व मिलने लगा है। अम्बेडकरवादियों और प्रगतिशीलों या मार्क्सवादियों के लिए यह बड़ा मुश्किल फैसला होता है। समाज ढकोसलों-आडम्बरों से भरा है, पर शादी-व्याह तो उसी समाज में करना है। जरूरी नहीं कि शादी वाला...

किसान आंदोलन की प्रतिबद्धता

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            किसान आंदोलन की प्रतिबद्धता                  किसान आंदोलन की प्रतिबद्धता सचमुच यह एक अद्भुत प्रतिरोध है! इसकी मिसाल इस शताब्दी के शुरुआती दिनों में तो नहीं ही देखी जाती, पिछली शताब्दी में भी इसकी ज़्यादा मिसालें नहीं हैं। कहने वाले कुछ भी कहें 'सरकार की नकेल में नथ' डालने का काम तो इसने किया ही है!..लेकिन सरकार सिर्फ पुलिस और अफसर ही तो नहीं होते। उनके भी ऊपर बड़े सरकार हैं। और वे कोई नेता नहीं हैं। देशी-विदेशी पूंजी के घाघ हैं, बड़ी-बड़ी कम्पनियों के मालिक हैं, पूँजीपति हैं! यद्यपि पूँजीपतियों ने इसका मतलब यही निकाला होगा कि देश की प्राकृतिक संपदा से मुनाफ़ा उठाने में उन्हें अब अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी। क्योंकि उनका काम तो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष अबाध गति से चल ही रहा है। तीनों कृषि संबंधी कानून लाने का मक़सद भले ही बेनकाब हो गया हो पर कृषि-उपज का खरीदना-बेचना, खेती को ठेके पर लेने के लिए अनुबंध करना, सस्ते में खरीदारी और कुछ समय बाद बिक्री- माल रोककर महंगा करना तथा फिर जिंस बाज़ार से मनमर्जी मुनाफ़ा कमान...

केंद्रीय श्रमिक संगठनों का व्यापक प्रदर्शन

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प्रकाशनार्थ:           कामगारों की बढ़ती दुर्दशा के खिलाफ़                      देशव्यापी विरोध प्रदर्शन                      श्रम अधिकारों पर हमले के खिलाफ सभाएं दिल्ली:          श्रम कानूनों के खिलाफ  आहूत  व मासा द्वारा समर्थित देशव्यापी प्रदर्शन  के दौरान इंक़लाबी मज़दूर केंद्र,मज़दूर एकता समिति, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र,घरेलू कामगार महिला संगठन व परिवर्तनकामी छात्र संगठन के कार्यकर्ताओं ने मज़दूर बस्ती शाहबाद डेरी में जुलूस निकाला और जगह जगह सभाएं कीं।  सभाओं के दौरान वक्ताओं ने जोशो खरोश के साथ श्रम कानूनों में संशोधन के खिलाफ नारे लगाए । सभा में वक्ताओं ने मोदी सरकार को पूंजीपतियों के इशारों पर नाचने का आरोप लगाते हुए श्रम कानूनों में संशोधनों को लॉक डाउन और मंदी से उत्पन्न संकट का बोझ मज़दूरों पर डालने की कवायद करार  दिया। वक्ताओं ने इसे आज़ाद भारत में मज़दूर वर्ग पर सबसे बड़ा हमला बताया।वक्ताओं ने मज़दूर...

रहम की उम्मीद, किससे?...

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आप उनसे रहम की कोई उम्मीद नहीं रख सकते जो मानते हैं कि सुख-दुःख सब पूर्वजन्म के कर्मों का फल है!..यह भी कि दुखी दुख लायक ही है और सुखी सुख के ही लायक! पूंजी के इस दर्शनशास्त्र को धर्म कहा जाता है।  आप विश्लेषण करेंगे तो पाएंगे कि अपराधियों का ऐसा ही नीतिशास्त्र  होता है जिसकी तराजू पर वे पूरे ब्रह्मांड को तौलते हैं। आप उसे अनीति-अधर्म-मूर्खता कहें-समझें तो उनकी बला से!..वे आपको भी कुछ नहीं सेटते!  ऐसा नहीं कि ये अनपढ़ हैं और इसे अनीति मानते हुए भी नीतिशास्त्र समझते हैं। ऐसा नहीं है, घण्टे भर पूजा करने के बाद वे मान लेते हैं की पापयोनि में पैदा हुए इस प्राणी को प्रभु समझते हैं और वह जो कुछ करता है उन्हीं के इशारे पर करता है। आखिर उनकी मर्जी के बगैर एक पत्ता भी तो नहीं हिल सकता!... इसलिए, अगर लॉकडाउन के चलते असहाय लोग छटपटाते हुए अपने घर पहुँचने की जद्दोजहद कर रहे हैं, रोते-चीखते बच्चे आपको भी रुला रहे हैं अथवा पैसा और/या शराब के नशे में नशेड़ी खाली सड़क को अपने बाप की  मान लोगों को रौंद रहे हैं तो इसे अस्वाभाविक मत मानिए! मूर्खों और अंधविश्वासियों को जब पूँजी का बल मिलता...