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Showing posts from February, 2018

जिसके हाथों में लाठी है:

                               जिसके हाथों में लाठी है....                                                 -आचार्य बलवन्त  जिसके हाथों में लाठी है    उसकी है सरकार गुरू।   अच्छे से चल रहा इन दिनों  उसका कारोबार गुरू।  उसी का सी.एम.,उसी का डी.एम.  उसी का तहसीलदार गुरू।  गाँवों के संसाधन पर  उसी का है अधिकार  गुरू।  खूब खिलाता, खूब पिलाता  तरह तरह से दिल बहलाता सुबह-शाम उसके गुण गाता   शहर का  हर अख़बार गुरू।  अच्छे से चल रहा इन दिनों  उसका कारोबार गुरू।  रूप बदलकर,रंग बदलकर बात-चीत का ढंग बदलकर  निभा रहा है भाँति-भाँति के  भले-बुरे किरदार गुरू।...   जिसके हाथों में लाठी है    उसकी है सरकार गुरू।   अच्छे से चल रहा इन दिनों  उसका कारोबा...

देश:

                                  यदि तुम्हारे घर के                            एक कमरे में आग लगी हो!...                                                -सर्वेश्वर दयाल सक्सेना  यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में आग लगी हो तो क्या तुम दूसरे कमरे में सो सकते हो ? यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में लाशें सड़ रहीं हों तो क्या तुम दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो ? यदि हाँ तो मुझे तुम से कुछ नहीं कहना है । देश काग़ज़ पर बना नक्शा नहीं होता कि एक हिस्से के फट जाने पर बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें और नदियाँ, पर्वत, शहर, गाँव वैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखें अनमने रहें । यदि तुम यह नहीं मानते तो मुझे तुम्हारे साथ नहीं रहना है । इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा कुछ भी नहीं है न ईश्वर न ज्ञान ...

समान शिक्षा का सवाल:

                                शिक्षा: समान शिक्षा!                                                  -सुयश सुप्रभ               राष्ट्रपति की सैलरी डेढ़ लाख रुपये से बढ़ाकर पाँच लाख रुपये कर दी जाती है और एससी व एसटी विद्यार्थियों की स्कॉलरशिप बंद कर दी जाती है। क्या जादूगरी है! हमें देश की समस्याओं का ऐसा समाधान नहीं चाहिए। ऐसा इलाज पाकर ही मुँह से निकलता है - "मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की"।  टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के सभी कैंपसों में साथियों ने जो हड़ताल की है वह असल में लोकतंत्र को बचाने की बड़ी लड़ाई का हिस्सा है। यह क्या बात हुई कि अचानक एक सर्कुलर आए और तमाम मुश्किलों का सामना करके यूनिवर्सिटी पहुँचने वाले एससी और एसटी विद्यार्थियों को स्कॉलरशिप मिलना बंद हो जाए। यूजीसी के बजट में 55% कटौती करने वाली सरकार हर पाँच साल...

उच्च शिक्षा- 7: वाह रे यूजीसी

वाह रे यूजीसी:                                       एक अपील                                                              प्रस्तुति: डॉ. इला अग्रवाल                              (SaveEducation) वाह रे यूजीसी(UGC)!- वाह रे भारतीय उच्च शिक्षा!...जब हुक्मरान All India level पर 3%(JRF), 12%(NET) और 6% qualified को नौकारी दे ही नहीं पा रहे हैं तब अपने Unqualified भाई-भतीजों के लिए नया नियम ला कर, सभी Qualified अभ्यर्थियों के मुंह पर तमाचा मारकर अपने चापलूसों को रूपयों के दम पर Universities में Professor नियुक्त करेंगे क्या?!...            साथियों, आप अपना विरोध UGC पर दर्ज करवाएं! वरना वो दिन दूर नहीं जब आप सभी qualified अभ्यर्थी उच्च ...

उच्च शिक्षा- 6: यूजीसी

                             यूजीसी की यशोगाथा                                             प्रस्तुति-   डॉ अरुण कुमार अद्भुत है यूजीसी और इसके कर्ता-धर्ता । अभी ‘वेद’ से इसका पिंड छूटा ही था कि वज्रधारी धीर-गंभीर ‘इन्द्र’ ने आसन जमा लिया। आते ही स्वभावानुकूल एक केंद्रीय नेता के भाई की नियुक्ति कर सरकार में अपनी आस्था दिखाई और चिड़िया की आँख पर निशाना साधा। सचिव पद की नियुक्ति के लिए लंबी चौड़ी सूची तो बनाई पर अंतिम सूची में पुराने यार-दोस्त ही स्थान बना सके। पारदर्शिता के साथ काम करना इनका पुराना शगल है जो यहाँ भी जारी है। बी एच यू में अपने शोध-अनुभव के आधार पर सुघड़तम नियुक्ति करने वाले चेयरमैन ‘धीर-गंभीर-इन्द्र’ सचिव-नियुक्ति में भी कलाकारी कर गए हैं। सुनने में आया है कि कोई ओशो ‘जैन’ दौड़ में सबसे आगे हैं। नशीली रात के लिए मशहूर शहर इंदौर के वासी जैन इनके पुराने यार हैं जिनके प्रति इनका स्नेह-दुला...

आत्मालाप-7: ख्वाबों को अपनी जमीं पर...

                                      आत्मालाप-7                                                          -अशोक प्रकाश 🔴 ख़्वाबों को अपने ज़मीं पर  उतारना होगा,      अँधेरे में ग़ुम हुए सूरज को उबारना होगा!      दिये जो आजकल घरौंदों में टिमटिमाते हैं,      रौशनी सूरज की बनेंगे वे संभालना होगा!     ग़मज़दा होता है रातों का सफ़र हालांकि     सुबह के हुस्न को नज़रों में संवारना होगा!     ऐसा कुछ भी नहीं कि वक़्त खराब आया है,     सौ साल पहले का सोचो तो न उलाहना होगा!    समंदर में उठी लहरों को फिर से ज़रा याद करो    वक़्त के हर कीड़े होंगे साफ बुहारना होगा!    वे ठग हैं ठगी करेंगे ही न तुम उनकी सोचो    उनके हर जाल से बच्च...

ग़ज़ल:

                सूरज नहीं तो शम्मा जलाने की बात कर                                                         - गौहर रज़ा सूरज नहीं तो शम्मा जलाने की बात कर ज़हनों में, दिल में ज्योत जगाने की बात कर  ज़िक्रे-ए-ख़िज़ान तो हो चुका, ज़िक्रे बाहर कर अक्स-ए-ख़याल-यार बचाने की बात कर  मेरा वतन जो जेल की सूरत में ढल गया  उसको बहिश्त फिर से बनाने की बात कर  अब नस्ल-ए-नौ भी माँग रही है हिसाब, सुन अपनी नहीं, तू आज ज़माने की बात कर दिल से ज़हन का राबता जब टूटने लगे  दिल में नए ख़याल जगाने की बात कर पाबंदियाँ हों शर्त तो आवाज़ कर बुलंद  जाम-ओ-सुबू की, पीने पिलाने की बात कर अब मर्सियों का दौर नहीं है मेरे नदीम नग़मे बिखेर, साज़ मिलने की बात कर  दिल में उमंग, हाथ में परचम लिए हुए पैमान-ए-इनकिलब, निभाने की बात कर।               ...

जनता का इतिहास:

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                                  पाहीमाफी की प्रभुदेई                                               -आशाराम जागरथ                                                         जीवन कहां- कहां  और कैसे-कैसे धड़कता है, किसको  कब-कहाँ ले जाता- इसके अहसास के लिए इस पोस्ट को जरूर पढ़िए! 70 कुछ ज़्यादा होते हैं क्या?...नहीं, जैसे कल की बात हो!...बहुत कुछ बदला है! सब अच्छा ही हुआ है क्या?...जी नहीं, पर जनता का इतिहास ऐसे ही बनता है! ज़माना और बदलेगा!...यह दुनिया भी- विश्वास कीजिए और बेहतर होगी!...  'अच्छे दिन आएंगे, जरूर आएंगे!'... वे नहीं, आप लाएंगे...आपके बच्चे लाएंगे!!...             ये हैं पाहीमाफी की प्रभु...

मज़दूर और मज़दूरी:

                        बवाना-फैक्ट्री अग्निकांड एवं                                 मज़दूरों की मौत 20 जनवरी 2018 को बवाना इंडस्ट्रीयल क्षेत्र, सेक्टर पांच, नई दिल्ली की एक फैक्टरी में आग लगने से मजदूरों की जलकर हुई दर्दनाक मौत की एक प्राथमिक जांच रिपोर्ट:             दिल्ली से लगभग 23 किमीे. दूर उत्तरी-पश्चिम इलाके में बसा बवाना-क्षेत्र इस सदी के शुरू होने के पहले तक राजधानी का अंतिम ग्रामीण क्षेत्र माना जाता था। 1999 में इस इलाके को औद्योगिक विकास के अंतर्गत लाया गया और इसके लिए लगभग 778 हेक्टेयर जमीन को विभिन्न सेक्टरों में विभाजित किया गया। इसके बाद से यहां औद्योगिक क्षेत्र के फैलाव में तेजी आई। आॅटोमोबाईल, इंजिनियरिंग, टूल्स, प्लास्टिक, टैक्सटाइल्स आदि के उद्योग लगाने पर यहाँ जोर दिया गया। इस क्षेत्र में औद्योगिक विकास के ठीक पहले से यानी 1995 और उसके बाद के समय में दिल्ली में मजदूर बस्तियों को उजाड़ने क...

आत्मालाप-6: घर वापसी

                                                               घर-वापसी                                                                                     -अशोक प्रकाश घर की याद आती है वापस जाना चाहता हूँ रोज़ी-रोटी दोगे?... वहीं रहना चाहता हूँ! कहाँ रहने पाया मैं वहाँ... दर-दर की ठोकरें खाई खिंचा आया यहाँ! कैसे हो वापसी घर की कहते हो... मारा भगाया पहले अब यहाँ भी नहीं रहने  देते हो! फिर बेगारी लोगे? उल्लू समझते हो... जब जो चाहे बकते हो? कहते हो हिन्दू हो सौ करोड़ हो तो  उन्हें तो शिक्षा, रोज़गार... भ्रष्टाचार-रहित शासन दो! बरगलाता है तू... मकड़जाल में जो फंसा दुश्मनी उसी से निभाता...

कविता में बजट:

                        बजट पेश भा, ताली पीटो...                                                    -अरविंद तिवारी बजट पेस भा, ताली पीटो, और मचाओ शोर रँग-बिरंग चमकीले बादल फैल गये सब ओर। व्यापारिन का छूट मिली है, मध्यवर्ग का लूट अउर किसानन का बाँटिन हैं मीठी लेमनचूस॥ खेती औ सिक्छा के कर मा और बढ़ा अधिभार लेकिन ख़र्चा काट लिहिन हैं, पक्के डंडीमार॥ लरिकन केर खेलौना महँगा बुढ़वन कै चश्मा बाद मरे के   पैसा  पैहौ,  किहे देत   बीमा॥ और बताओ का चाहत हौ, खुस हैं श्री यमराज अब चुनाव के बाद भोगिहौ, का बतलाई आज॥                                                            ■■■

ओक्का बोक्का..:

भोजपुरिया कविता:                             ओक्का बोक्का तीन तलोक्का... ओक्का बोक्का तीन तलोक्का, फूट गयल बुढ़ऊ क हुक्का। फगुआ कजरी कहाँ हेरायल, अब त गांव क गांव चुड़ूक्का।। नया जमाना नयके लोग, नया नया कुल फईलल रोग। एक्के बात समझ में आवै, जइसन करनी वइसन भोग।। नई नई कुल फइलल पूजा, नया नया कुल देबी देवता। एक्कै घर में पांच ठो चूल्हा, एक्कै घरे में पांच ठो नेवता।। नउआ कउआ बार बनउवा, कवनो घरे न फरसा झऊआ। लगे पितरपख होय खोजाई, खोजले मिलें न कुक्कुर कउआ।। एहर पक्का ओहर पक्का, जेहर देखा ओहर पक्का। गांव क माटी महक हेराइल, अंकल कहा कहा मत कक्का।। कहाँ गयल कुल बंजर ऊसर, लगत बा जइसे गांव ई दूसर। जब से ई धनकुट्टि आइल, कउनो घरे न ओखरी मूसर।। कहाँ बैल क घुंघरू घण्टी, कहाँ बा पुरवट अऊर इनारा। कहां गइल पनघट क गोरी, सूना सूना पनघट सारा।। शहर गांव के घीव खियावै, दाल शहर से गांव में आवै। शहरन में महके बिरियानी, कलुआ खाली धान ओसावै।। गांव गली में अब त खाली, राजनीती पर होले चर्चा। अब ऊ होरहा ...