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Showing posts from March, 2018

घोषणाएं और किसान

प्रकाशनार्थ :                      'झूठ का पुलिंदा होती हैं घोषणाएं!' -'मुख्यमंत्री की घोषणा के मुताबिक समर्थन मूल्य से कम पर खरीद करने वाले व्यापारियों पर अपराध पंजीबद्ध किया जाए।' -एम एस पी सत्याग्रह का पहला चरण पीपल्या में सत्याग्रह के बाद सम्पन्न!  -मेधा ,योगेंद्र ,डॉ सुनीलम ने सरकार की किसान संबंधी घोषणाओं को झूठ का पुलिंदा बताया। जय किसान आंदोलन ,किसान संघर्ष समिति ,जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय ,अखिल भारतीय किसान सभा  ,नर्मदा बचाओ आंदोलन द्वारा आज  पीपल्या मंडी में एम एस पी सत्याग्रह किया गया । किसान संगठनों ने पिपल्या मंडी में सत्याग्रह करने की अनुमति चाही थी लेकिन प्रशासन द्वारा इंकार कर दिया गया। सत्याग्रह के दौरान  किसानों ने बताया कि भावान्तर की योजना शुरू होते ही व्यापारियों ने रेट गिरा दिया था।सोयाबीन और उड़द का भावन्तर का पैसा नहीं मिला ,जब तक किसान के पास अनाज था ,तब तक रैट कम था ,सोयाबीन 1500 से 2500 बिका ,भावन्तर 200 रुपये क्विंटल दिया ।  अब 10 अप्रैल से खरीद शुरू होनी है लेकि...

शहादत के जख़्म:

                        शहीद दिवस और उसके बाद.... आज 25 मार्च है!... हो सकता है शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का शहादत-दिवस हम 23 मार्च की जगह 24 मार्च को मनाये होते!... हो सकता है 1931 में कांग्रेस का वह अधिवेशन कुछ दिनों के लिए टाल दिया गया होता!... हो सकता है इन शहीदों को भी 'कालापानी' की सजा हो जाती और वे 1947 के बाद भी सक्रिय होते!... हो सकता है जमीन के 'राष्ट्रीयकरण' ताकि उस पर सोवियत संघ की तरह सामूहिक-खेती हो सके...और कारखानों का राष्ट्रीयकरण ताकि मज़दूरों को कम से कम नियमित और निश्चित मज़दूरी मिल सके-सभी मज़दूरों को पेंशन,बोनस,फंड मिल सके...आदि शहीदों की देश की जनता के लिए की जाने वाली ये साधारण सी मांगें 1947 के बाद पूरी हो गई होतीं!... हो सकता है उनके सपनों का भारत भले न बन पाता, हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईशाई-ब्राह्मण-दलित-सवर्ण-पिछड़े का भेद न कर सरकारें सबकी आजीविका-रोजगार...आवास...कपडे-लत्ते की सामान्य सी व्यवस्था कर दी होतीं!... हो सकता है जाति या धर्म के आधार पर भेद और उत्पीड़न को समाज में अपराध की तरह ...

विश्विद्यालयों का निजीकरण

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    विश्विद्यालयों की 'स्वायत्तता' देश की जनता के साथ धोखा नई दिल्ली, 24 मार्च, 2018.  अखिल भारतीय विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय शिक्षक संगठन  (एआईफुक्टो )ने केन्द्रीय मानव संसाधन विभाग के दबाव में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा हाल ही में 62 संस्थानों को स्वायत्तता देने की कटु आलोचना करते हुए कहा है कि यह फैसला देश के साथ एक बड़ा धोखा है।इन विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों को स्वायत्तता देना न केवल संवैधानिक एवं वित्तीय जिम्मेदारी से पीछे हटना है बल्कि चोर दरवाजे से देश के जानेमाने संस्थानों का निजीकरण कर काॅरपोरेट के हाथों सौंपने का जनविरोधी फैसला है।स्वायत्तता के नाम पर उन संस्थानों को बाजार के हवाले करने, उनके प्रजातांत्रिक प्रतिरोध को कुचलने और शिक्षा को मॅहगा बनाकर आम आदमी की पहुँच से बाहर करने का खुला ऐलान है। डब्ल्यू टीओ और वर्ल्ड बैंक के इशारे पर नीति आयोग और हेफा (HEFA) के रास्ते सार्वजनिक शिक्षा को सदा के लिए खत्म करने की यह एक बहुत बड़ी  सुनियोजित सरकारी साजिश है।                आज यहाँ जारी प्रेस-व...

इस Tन्त्र-Mन्त्र से बचिए, बचाइये!

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                                 इस  तंत्र-मंत्र से                                  बचिए, बचाइये!                         हम महान हैं! हमारा धर्म महान है! हमारी संस्कृति महान है! ...  हमारी पूजा करो!            - किसकी आवाज है यह? सुनने की कोशिश कीजिए!...कौन है यह आदमी  या आदमियों का समूह जो डंके की चोट पर स्वयं को महान मान भी रहा है, उसका प्रचार भी कर रहा है? और एक तरह से धमकी भी दे रहा है! क्या चाहता है यह? क्यों कर रहा है यह सब? जरूरत क्या आ पड़ी इसे खुद को महान घोषित-प्रचारित करने की?...               ज़्यादा उत्तर नहीं हैं! जो हैं एक जैसे हैं! हम आप प्रायः सुनते  रहते हैं।...यह अपने स्वाभिमान की रक्षा है, यह खोए हुए आत्म-गौरव का उद्घोष है, यह अपनों में आत्म-विश्...

अवतार सिंह पाश

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                          उन्हें मारा नहीं जा सकता!...                                  अवतार सिंह पाश                  ( 9 सितम्बर, 1950 - 23 मार्च, 1988) 23 मार्च के एक और शहीद हैं पंजाबी क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाश!...जिन शक्तियों ने आज ही के दिन 1988 में उनके शरीर को उनके क्रांतिकारी विचारों के चलते गोलियों से छलनी कर दिया, वे उस मरणासन्न साम्राज्यवादी व्यवस्था के ही पोषक थे जिन्हें इतिहास में इतिकथा बनना ही है! पाश जैसे लोग कभी नहीं मरते! शहीद भगतसिंह की ही तरह!!...          सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना श्रम की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती ग़द्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती बैठे-सोए पकड़े जाना – बुरा तो है सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है पर सबसे ख़तरनाक नहीं होता कपट के शोर मे...

इंक़लाब ज़िंदाबाद!

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शहीद दिवस (23 मार्च)

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                                    और याद आएंगे                       शहीद भगतसिंह-राजगुरु-सुखदेव!           अभी बार-बार यह दिन याद आएगा, बहुत याद आएगा! देश में, दुनिया में आम जनता के जीवन पर जितना अधिक संकट बढ़ेगा, बढ़ाया जाएगा- उतनी ही तल्ख़ी के साथ यह दिन याद आएगा!                और साथ ही याद आएंगे शहीद भगत सिंह के आदर्श ब्लादीमिर इलिच लेनिन!.... याद आएगी उनकी क्रांतिकारी विरासत!                                           उनके और उनके आदर्शों के दुश्मन आज और ज़्यादा जनता के दुश्मन हैं! वे आज और ज़्यादा जनता को कष्ट दे कर अपना और ज़्यादा मुनाफ़ा बढ़ा रहे हैं!              इसीलिए शहीद भगतसिंह-राजगुरु-सुखदेव आज और ज़्यादा,...

केदारनाथ सिंह

                                   बुनाई का गीत                                                 - केदारनाथ सिंह उठो सोये हुए धागों उठो उठो कि दर्जी की मशीन चलने लगी है उठो कि धोबी पहुँच गया घाट पर उठो कि नंगधड़ंग बच्चे जा रहे हैं स्कूल उठो मेरी सुबह के धागो और मेरी शाम के धागों उठो उठो कि ताना कहीं फँस रहा है उठो कि भरनी में पड़ गई गाँठ उठो कि नाव के पाल में कुछ सूत कम पड़ रहे हैं उठो झाड़न में मोजो में टाट में दरियों में दबे हुए धागो उठो उठो कि कहीं कुछ गलत हो गया है उठो कि इस दुनिया का सारा कपड़ा फिर से बुनना होगा उठो मेरे टूटे हुए धागो और मेरे उलझे हुए धागो उठो उठो  कि बुनने का समय हो रहा है...  ★★★

राजनीति बनाम लोकनीति

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                           संकीर्णताओं का चुनाव            हाल ही में हमारे देश में कुछ राज्यों की विधानसभाओं और कुछ संसद सदस्यों की खाली हुई सीटों के चुनाव संपन्न हुए। इन चुनावों की कुछ विशेषताओं को समझने की जरूरत है। इनमें भारतीय लोकतंत्र में जगह बनाते कुछ ऐसे तत्त्वों को समझना जरूरी है जो आगे चलकर ऐसी स्थाई प्रवृत्ति के रूप में स्थापित हो सकते हैं जो पूरी चुनाव प्रणाली को जनता का मखौल बनाने की कवायद न सिद्ध कर दें! वैसे भी चुनाव जीतने वाले दल और व्यक्ति जब जनता के जीवन में कोई बदलाव लाने की जगह अपने लिए सुविधाएं बढाने लगें तो स्वाभाविक तौर पर जनता में निराशा घेरती है। लेकिन अगर चुनावों के मुद्दों से लेकर चुनाव-प्रणाली तक पर चुनावों के बाद तीखे सवाल उठें तो समझना चाहिए कि कुछ विशेष गड़बड़ है।          मसलन, त्रिपुरा में चुनाव के बाद मार्क्सवाद की प्रतीक स्वरूप लेनिन की मूर्ति तोड़ा जाना है। प्रश्न उठता है कि इससे किसी को क्या हासिल हुआ?...क्या यह इस बात का संके...

Stephen Hawking: The man of a different human strength

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श्रद्धांजलि:                         स्टीफेन हॉकिंग: अनंत सम्भावनाओं का सितारा हाँ, स्टीफेन हॉकिंग!...“ज्ञान का सबसे बड़ा शत्रु अज्ञान नही, ज्ञान का वहम है!” इसलिए कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं!...वह अनन्त संभावनाओं का अनंत कोष है। वह इस धरती में छिपा मानव सभ्यता और विकास की अनंत संभावनाओं का द्वार भी है! इसलिए स्वयं को 'पूर्ण' और ज्ञानी समझने वाला ही ज्ञान का असली शत्रु है, अज्ञानी है, उसे ही ऐसा वहम होता है, वही स्वयं को भगवान घोषित करता-करवाता है!...तुमने स्वयं अपने महान व्यक्तित्व से यह सिद्ध भी किया। एक मनुष्य का क्या, वह तो अपनी भूमिकाएं जैसी निभा पाएगा, निभाएगा- फिर अदृश्य हो जाएगा, समाप्त हो जाएगा। उसके बारे में न जाने कितनी कहानियां रची जाएंगी, कुछ सच्ची... कुछ झूठी, पर उसे आगे बढ़कर ज़िंदा वही रखेगा जो कहानियों में नहीं हकीक़त में उसे जिएगा!...तुम्हारे बारे में भी ऐसा ही होगा जैसा तुम्हारे उन पूर्वजों के बारे में हुआ, जिन्हें तुमने जिया-आगे बढ़ाया। इसलिए तुम्हारे जैसे लोगों के बारे में 'अमरता' जैसे शब्द रचे गए है...

उभरता किसान-आंदोलन

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                            उभरता किसान-आंदोलन                                                   - अशोक प्रकाश                 " ले मशालें चल पड़े हैं                लोग मेरे गांव के,               अब अंधेरा जीत लेंगे               लोग मेरे गांव के!..."       -बल्ली सिंह चीमा की यह कविता भारत के वर्तमान इतिहास के इस दौर और उभरते जबरदस्त किसान-आंदोलन पर बिल्कुल ठीक बैठती है!...कवि की कल्पनाओं में शायद देश के किसानों के जागने और वर्तमान अंधकार यानी दुर्व्यवस्था से दो-दो हाथ कर उसे परास्त करने की कामना ही रही होगी। किसान के हाथ में मशाल की जगह लाल झंडा है, वह मशाल बनकर वर्तमान अंधकार को परास्त कर देगा- यह देखना अभ...

तंत्रलोक की माया...

                             तन्त्रलोक की माया... इस दुनिया से शिकायतें बहुत हैं!...इस दुनिया की शिकायतें बहुत हैं!.... -क्यों न हों? शिकायतों के बिना कभी बढ़ी है दुनिया क्या? कौन राजा चाहता था कि उससे उसका मुकुट छिने? लेकिन लोकतंत्र आया न!...दुनिया बदली न! -कितना बदली दुनिया?...कहाँ बदली दुनिया? जहां देखो, सब उल्टा-पुल्टा! बिना घूस के, बिना जी-हुजूरी के कोई काम नहीं होता! राजाओं के नाम बदल गए...चेहरे बदल गए पर राजा नहीं बदले! अब तो हर कोई राजा ही बनना चाहता है. करना-धरना कुछ न पड़े, लेकिन चांदी कटती रहे! पहले पुश्त-दर-पुश्त राजा होते थे, एक-दो परिवार राज करते थे, अब हर कोई यही चाहता है. बात तो फिर वहीँ की वहीँ रही!... -नहीं, ऐसा नहीं है! बात वहीँ की वहीँ नहीं है. अब राजतंत्र नहीं, लोकतंत्र है. जनता ही अपना राजा चुनती है.. . -वही तो! ‘राजा’ ही चुनती है, खुद राजा थोड़े होती है! खुद तो कीड़े-मकोड़ों की तरह ज़िन्दगी जीती है. एक दिन इच्छा हुई तो वोट दे आए बस, लो हो गया लोकतंत्र!...खेत-बाड़ी, रोज़गार-धं...

इन्हें बचाइए!...

                                    इन्हें बचाओ!...          ये दोनों सच्ची घटनाएं हैं!...आपके आसपास भी घटती होंगी। किन्तु ये आकस्मिक घटनाएं नहीं हैं। ये उस समाज की सच्चाइयाँ हैं जिसके रचयिता भी हम हैं, भोक्ता भी हम हैं। ऐसी व्यवस्था बनाने या बनाए रखने में हमारा भी योगदान है!...             पहली घटना एक लड़की की है! इस लड़की की उम्र होगी 18-20 साल। कुुुछ दिन पहले खबर थी कि इसका अपहरण हो गया है। माँ-बाप के साथ सब चिंतित थे। नाते-रिस्तेेेदार, अड़ोसी-पड़ोसी, दोस्त-यार!...क्या हुआ?  अभी भी कोई ज़्यादा नहीं जानता! पहले पता चला कि इस शहर से बाहर एक उत्तरी शहर में उसकी लोकेशन मिल रही. उधर कोई इसके रिश्तेदार रहते हैं. लोग गए तो पता लगा कि वह इधर तो नहीं आई. वहां भी और लोगों से जानकारी की कोशिश की गई. थक-हारकर माँ-बाप-पुलिस सब वापस आ गए. दोस्तों-सहेलियों सब पर शक-संदेह का कोई फायदा नहीं हुआ. एक हफ़्ते बाद  अकस्मात थाने से उसकी खबर आई!... क्या...

बेरोजगारी और निजीकरण की भयावहता:

शिक्षित-बेरोजगार महिलाओं की दुर्दशा:                    सामाजिक सुरक्षा या समूह में भी असुरक्षा?                                                                     -अशोक प्रकाश              'सामाजिक सुरक्षा' के सरकारी-गैर सरकारी बहुत से दावे किये जाते हैं। इन्हीं दावों में से एक दावा 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' का भी है। अगर आप उत्तर प्रदेश की सीएम हेल्पलाइन-1076 पर जाइए तो पाइएगा कि आपकी हेल्प यानी मदद के लिए वहां बहुत कुछ है। लोग उम्मीद भी लगाते हैं और निश्चित ही लोगों को कुछ न कुछ मदद भी मिलती ही है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह मदद वास्तव में कौन करता है और क्यों करता है?...सामान्यतः यही समझ में आता है कि यह सरकार द्वारा स्थापित एक व्यवस्था है। पर यह अर्द्धसत्य है!             सीएम हेल्पलाइन-1076 द...

For An Exploitation-Free World!

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                   On International Women's Day                                   LONG LIVE                       WOMEN'S  STRUGGLE FOR                                        EXPLOITATION-FREE WORLD!

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च):

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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च ):               बहुत बदली है दुनिया, और बदलेगी!....                                                 -ममता शुक्ला साभार:  स्त्री मुक्ति लीग (फ़ेसबुक)                वह ऐतिहासिक दिन था! लेकिन हर दिन की तरह एक दिन में नहीं आया था. इस दिन के लिए न जाने कितने दिन संघर्ष हुआ था. एक समय जिस स्त्री को खरीदने-बेचने की वस्तु उसी तरह समझा जाता था जैसे गुलामों को, जानवरों को...जिसके स्त्रीत्व का खरीदारों के लिए कोई मायने नहीं था, जिसकी आहें, आंसू और असह्य पीड़ा मालिकों के लिए सिर्फ़ उपहास की वस्तु थी, उस स्त्री ने आज के दिन मनुष्य के रूप में जीने का अधिकार हासिल किया था. इसलिए रोज के दिनों की तरह निकलने वाला आज का सूरज कुछ ज़्यादा ही सुन्दर, कुछ ज़्यादा ही लाल था. यद्यपि अनेक संघर्षों के परिणाम-स्वरुप 19वीं सदी के अंत तक न्यूज़ीलैंड और आस्ट्रेलियाई ...

त्रिपुरा: वामदलों का प्रदर्शन

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                          त्रिपुरा की हिंसक घटनाओं और                      लेनिन की मूर्ति तोड़े जाने के खिलाफ़                                   वामदलों का प्रदर्शन प्रेस विज्ञप्ति: भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) 10विधानसभा मार्ग, लखनऊ-226001, फोन-2628829, 2614736.                     साभार- फेसबुक                        लखनऊ 8 मार्च। वामपंथी दलों ने त्रिपुरा में विधानसभा चुनाव के बाद भाजपाइयों व आईपीएफटी द्वारा की जा रही हिंसक तथा लोकतंत्र विरोधी कार्यवाहियों का तीव्र विरोध करते हुए वामदलों ने आज विधानसभा के सामने प्रदर्शनकिया व प्रतिरोध सभा की।  प्रदर्शन माकपा कार्यलय, 10 विधान सभा मार्ग से शुरू होकर जी  पी ओ स्थित गांधी   प्रतिम...

निरंकुशता के खिलाफ़:

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                             निरंकुशता के खिलाफ़                            शिक्षकों का विशाल धरना                       डॉ भीमराव आंबेडकर आगरा विश्वविद्यालय में गत छह मार्च को एक विशाल धरने का आयोजन किया गया। यह धरना मुख्यतः बीरी सिंह महाविद्यालय के प्राचार्य द्वारा डॉ ज्वाला सिंह और अन्य दो महिला साथियों के साथ किये गए अन्याय और दुर्व्यवहार तथा अन्य मांगों को लेकर दिया गया। धरने में उपकुलपति के अविवेकपूर्ण और तानाशाही रवैये के खिलाफ आक्रोश व्यक्त किया गया। धरने के बाद महामंत्री डॉ निशांत चौहान द्वारा निम्न निर्णय की जानकारी दी गई-   1. डॉ ज्वाला सिंह के निलंबन की ससम्मान वापसी के लिए कुलपति को केवल एक सप्ताह का समय दिया गया है। 2. कुलपति द्वारा औटा प्रतिनिधियों से अभद्रता, कुलपति की हठधर्मिता, मनमानी तरीके से नियमो की अनदेखी करते हुए कार्य करने...

इनकी नहीं है होली!...

            बेरोजगारों का धरना और सरकारी कान में रुई                                                        - नितिन  ठाकुर              यूपी- बिहार के निचले और मध्यमवर्ग के लिए एसएससी क्या मायने रखता है बताने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन शायद साइरन वाली सरकारी कारों में बैठनेवाले मंत्री और नौकरशाह बहरे हो चुके हैं. चार दिन से दिल्ली में धरने पर बैठे सैकड़ों परीक्षार्थी होली के दिन भी देश की भारी बहुमत वाली सरकार से गुहार लगाते रहे पर गृहमंत्री होली पर ढोल बजाने में मस्त दिखे और बाकी मंत्री फाग गा रहे थे. अद्भुत नज़ारा है लोकतंत्र का. जनता सड़कों पर अपने भविष्य को बचाने के लिए त्यौहार पर भी प्रदर्शन करे और मंत्री अपने सुरक्षित सरकारी बंगलों में रंग उड़ाएं. एसएससी का पर्चा सोशल मीडिया पर तैर रहा था. दुनिया उसे देख रही थी मगर अफसर बाबू सबूत पूछ रहे हैं. इस देश में पर्चा लीक होना भला...

होली है!....

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 माई  रे लोटा में रंग लिहे मैं जात रह्यौं नगरी बरसाना                                           संग रहीं दुइ चारि अली वृषभानु लली रहीं गावति गाना                                           हाथ मरोरि के छोरि के रंग भिगोइ दिहे चुनरी मनमाना                                           ऊपर से मुस्कात रहे वै नंद कै बाप जसोदा कै नाना                                                                                            ...