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Showing posts from 2019

इंटरनेट और हमारे सामाजिक रिश्ते

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                                                      इंटरनेट का दौर और  समाज के रिश्ते                                               साभार- AAAO एक बार मैं अपने अंकल के साथ एक बैंक में गया, क्यूँकि उन्हें कुछ पैसा कही ट्रान्सफ़र करना था। ये स्टेट बैंक एक छोटे से क़स्बे के छोटे से इलाक़े में था। वहां एक घंटे बिताने के बाद जब हम वहां से निकले तो उन्हें पूछने से मैं अपने आप को रोक नहीं पाया। अंकल क्यूँ ना हम घर पर ही इंटर्नेट बैंकिंग चालू कर ले? अंकल ने कहा ऐसा मैं क्यूँ करूँ ? तो मैंने कहा कि अब छोटे छोटे ट्रान्सफ़र के लिए बैंक आने की और एक घंटा टाइम ख़राब करने की ज़रूरत नहीं, और आप जब चाहे तब घर बैठे अपनी ऑनलाइन शॉपिंग भी कर सकते हैं। हर चीज़ बहुत आसान हो जाएगी। मैं बहुत उत्सुक था उन्हें नेट बैंकिंग की दुनिया के बारे मे...

हमसब #रोहिंग्या: नागरिकता कानून से हासिल क्या हुआ?

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                नागरिकता कानून से हासिल क्या हुआ ?                                                           - गुरचरन सिंह अगर सरकार की मंशा वही है जो मीडिया बता रहा है, तो क्यों हो रहा है पूरे देश में उसका विरोध ? क्यों एक खास तबका ही इसके पक्ष में खड़ा दिखाई दे रहा है ? लेकिन जवाब देने की परंपरा तो संघ-भाजपा में कभी रही ही नहीं ! बस सवाल पूछना आता है, आरोप मढ़ना आता है, मेरी कमीज़ तुम्हारी कमीज़ से उजली है, ऐसा कह कर और अधिक गलत काम करने का नैतिक आधार पाना ही आता है !...  News State के मुताबिक भारत ही नहीं, विदेशों में रह रहे भारतीय भी अब इस कानून के खिलाफ सड़क पर उतर आए हैं। जर्मनी के एक छात्र को यह विरोध महंगा पड़ गया जब  आईआईटी मद्रास के छात्रों के साथ वह भी इसके खिलाफ आ गया था। जैकब लिडेंथल नामक मद्रास आईआईटी में भौतिक विज्ञान के छात्र को पढ़ाई पूरी होने से पहले ही जर्मनी भेज ...

चार्ली चैपलिन: क्रिसमस की रात...

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अपनी बेटी के नाम                                                     क्रिसमस की रात                             और चार्ली चैप्लिन की बात चार्ली ने अपनी नृत्यांगना बेटी को एक मशहूर खत लिखा। कहा- मैं सत्ता के खिलाफ विदूषक रहा, इसलिए तुम भी गरीबी जानो, मुफलिसी का कारण ढूंढो, इंसान बनो, इंसानों को समझो, जीवन में इंसानियत के लिए कुछ कर जाओ, खिलौने बनना मुझे पसंद नहीं बेटी। मैं सबको हंसा कर रोया हूं, तुम बस हंसते रहना। बूढ़े पिता ने प्रिय बेटी को और भी बहुत कुछ ऐसा ही लिखा... मेरी प्यारी बेटी, रात का समय है। क्रिसमस की रात। मेरे इस छोटे से घर की सभी निहत्थी लड़ाइयां सो चुकी हैं। तुम्हारे भाई-बहन भी नींद की गोद में हैं। तुम्हारी मां भी सो चुकी है। मैं अधजगा हूं, कमरे में धीमी सी रौशनी है। तुम मुझसे कितनी दूर हो पर यकीन मानो तुम्हारा चेहरा यदि किसी दिन मेरी आंखों के सामने न रहे, उस ...

अय भाग जा दरिन्दे फ़ौरन

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तमाम संघर्षों को समर्पित...                                                                         ग़ज़ल                                                 -  कवि महेन्द्र मिहोनवी अय भाग जा दरिन्दे फ़ौरन मचान लेकर निकले हैं  अब परिन्दे गद्दी पे प्रान लेकर दरकी  हैं ये  ज़मीनें  कय्यक हज़ार मीलों फूटी  हैं  कुछ चटानें इतनी  उठान लेकर रस्ते  में  हर क़दम पर  खूँख़ार जानवर हैं चलना  हमें  पड़ेगा  तीरो   कमान लेकर बुलबुल को बर्तनी है अतिरिक्त सावधानी सैयाद   घूमते  हैं  टोही   विमान  लेकर जिसमें मगर के हक़ में सारे नियम बने हैं चाटेंगीं मछलियाँ क्या एसा विधान लेकर जंगल ...

बिन लड़े कुछ भी नहीं...

                              शिक्षक-नेता, सरकार और संघर्ष पर                                  एक प्रहसन -'युद्धं देहि!...' औक़ात हो तो आ, लड़! -ज़िंदाबाद-मुर्दाबाद! जिंदाबाद-मुर्दाबाद!... मुर्दाबाद-जिंदाबाद! -एमएलसी का टिकट दे दें हुज़ूर, हम इन टीचरों को संभाल लेंगे! माई-बाप! हम आपकी दुआ से ही नेता बने हैं!.. -तथास्तु!.. -भाइयों और बहनों!...सॉरी!..प्यारे शिक्षक-साथियों!...आप बैठ जाइए। सकारात्मक वार्ता हुई है। सरकार ने आपकी कुछ बातें मान ली है।... -धरना-प्रदर्शन खत्म! - सरकार झुकी!.. - अब हर तीसरे महीने आधी तनख्वाह देने पर बनी सहमति!... -होहोहोहोहीहीहीहीही!.... - गुरू! बधाई हो!... ★  सावधान रहें! नेता से ज़्यादा संगठन और उसकी दशा-दिशा को समझें,           भरोसा करें! ★ क्योंकि  'बिन लड़े कुछ भी नहीं मिलता!'                   ...

ख्वाबों में जीते-मरते प्रतियोगी-विद्यार्थी की एक मर्म-कथा

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                     ख्वाबों में जीते-मरते प्रतियोगी- विद्यार्थी  की                                         एक मर्म-कथा             19-20 साल की छोटी सी उम्र में गाव की पगडंडियों से उठ कर, एक गठरी में दाल, चावल, आटा बांध कर जब एक लड़का खड़खड़ाती हुई बस में अपने हौसलो केउड़ान के साथ बैठता है तब उसके दिमाग में बत्तियां जलती है जो बत्तियां लाल होती है या नीली होती है और यही सोंचते-सोंचते वह कब इलाहाबाद /नई  दिल्ली  पहुंच जाता है उसको पता ही नहीं चलता। फिर यहाँ से शुरू होती है जिंदगी की जद्दोजहद, नौकरी की तलाश।               जब लड़का अपने कमरे में कदम रखता है उस दिन उसकी एक ऐसी साधना शुरू होती है जो कभी अकेला नहीं करता, जब वह फॉर्म डालता है तो उसकी माँ किसी देवी माँ की मनौती मान देती है, उसकी बहन मन ही मन खुश होती है। उसके पिता दस लोगो से इसका जिक्र...

शिक्षक हैं तो!...

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                                     शिक्षक हैं तो                           और सीखिए, और सिखाइए!             जीवन एक संघर्ष है और इस संघर्ष को जितना ही मानव-सभ्यता के संघर्ष से जोड़कर हम देखते हैं, उतना ही यह मजेदार लगता है। हमारी तकलीफ़ भी सिर्फ़ हमारी नहीं होती। हमें यह भी पता चलता है कि इसे झेलने वाले हम कोई विरले इंसान नहीं हैं!...           तो फिर इस पर इतना हायतौबा करते हुए जीना कैसा?...          दरअसल, यह जीवन एक विराट और न ख़त्म होने वाली यात्रा की तरह है। यह यात्रा मानव-सभ्यता की विकास-यात्रा है। एक इंसान को  इस यात्रा को हमेशा ही बेहतर और सुखद बनाने की कोशिश करना चाहिए!         हम इस संसार को जितना बेहतर देख, जान, समझ सकेंगे उतना बेहतर जी सकेंगे, इसे और बेहतर बनाने की कोशिश कर सकेंगे। तो इस संसार को ज़्यादा स...

नोटबन्दी की तरह 'भाषा - बंदी'

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अंग्रेज़ी_माध्यम क्यों?                                          भाषा की बंदी                                                             -  रहीम पोन्नाड नोटबंदी की तर्ज पर केरल के एक कवि #रहीम_पोन्नाड ने मलयालम में एक कविता लिखी थी #भाषा_निरोधनम जिसका अनुवाद ए आर सिन्धुऔर वीना गुप्ता ने किया और हमने थोड़ा सा संपादन ! एक नए किस्म का प्रयोग है, भाषा के जरिए नोटबंदी की स्थितियों को फिर से जिया गया है ! #बादल_सरोज की वाॅल से यह कविता हिंदी दर्शन के जरिए प्राप्त हुई है ! आप भी आंनद लें :                                      प्रस्तुति:   गुरचरन सिंह  (फेसबुक- साभार)                ...

प्रेरणा- ऐप बनाम 'शिक्षक की जासूसी'

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'शिक्षक की जासूसी' का   डिज़िटल  संस्करण 'प्रेरणा-ऐप' : वे हमें चोर समझते हैं!... वे, जिनकी चोरी की समानान्तर व्यवस्था पूरे समाज में बदबू की तरह फैली है... वे, जो अंग्रेजों के दलालों के रूप में हमारे देश और उसकी  भोली-भाली जनता को  गुलाम बनाए रखे खून चूसा... वे, जो खुद बंगलों में रहते रहे और झोपड़ियों को खाक में मिलाते रहे... वे, जो रोबदाब मतलब  शोषण और अत्याचार के पर्याय हैं वे,'आखर का उजियारा फैलाने वाले' देश के भविष्य की एक मात्र उम्मीद शिक्षक को चोर समझते हैं!... पूंजी के संचार माध्यमों से शिक्षकों को  बदनाम करने  वालों असली चोरों के असली सरदारों, समाज की चेतना के एकमात्र वाहक शिक्षक भी तुम्हें   अच्छी तरह समझते हैं!...                           - अशोक प्रकाश 'प्रेरणा-ऐप' की प्रेरणादायी परिस्थितियाँ                महान जासूस 008 जेम्स बांड के डिजिटल-अवतार       ...

वोट और शादी...

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                                   वोट और शादी                                          -  गुरचरन सिंह पहले कहा, कुछ दिन की ही बात है, पचास दिन में कर दूंगा सब सही बस ये नोटबंदी की मुश्किलें थोड़ा बरदाश्त कर लो ! फिर कहा, जीएसटी शुरू तो होने दो सब ठीक हो जाएगा धीरे धीरे। फिर कहा गंदगी मत फैलाओ, शौचालय जाओ, भले ही उसमें पानी न हो ! . फिर कहा, योग करो, व्यायाम करो देसी 'दवा दारू' करो भूल जाओ सरकारी अस्पताल, अपनी फिटनेस पर ध्यान दो ! अब फरमाते हैं, गाड़ी में सब काग़ज़ात और जेबों में नोट भर कर निकलना और दारू पीने के बाद तो गाड़ी कतई न चलाना ! भैयाजी हमने तो सिर्फ वोट ही दिया था कोई शादी थोड़ी न की थी, जो हुक्म पर हुक्म दिए जा रहे हो !!!                                  ...

'प्रेरणा' ऐप के खिलाफ दो पोस्ट

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'प्रेरणा' ऐप के खिलाफ़ दो whatsapp पोस्ट:                                         एक चिन्ता हमारे प्रिय शिक्षक साथियों !!! हमारे जो साथी यह समझ रहे है कि प्रेरणा एप्प केवल समय से आने जाने भर के लिए बनी है उनसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया इस विश्लेषण को पूरा पढ़े और सरकार की गहरी साजिश को समझे। देश मे महामन्दी की शुरुआत हो चुकी है। GDP ग्रोथ रेट कम हो गयी है,  अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में मंदी है , प्राइवेट सेक्टर से कर्मचारियों की छटनी चालू हो चुकी है । अब सरकारी क्षेत्रों से कर्मचारियों को निकालने की बारी है। हमारे राज्य में यह काम होमगार्ड से चालू हो चुका है । अगली बारी प्राथमिक के शिक्षकों की है। चुकी प्राथमिक विद्यालय कोई फैक्ट्री तो है नही जिसका आउटपुट सरकार को दिखाई दे इसलिए सरकार हमे खजाने पर बोझ मानती है। हम लोग संख्या में अधिक है, हमारा वेतन भी अच्छा है और हमारा कोई भी ताकतवर  संग़ठन  नही है ,इसलिए हम लोगों की छटनी करना आसान है। यहाँ माननीय मंत्री जी के ...

जल संकट- कैसे और किससे?...

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                                                                      'जल-बचाओ, जीवन-बचाओ'                                          पर                                कैसे और किससे?...                  https://youtu.be/Hq0XQa57FkA                        दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन शहर के बाद हमारे देश के खूबसूरत समुद्र के किनारे बसे चेन्नई शहर को भूमिगत जल-शुष्क शहर प्रचारित किया जा रहा है। और ऊपर से लेकर नीचे के स्तर तक इसका दोष आम जनता पर मढ़ा जा रहा है। ध्यान देंगे तो पाएंगे कि हमेशा हर समस्या की जड़ जनता और उसक...

#शिक्षक-दिवस...-क्या शिक्षक-दिवस?..

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शिक्षक-दिवस?...क्या शिक्षक-दिवस?           प्राथमिक शिक्षा और उसके शिक्षकों की व्यथा-कथा !            पांच सितम्बर, 2019 को पूरे उत्तर प्रदेश के शिक्षक 'प्रेरणा ऐप' को दुष्प्रेरणा ऐब यानी बुरी नीयत से जबरन सेल्फी-प्रशासन लागू करने की कोशिश मानते हुए विरोध-प्रदर्शन एवं धरने पर रहे! शिक्षकों का मानना है कि तथाकथित 'प्रेरणा' ऐप अमेरिकी सर्वर द्वारा संचालित एक ऐसा असुरक्षित ऐप है जिसका परिणाम शिक्षकों को गैर-ज़िम्मेदार, कामचोर, लापरवाह, अनुशासनहीन आदि सिद्ध करके उनका वेतन काटना, अनुपस्थित दिखाकर दंडित करना, नौकरी से बर्खास्त करना आदि होना है। पिछले कुछ समय से शिक्षकों को फंसाने के इस तरह के हथकण्डे अपनाए जा रहे हैं जिससे ऐसा प्रतीत होता है शासन-प्रशासन की नज़र में समाज का जैसे सबसे बड़ा दोषी और नाकारा वर्ग शिक्षकों का ही है! लेकिन अर्थव्यवस्था की खामियों से जूझ रही सरकारों का असल मकसद शिक्षा-व्यय  में  कटौती ही प्रतीत होता है! शायद इसीलिए शिक्षकों की नौकरी मांग रहे न केवल लाखों बेरोजगार नौजवान बल्कि किसी तरह नौकरी पा ग...

अमेज़ॉन के जंगल कौन बचाएगा?

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पर्यावरण:                      अमेज़ॉन के जंगल कौन बचाएगा?  'धरती के फेफड़े' अमेज़ॉन के जंगलों की आग मुनाफालोभियों की करतूत है। अमेज़ॉन के ये जंगल पूरे विश्व की 20 फीसदी ऑक्सीजन के पैदा करने वाले रहे हैं!.. किन्तु आज ये जंगल, तमाम सारे जंगल के प्राणी, पेड़-पौधे, वनस्पतियां त्राहि-त्राहि कर रहे हैं! वहाँ की मुनाफालोभियों की पोषक सरकार बहाने बना रही है या उन्हें सपोर्ट कर रही है। ये मुनाफालोभी हमारे देश में भी हैं! दरअसल, मानवता के ये दुश्मन किसी देश के नहीं हैं! मुनाफा ही उनका देश है, मुनाफालोभी ही उनके दोस्त-यार हैं! अगर हम इनसे बचने के उपाय न खोज पाए तो पूरी धरती को ये तबाह कर देंगे! खुद भी कहाँ और कब तक बचेंगे?...ये इस तबाही को 'विकास' नाम देते हैं!              ऐसी होती है मानवद्रोहियों की नीति! इनसे खुद बचिए, धरती को बचाइए!...

#uid #आधार किसलिए?..

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                              #uid #आधार किसलिए?..                   https://youtu.be/dQGlaJZtFFA               यह एक साधारण प्रश्न है?... इसके विशेष तकनीकी पहलुओं, आधारकार्ड को लेकर एक नागरिक की निजता पर उठाए जाते सवालों आदि को अंदाज़ कर दिया जाय तो क्या इस विशिष्ट पहचान नम्बर/कार्ड का सचमुच किसी नागरिक की पहचान से कोई सरोकार है?..यह प्रश्न एक नागरिक द्वारा प्रेषित एक वीडियो के चलते उठाया जा रहा है।           वाराणसी या जौनपुर का निवासी एक वृद्ध व्यक्ति उम्र के चलते , परेशानी के चलते अपना गांव-पता ठीक से नहीं बता पा रहा। वह घर जाने, घर वालों से मिलने के लिए लगातार रो रहा है। एक सज्जन उसकी मदद करना चाहते हैं किंतु एक सीमा के आगे वे असहाय हैं। वे सोशल मीडिया पर अपील करते हैं कि इस व्यक्ति की मदद की जाय!...                सवाल है कि आधार कार्ड बनाते समय किस...

आत्मालाप-26: समय आ गया है...

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                              समय आ गया है...                                             - अशोक प्रकाश समय आ गया है कि हम पहले ताली बजायें फिर अपनी पीठ थपथपाएँ कि... 'आपके अवशेष और वेतन भुगतान हेतु स्वीकृत बजट विधान सभा और विधान परिषद में प्रस्तुत कर दिया गया है... और जल्दी ही दोनों जगहों से पारित हो जाएगा।...' इसलिये जरूरी है कि हम इस पर कोई सवाल न उठाएं सिर्फ़ ताली बजायें मसलन... घोषणाओं को मिल गया, मिल गया- बतायें क्या-क्या नहीं मिला या चला गया... - ऐसे सवाल नहीं उठाएं... नीला, हरा होते हुए जो भगवा हो गया है उसकी विजय-पताका फहरायें इसे शिक्षक समुदाय की बहुत बड़ी जीत बताएं जोर-जोर से चिल्लाएं! उसे विधानसभा या संसद पहुंचाने का जश्न मनायें अभी से माला पहनाएं! समय आ गया है उसे नेता बनाएं खुद भाड़ में जाएं!....               ...

आत्मालाप-25: हे मूर्तियों...

                               हे मूर्तियों!...                                              - अशोक प्रकाश हे मूर्तियों, तुम्हारा अमूर्तन कीर्तन अब न कोई सुनेगा न कोई समझेगा! जबकि वे मॉबलिंचिंग को समय का मुहावरा बता रहे हैं तुम्हारे घर को ही तुम्हारा दुश्मन बना रहे हैं तुम शांतिपाठ के नए श्लोक गढ़ रहे हो विराट-यज्ञ की आहुति के धूम्रपाल बन रहे हो!.. हे धूम्रपाल, भ्रमपाल होने का समय गया तुम्हारी पोथियों में नहीं रहा कोई दम संसार सूर्य और चंद्र का ग्रहण कर रहा है यथार्थ की धरती पर मुक्तिबोध और मृत्युबोध की जगह मुक्तिमार्ग का वरण कर रहा है!... समर्पण का कोई भी विन्यास मानव-सभ्यता के विकास का उपहास है विकास और विनाश का कोई भी भ्रम सिर्फ़ जड़ता और कायरता का एक और संन्यास है!...                       ...