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Showing posts from October, 2018

आत्मालाप-14: आप क्या कर लीजिएगा

                        आप क्या कर लीजिएगा...                                                -अशोक प्रकाश आप क्या कर लीजिएगा अगर मशीनें चुन लेंगी किसी को आपके नाम से??... इसको या उसको घोषित किया जाएगा राजा और प्रजा बनने के लिए अभिशप्त आप टुकुर-टुकुर ताकते मसोस रहे होंगे किसी तख्त या चारपाई को! आप क्या कर लीजिएगा अगर मतदाता बन जाएंगे मशीन जाएंगे सिर्फ़ उधर धक्का खाएंगे जिधर??... किसी हत्यारे को थमा देंगे न्यायाधीश का प्रमाण-पत्र और क़त्लेआम को घोषित कर दिया जाएगा धर्मयुद्ध! आप क्या कर लीजिएगा अगर खेतों में उगेंगे सिर्फ कांटे रोटी के लिए दिखाए जाएंगे बूचड़खानों के रास्ते ??... आप क्या कर लीजिएगा जब आप के बच्चे नहीं पहचानेंगे आपका चेहरा और भूल जाएंगे अपने गांव- अपने देश का नाम! आप क्या कर लीजिएगा??  ★★★

कैम्पस बचाओ, शिक्षा बचाओ, देश बचाओ!:

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'दशहरा' पर एक मार्मिक कविता:

                                 ' जानकी के लिए '...                                                   -  राजेश्वर वशिष्ठ मर चुका है रावण का शरीर स्तब्ध है सारी लंका सुनसान है किले का परकोटा कहीं कोई उत्साह नहीं किसी घर में नहीं जल रहा है दिया विभीषण के घर को छोड़कर । सागर के किनारे बैठे हैं विजयी राम विभीषण को लंका का राज्य सौंपते हुए ताकि सुबह हो सके उनका राज्याभिषेक बार-बार लक्ष्मण से पूछते हैं अपने सहयोगियों की कुशल-क्षेम चरणों के निकट बैठे हैं हनुमान ! मन में क्षुब्ध हैं लक्ष्मण कि राम क्यों नहीं लेने जाते हैं सीता को अशोक वाटिका से पर कुछ कह नहीं पाते हैं । धीरे-धीरे सिमट जाते हैं सभी काम हो जाता है विभीषण का राज्याभिषेक और राम प्रवेश करते हैं लंका में ठहरते हैं एक उच्च भवन में । भेजते हैं हनुमान को अशोक-वाटिका यह समाचार देने के लिए कि...

आत्मलाप-13: 'हे राम! हाय राम!!...'

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                               हे राम! हाय राम!!...                                                     - अशोक प्रकाश हे राम! महत्त्वपूर्ण यह नहीं कि तुम कब थे? या तुम नहीं थे! महत्त्वपूर्ण यह है कि तुम हो... कहाँ हो? 'रामायण' में, 'उत्तर राम चरितं' में, कबीर की साखियों और पदों में, 'राम चरित मानस' में, 'कम्बन रामायण' में, 'रामचंद्रिका' में, 'मेघनाथ वध काव्य' में, रवींद्र के 'काब्बेर उपेक्षिता' में, महावीर प्रसाद द्विवेदी के- 'कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता' में, मैथिली शरण गुप्त के 'साकेत' में, निराला की- 'राम की शक्तिपूजा' और 'तुलसीदास' में, ललई यादव की 'सच्ची रामायण' में, नरेन्द्र कोहली की 'रामकथा' में, भगवान सिंह के 'अपने-अपने राम' में, रामानन्द सागर के 'रामायण' में, चंदन एन सिंह लिखित- जी-टीवी के 'रावण' में, मणिरत्नम की फ़िल्म 'रावण'...

Mee-Too मसला:- गुरचरन सिंह

              #MeToo_ का मसाला और मीडिया का नशा                                                           - गुरचरन सिंह           क्या सोशल मीडिया और क्या टुकड़खोर 'गैर सोशल मीडिया' सब जगह इसी का जादू सर चढ़ कर बोलने लगा है ! देश की सबसे बड़ी समस्या बन गई है यह जिस पर बहस चलना जीने मरने के सवाल जैसा लगने लगा है। महंगाई, गरीबी, सामाजिक और आर्थिक गैर-बराबरी, बेरोजगारी कहीं हैं नहीं ! लगता है जैसे अच्छे दिन आ ही गए आखिरकार! गुजरे जमाने की सिने तारिकाएं और महिला पत्रकार तो खुल कर आ गई हैं मैंदान में और इस #मीडिया_ट्रायल की आंच कई नामी गिरामी लोगों तक पहुंचने लगी है। और इसी के साथ आमने सामने हैं  औरतों की सस्ती सहानुभूति बटोरने वाले समर्थक और राजनीतिक झंझावात में भी अपना फोकस बनाए रखने की कोशिश करते लोग ! इसलिए मेरी प्रार्थना है कि इसे महिलाओं के प्रति मेरा असम्मान न समझा जाए भल...

आत्मलाप-12: 'मी-टू'...

                                'मी-टू' के लिए...                                                  -अशोक प्रकाश बलात्कार के पहले अब जरूरी कर दिया गया है हासिल करना प्रेम-प्रमाणपत्र यौन-हिंसा के लिए गढ़ लिए गये हैं यौन-सहयोग के नए व्याकरण ताकि  अनारो और चमेली  कभी भी चमकती आंखों से न देखें  बसंत के सपने जानें न पाएं हाथ से उनके  जो हर फूल की खुशबू का हकदार सिर्फ़ स्वयं को मानते हैं! लिखा ली गई हैं चार-पांच चिट्ठियां... बिखेर दिए गये हैं शरद ऋतु के कुछ पुष्प कापियों पर... विद्यालयों में पढ़ा दिए गये हैं नायिका-भेद और नखशिख-वर्णन यौन-शिक्षा के बहाने... ताकि गले से निकली हर चीख  हृदय का हर रक्त-प्रवाह सिद्ध किया जा सके किसी प्रेमोन्माद का अतिरेक किसी ऊढ़ा नायिका का रतिराग ! हे बचाई और पढ़ाई जाने वाली बेटियों, 'मी-टू' के लिए ही त...

कविता: न छापेगा कोई अखबार - रमेशराज

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                 तेवरीकार कवि रमेश राज की दो कविताएँ एक: तिमिर ने घेरा सुखद प्रभात, न छापेगा कोई अख़बार भोर के बदले आयी रात, न छापेगा कोई अख़बार । दिखायी देता अजब जूनून, उतारी सब भेड़ों से ऊन लगाये बैठे चीते घात, न छापेगा कोई अख़बार। हुआ सारी ख़ुशियों का अंत, दिखायी देता अजब वसंत सूखे हरे-हरे सब पात, न छापेगा कोई अख़बार । पुजें अब केवल तस्कर-चोर, मंच पर छाये आदमखोर बढ़ी हर नंगे की औकात, न छापेगा कोई अख़बार। कि जिसकी खातिर बना विधान, उसी का कदम-कदम अपमान उसी जनता को गहरी मात, न छापेगा कोई अख़बार।                                          दो: बताकर- “दूंगा जीवन-दान " और कितनों की लेगा जान ? अहिंसा से हिंसा का खेल ख़िलाड़ी तू भी बड़ा महान !! हमें भी दीख रहा उत्थान कंठ से गायब हैं मधुगान। छीन ली कोयल जैसी कूक अधर से फूलों-सी मुस्कान।। बता पहले-सा सीना तान कहाँ तक झेलें हम तूफान ? कभी तो हो आफत का अंत ढहे जाते सारे अन...

किसान-मार्च:

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                    किसानों के लड़ाकू जज्बे को सलाम                                                          - पुरुषोत्तम शर्मा             एक अक्टूबर को दिल्ली के गाजीपुर बार्डर पर रोके गए “किसान क्रान्ति मार्च” में शामिल किसानों का सब्र का बाँध दो अक्टूबर की दोपहर होने तक आखिर टूट ही गया. वे दिल्ली की सीमा पर अवरोध खड़े किए दिल्ली पुलिस और अर्ध सैनिक बलों से भिड़ गए. दस दिनों से हरिद्वार से चला किसानों का यह शांतिपूर्ण मार्च आखिर दो अक्टूबर को दिल्ली के दरवाजे पर आकर पुलिस के साथ मुठभेड़ में बदल ही गया. पुलिस से भिड़ते समय किसानों की मांग सिर्फ इतनी थी कि उन्हें चौधरी चरणसिंह की समाधि “किसान घाट” तक जाने दिया जाए, ताकि वे अपनी समस्याओं को देश के सामने रख सकें. किसानों को अगर एक अक्टूबर की रात किसान घाट जाने दिया गया होता, तो दिल्ली में न यातायात बाधित होने ...