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Showing posts from 2017

माटी के गीत:

                                                            होइगै मोर धरोहर गायब...                                                                                         -चिंतन 'साकेतपुरी'  चम्पा और चमेली गायब ।  फुलवन से ऊ खुश्बू गायब ॥ छोट छोट चीनी के आगे ।  बडी बडी गुड भेली गायब ॥                                सरिया मह से धेनू गायब ।                                माठा मह से नैनू गायब ॥            ...

सवाल दर सवाल है!...:

                               निजीकरण का कारोबार और राजनीति                                   सवालों के घेरे                                                      -नरेश गोस्वामी                 राजनीति को सिर्फ़ चुनाव, नेता और तात्कालिक आंकड़ों के मुहावरे में क्यों  देखा जाए ? क्या उसे कहीं ओर से देखना संभव नहीं है?                 हमारे आसपास चीज़ें कितना बदल गई हैं ! सिर्फ तीसेक सालों के हेरफेर में। तीसेक साल पहले दिल्ली में भी अधिकांश लोग अपने घर- यानी अपने द्वारा बनाए गए घर में रहते थे। एनसीआर और देश के बाक़ी महानगरों से सटे देहात में यह बात अजूबी मानी जाती थी कि एक ही बिल्डिंग के पहले, दूसरे या ती...

हास्य-व्यंग्य:

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              स्वतंत्र भारत के बेटे और बेटियों !                                            -काका हाथरसी (  काका हाथरसी की यह कविता चर्चित भी रही और हँसाया भी खूब, पर वैसे नहीं कि हवा में उड़ जाय, आप भी पढ़िये! - भूपाल सिंह (प्रस्तुति)!  )                 स्वतंत्र भारत के बेटे और बेटियों! माताओं और पिताओं, आओ, कुछ चमत्कार दिखाओ। नहीं दिखा सकते ? तो हमारी हाँ में हाँ ही मिलाओ। हिंदुस्तान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान मिटा देंगे सबका नामो-निशान बना रहे हैं-नया राष्ट्र ‘मूर्खिस्तान’ आज के बुद्धिवादी राष्ट्रीय मगरमच्छों से पीड़ित है प्रजातंत्र, भयभीत है गणतंत्र इनसे सत्ता छीनने के लिए कामयाब होंगे मूर्खमंत्र-मूर्खयंत्र कायम करेंगे मूर्खतंत्र। हमारे मूर्खिस्तान के राष्ट्रपति होंगे- तानाशाह ढपोलशंख उनके मंत्री (यानी चमचे) होंगे- खट्टासिंह, लट्ठासिंह, खाऊलाल, झपट्टासिंह रक्षामंत्री-...

एक चिट्ठी- शिक्षा-व्यवस्था पर:

                        एक पत्र...- प्रधानमन्त्री के नाम प्रिय श्री मोदी जी , आप देश के लिए बहुत कुछ करना चाहते हैं , यह आपके शब्दों से ही नहीं कार्यों से स्पष्ट हो रहा है। आप उन बुनियादी समस्याओं पर ध्यान दे रहे हैं जिन पर लोगों का ध्यान जाना चाहिए पर जाता नहीं है। स्वच्छ भारत अभियान उनमें से एक है। इसके लिए आप साधुवाद के पात्र हैं। इसी दृष्टि से मैं यह पत्र आपको लिख रहा हूँ ताकि कुछ और आवश्यक बातों की ओर आपका ध्यान जा सके। क्योंकि आप मुझे जानते नहीं हैं , इसलिए मैं निवेदन करूँ कि मैं 28वर्ष तक एनसीईआरटी में कार्यरत था और वहाँ से 1988 में मैंने अवकाश ग्रहण किया। 1950 से अब तक शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत हूँ और अभी भी 86 वर्ष की अवस्था में उसी कार्य में संलग्न हूँ। मैं शिक्षा के बारे में कुछ जानता हूँ और मुझे उस क्षेत्र का कुछ अनुभव है, इसलिए यह पत्र आपको संबोधित है। यह देखकर खेद होता है कि जहाँ आप देश को सभी दिशाओं में आगे ले जाने का प्रयास कर रहे हैं , आपकी दृष्टि में शिक्षा ने वह स्थान नहीं पाया है जिसकी वह ...

उच्च-शिक्षा- 3: भारत की उच्च शिक्षा

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                         🔴भारत की उच्च शिक्षा🔴                                          -प्रोफेसर वी एस दीक्षित,                                                 दिल्ली विश्विद्यालय             आज सरकारों ने शिक्षा को अपनी नीतियों से ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहाँ से समाधान का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है।हर तरफ तबाही का आलम है चाहे वो शिक्षकों की बात हो, विद्यार्थियों की बात हो या कर्मचारियों की बात हो। शिक्षा ब्यवस्था में शिक्षक,विद्यार्थी और कर्मचारी एक दूसरे के पूरक हैं। एक दूसरे के बिना किसी की कोई गति नहीं है। आज निजीकरण और व्यापारीकरण की सरकारी नीतियों ने इन सभी को कहीं न कहीं बुरी तरह से प्रभावित किया है।    विद्यार्थियों की वजह से शिक्षक हैं ।क...

काकोरी काण्ड के शहीद:

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पंकज-पोस्टर:

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   निसार तेरी गलियों के अए वतन, कि जहाँ / फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ निसार मैं तेरी गलियों के अए वतन, कि जहाँ चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले जो कोई चाहनेवाला तवाफ़ को निकले नज़र चुरा के चले, जिस्म-ओ-जाँ बचा के चले है अहल-ए-दिल के लिये अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशाद कि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद बहोत हैं ज़ुल्म के दस्त-ए-बहाना-जू के लिये जो चंद अहल-ए-जुनूँ तेरे नाम लेवा हैं बने हैं अहल-ए-हवस मुद्दई भी, मुंसिफ़ भी किसे वकील करें, किस से मुंसिफ़ी चाहें मगर गुज़रनेवालों के दिन गुज़रते हैं तेरे फ़िराक़ में यूँ सुबह-ओ-शाम करते हैं बुझा जो रौज़न-ए-ज़िंदाँ तो दिल ये समझा है कि तेरी मांग सितारों से भर गई होगी चमक उठे हैं सलासिल तो हमने जाना है कि अब सहर तेरे रुख़ पर बिखर गई होगी ग़रज़ तसव्वुर-ए-शाम-ओ-सहर में जीते हैं गिरफ़्त-ए-साया-ए-दिवार-ओ-दर में जीते हैं यूँ ही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़ न उनकी रस्म नई है, न अपनी रीत नई यूँ ही हमेशा खिलाये हैं हमने आग में फूल न उनकी हार नई है न अपनी जीत नई इसी सबब से फ़लक का गिला नहीं करते त...

आत्मालाप-5: मैं हूँ महान!

                                                   मैं हूँ महान!                                             -अशोक प्रकाश 🔴 मैं महान हूँ सब लोग आओ माला पहनाओ! जो माला नहीं पहनाएंगे क़त्ल किए जाएंगे माला पहनाने वाले क़ातिल कहलाएंगे! मैं बना रहूंगा महान और ज्ञानवान, मैं हूँ महान! आओ ताली बजाओ!... मैंने मारे हैं न जाने कितने तीर जहां में मुझसे बड़ा नहीं कोई वीर! अगर नहीं मानोगे पीता रहूँगा प्रान,  मैं हूँ महान! गाओ मेरे गुण गाओ!... मैं ये कर दूंगा मैं वो कर दूंगा थाली में सबके तारे भर दूंगा! हाँ-हाँ हूँ-हूँ करो पैसे दूंगा दान, मैं हूँ महान! खाओ चाहो तो चबाओ!... देखो वहां तिजोरी है न उसकी है न तेरी है! कुंडली मारे बैठा हूँ ले लूँगा जान, मैं हूँ महान! हाथ मत लगाओ जाओ यहां से जाओ!... 🔴

उच्च शिक्षा-2: AIFRTE

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        ' विश्व व्यापार संगठन' के तथाकथित 'समझौतों' से                        भारत की उच्च-शिक्षा बचाओ! 'अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार मंच (All India Forum For Right To Education)' का यह पर्चा 'विश्व व्यापार संगठन' से उच्च-शिक्षा को बचाने की अपील करता है!...उच्च-शिक्षा के साथ हो रहे खिलवाड़ को बेनक़ाब करता यह पर्चा आज भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है!... http://aifrte.in/sites/default/files/AIFRTE%20docs/RTE%20Campaign/AIFRTE_WTO%20Leaflet_Revised%20on%2022april2014.pdf

वाह!:

                                 डिज़िटल   उपवास                                                                                  प्रस्तुति:   सिद्धार्थ सिंह               सवेरे से मित्र को चार पांच बार फोन किया । लेकिन उसका फोन उठ ही नहीं रहा था। व्हाट्सएप और फेसबुक पर भी मैसेज किया लेकिन कोई जवाब नहीं।मुझे चिंता हो गई आखिर दोपहर बाद रहा नहीं गया। मैं नजदीक ही रहने वाले  मित्र के घर पहुंच गया।...             देखा तो श्रीमान गार्डन में एक पुस्तक लेकर बैठे हुए थे।मैं जाते ही बरस पड़ा-         " सुबह से तुम्हें  फोन कर रहा हूं, मैसेज भी कर रहा हूं ...लेकिन तुम्हारा कोई जवाब ही नहीं मिल रहा! ......

आज की तस्वीर:

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🔴यही मज़बूरी है बड़ी संख्या में हमारे देश के गाँवों/शहरों में रहने वाले गरीब घरों के बच्चों की!...अगर इनके परिवारों को आर्थिक रूप से इतना सबल नहीं बनाया जा सकता कि बाकी मध्यवर्ग की तरह वे इनकी पढ़ाई-लिखाई को ज़्यादा महत्त्व देने लायक हो जाएं, तब तक मध्याह्न भोजन...जूता-कपड़ा से इस दशा में अपेक्षित सुधार नहीं होगा!..       किसी अध्यापक को बलि का बकरा भले बना दिया जाय, पर अध्यापकों के हाथ में ज़्यादा कुछ नहीं है!...रोटी का गणित इससे जूझते लोगों को संख्याओं के गणित से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण लगेगा ही!!🏼🔴

उच्च-शिक्षा-1: 'उच्च शिक्षा बचाओ' दिवस

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                                                              ' उच्च-शिक्षा बचाओ' दिवस पर                 पूरे देश के विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों में                                      धरना-प्रदर्शन विगत ३० नवम्बर को अखिल भारतीय विश्वविद्यालय-महाविद्यालय शिक्षक महासंघ ( AIFUCTO )के आह्वान पर देश भर के शिक्षकों ने काली पट्टी बांधकर उच्च-शिक्षा सम्बन्धी केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ 'उच्च-शिक्षा बचाओ' दिवस मनाया. इस दिन विभिन्न शिक्षक संगठनों ने धरना दिया तथा सातवाँ वेतनमान विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों के शिक्षकों के लिए लागू करने में हीला-हवाली के प्रति विरोध जताया. शिक्षकों का कहना है कि जबकि प्राथमिक, उच्च-प्राथमिक, माध्यमिक विद्यालयों के लिए सातवें वेतनमान क...

आत्मलाप-4 : हे बादशाहों

                                                        हे बादशाहों!...                                               - अशोक प्रकाश                        हे बादशाहों,                        आओ!                        मेरा बचा-खुचा मांस ले जाओ                        रखवालों ने ही                        मेरी बोली लगाईं है...                        आओ, आओ, आओ!   ...

एक कवि:

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                                    स्वाधीन कलम                                    - गोपाल सिंह नेपाली राजा बैठे सिंहासन पर, यह ताजों पर आसीन क़लम, मेरा धन है स्वाधीन क़लम! जिसने तलवार शिवा को दी रोशनी उधार दिवा को दी पतवार थमा दी लहरों को खंजर की धार हवा को दी अग-जग के उसी विधाता ने, कर दी मेरे आधीन क़लम मेरा धन है स्वाधीन क़लम! रस-गंगा लहरा देती है मस्ती-ध्वज फहरा देती है चालीस करोड़ों की भोली किस्मत पर पहरा देती है संग्राम-क्रांति का बिगुल यही है, यही प्यार की बीन क़लम मेरा धन है स्वाधीन क़लम! कोई जनता को क्या लूटे कोई दुखियों पर क्या टूटे कोई भी लाख प्रचार करे सच्चा बनकर झूठे-झूठे अनमोल सत्य का रत्‍नहार, लाती चोरों से छीन क़लम मेरा धन है स्वाधीन क़लम! बस मेरे पास हृदय-भर है यह भी जग को न्योछावर है लिखता हूँ तो मेरे आगे सारा ब्रह्मांड विषय-भर है रँगती चलती संसार-पटी,...

ज्वलंत:

                          अहंकार की 'राजनीति' उत्तर प्रदेश के कई जिलों में गत 26 नवंबर को सम्पन्न हुए चुनाव में एक प्रवृत्ति आम थी : चुनाव-आयोग की भरसक कोशिशों के  बावज़ूद लोग चुनाव में बहुत कम वोट डालने पहुँचे! क्यों?...इसका सटीक उत्तर किसी के पास नहीं है। पर एक बात आम तौर पर देखी गई। राजनीतिक दलों के  अपने-अपने चुनाव-चिह्नों से चुनाव लड़ने की घोषणा करने के बावज़ूद न तो इन दलों ने और न ही इनके प्रत्याशियों ने मतदाताओं से कोई विशेष संपर्क किया! शायद इन्हें यह विश्वास हो चला है कि इनके वोटर जाएंगे कहाँ!...आख़िर लौट के उन्हें इनके पास ही आना है...इन्हें ही वोट देना है। इसीलिए सिवाए एकाध रैलियों और किसी प्रांतीय नेता की एकाध जनसभा के  इन्होंने सिर्फ़ अपने ही टिकट से वंचित रहे नेताओं को मनाने का काम किया। इन्हें डर था तो सिर्फ़ रूठे नेताओं के 'वोट-बैंक' को साधने का। उधर आम मतदाता अपने प्रति इनकी इस बेरुखी से अपने को उपेक्षित महसूस करता रहा!             दलों और प्रत्याशियों की...

उत्तर प्रदेश में निकाय-चुनाव

     उत्तर प्रदेश में आजकल निकाय चुनाव चल रहे हैं। नगर-निगमों और महानगरों की व्यवस्थाओं को देखने के लिए इनका इस्तेमाल होता है। किन्तु बहुधा देखा गया है कि जनता की असुविधाएं जस की तस रहती हैं, पर चुने गए प्रतिनिधियों के वारे-न्यारे हो जाते हैं। यही कारण है कि संसदीय चुनावों की तरह इन चुनावों में भी आम जनता की रुचि ज़्यादा नहीं है। ज़्यादातर प्रत्याशियों, उनके रिश्तेदारों, उनके यारों की ही इन चुनावों में विशेष रुचि देखी जाती है। बाकी लोग तो बस इसे 'त्यौहार' मानते हैं। सब जगह छुट्टी होती है, इसलिए 'चलो, वोट दें आएं'...'मज़मा देख आएं'...-जैसा दृष्टिकोण सर्वत्र दिखाई पड़ता है। 'पब्लिक' इसे 'तमाशा' सिद्ध करती है। लगभग पचास से साठ फीसदी वोटिंग इस बात का सबूत है कि जन-प्रतिनिधि कहे जाने वाले लोगों को बड़ी संख्या में लोग अपना नुमाइंदा नहीं मानते।          इसका मुख्य कारण हमारे हुक्मरानों द्वारा इन और उन चुनावों के बाद 'पब्लिक' को अपने से अलग कर स्वयं को 'राजा' जैसा दिखाना है। 'विकास' के नाम पर सड़कों आदि की कुछ मरम्मत हो जाने मात्र से ज...

कलीम आजिज़

तुम क़त्ल करो हो की करामात करो हो! दिन एक सितम, एक सितम रात करो हो वो दोस्त हो, दुश्मन को भी जो मात करो हो. मेरे ही लहू पर गुज़र औकात करो हो मुझसे ही अमीरों की तरह बात करो हो हम खाकनशीं तुम सुखन आरा ए सरे बाम पास आके मिलो दूर से क्या बात करो हो हमको जो मिला है वो तुम्हीं से तो मिला है हम और भुला दें तुम्हें? क्या बात करो हो दामन पे कोई छींट न खंजर पे कोई दाग तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो यूं तो कभी मुँह फेर के देखो भी नहीं हो जब वक्त पड़े है तो मुदारात करो हो बकने भी दो आजिज़ को जो बोले है बके है दीवाना है, दीवाने से क्या बात करो हो.

'संविधान-दिवस' और 'हम भारत के लोग'!

            'संविधान-दिवस' और 'हम भारत के लोग '                                                          -अशोक प्रकाश आज 'संविधान-दिवस' है!...पता नहीं क्यों पिछले कुछ सालों से भारत की आज़ादी के संघर्षों के प्रतीकों से कुछ लोगों को विशेष लगाव प्रदर्शित करने की जरूरत पड़ रही है! पता नहीं, आज़ादी के संघर्षों से उन्हें विशेष प्यार उमड़ आया है या वे इस प्रदर्शन से अपने पुरोधाओं के सद्कर्मों से संतुष्ट नहीं हैं और उन्हें बताना पड़ रहा है कि देखो, हम भी देशप्रेमी हैं, देशभक्त हैं...हम भी आज़ादी के संघर्षों से खुद को जोड़ते हैं। 'संविधान-दिवस' के प्रचार-प्रसार के इस नए दौर से कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। वरना, हम सब जानते हैं कि आज ही के दिन-26 नवम्बर, 1949 को देश के संविधान को 'आत्मार्पित' किया गया था! इस 'आत्मार्पण' की प्रक्रिया से दूर रहे कुछ लोग मनुस्मृति के संविधान को आज भी अपना सर्वश्रेष्ठ मार्ग-दर्शक मानते हैं और च...
किसान मुक्ति संसद:

एक रिपोर्ट :

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                                            किसान मुक्ति संसद             20-21 नवम्बर को दिल्ली ने रामलीला मैदान से संसद मार्ग तक किसानों के किसानों के जत्थे ही जत्थे देखे। पूरे देश के हज़ारों किसानों ने किसानों के प्रति सरकारों की बेरुखी के खिलाफ ' किसान मुक्ति संसद ' के माध्यम से सम्पूर्ण कर्ज़ा-मुक्ति और उपज का डेढ़ गुना मूल्य की प्रमुख मांगों से सम्बंधित प्रस्ताव पास कर केंद्र-सरकार के समक्ष रखा!             प्रस्तुत है सत्यवान की एक रिपोर्ट:                दिल्ली के संसद मार्ग पर आयोजित 'किसान मुक्ति संसद' में एकत्र हुए हजारों किसानों को संबोधित करते हुए स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव ने कहा कि सभी किसान यहाँ नरेंद्र मोदी की ओर ऊँगली उठा कर इशारा कर रहे हैं कि उन्होंने किसानों को गर्त में धकेल दिया है। बिहार भाजपा अध्यक्ष ने एक विवादित बयान देते हुए कहा था...

आत्मालाप-3 : उठो किसानों

    🔴आह्वान-गीत🔴                         उठो किसानों आगे आओ!                                                                                 -अशोक प्रकाश                             उठो किसानों आगे आओ, आगे आकर देश बचाओ। हदें हैं सारी पार हो रहीं, कृषक-क्रान्ति का बिगुल बजाओ।। खेत तुम्हारे देश तुम्हारा फिर तू है क्योंकर  बेचारा। पूंजीपति क्यों मौज़ मारते तू क्यों फिरता मारा-मारा।। खाद-बीज-पानी-बिजली को तरस रहे क्यों ज़रा बताओ! उठो किसानों आगे आओ... खेतों के लिए कर्ज़ ले रहे क़र्ज़ कहें या मर्ज़ ले रहे। खेतों का दुश्मन मरना था आखिर तुम क्यों स्वयं मर रहे।। देखो दुष्ट हँस रहा तुम पर उठो कब्र से मज़ा चखाओ! उठो किसानों आगे आओ... कर्ज़मा...