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इंटरनेट और हमारे सामाजिक रिश्ते

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                                                      इंटरनेट का दौर और  समाज के रिश्ते                                               साभार- AAAO एक बार मैं अपने अंकल के साथ एक बैंक में गया, क्यूँकि उन्हें कुछ पैसा कही ट्रान्सफ़र करना था। ये स्टेट बैंक एक छोटे से क़स्बे के छोटे से इलाक़े में था। वहां एक घंटे बिताने के बाद जब हम वहां से निकले तो उन्हें पूछने से मैं अपने आप को रोक नहीं पाया। अंकल क्यूँ ना हम घर पर ही इंटर्नेट बैंकिंग चालू कर ले? अंकल ने कहा ऐसा मैं क्यूँ करूँ ? तो मैंने कहा कि अब छोटे छोटे ट्रान्सफ़र के लिए बैंक आने की और एक घंटा टाइम ख़राब करने की ज़रूरत नहीं, और आप जब चाहे तब घर बैठे अपनी ऑनलाइन शॉपिंग भी कर सकते हैं। हर चीज़ बहुत आसान हो जाएगी। मैं बहुत उत्सुक था उन्हें नेट बैंकिंग की दुनिया के बारे मे...

हमसब #रोहिंग्या: नागरिकता कानून से हासिल क्या हुआ?

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                नागरिकता कानून से हासिल क्या हुआ ?                                                           - गुरचरन सिंह अगर सरकार की मंशा वही है जो मीडिया बता रहा है, तो क्यों हो रहा है पूरे देश में उसका विरोध ? क्यों एक खास तबका ही इसके पक्ष में खड़ा दिखाई दे रहा है ? लेकिन जवाब देने की परंपरा तो संघ-भाजपा में कभी रही ही नहीं ! बस सवाल पूछना आता है, आरोप मढ़ना आता है, मेरी कमीज़ तुम्हारी कमीज़ से उजली है, ऐसा कह कर और अधिक गलत काम करने का नैतिक आधार पाना ही आता है !...  News State के मुताबिक भारत ही नहीं, विदेशों में रह रहे भारतीय भी अब इस कानून के खिलाफ सड़क पर उतर आए हैं। जर्मनी के एक छात्र को यह विरोध महंगा पड़ गया जब  आईआईटी मद्रास के छात्रों के साथ वह भी इसके खिलाफ आ गया था। जैकब लिडेंथल नामक मद्रास आईआईटी में भौतिक विज्ञान के छात्र को पढ़ाई पूरी होने से पहले ही जर्मनी भेज ...

चार्ली चैपलिन: क्रिसमस की रात...

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अपनी बेटी के नाम                                                     क्रिसमस की रात                             और चार्ली चैप्लिन की बात चार्ली ने अपनी नृत्यांगना बेटी को एक मशहूर खत लिखा। कहा- मैं सत्ता के खिलाफ विदूषक रहा, इसलिए तुम भी गरीबी जानो, मुफलिसी का कारण ढूंढो, इंसान बनो, इंसानों को समझो, जीवन में इंसानियत के लिए कुछ कर जाओ, खिलौने बनना मुझे पसंद नहीं बेटी। मैं सबको हंसा कर रोया हूं, तुम बस हंसते रहना। बूढ़े पिता ने प्रिय बेटी को और भी बहुत कुछ ऐसा ही लिखा... मेरी प्यारी बेटी, रात का समय है। क्रिसमस की रात। मेरे इस छोटे से घर की सभी निहत्थी लड़ाइयां सो चुकी हैं। तुम्हारे भाई-बहन भी नींद की गोद में हैं। तुम्हारी मां भी सो चुकी है। मैं अधजगा हूं, कमरे में धीमी सी रौशनी है। तुम मुझसे कितनी दूर हो पर यकीन मानो तुम्हारा चेहरा यदि किसी दिन मेरी आंखों के सामने न रहे, उस ...

अय भाग जा दरिन्दे फ़ौरन

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तमाम संघर्षों को समर्पित...                                                                         ग़ज़ल                                                 -  कवि महेन्द्र मिहोनवी अय भाग जा दरिन्दे फ़ौरन मचान लेकर निकले हैं  अब परिन्दे गद्दी पे प्रान लेकर दरकी  हैं ये  ज़मीनें  कय्यक हज़ार मीलों फूटी  हैं  कुछ चटानें इतनी  उठान लेकर रस्ते  में  हर क़दम पर  खूँख़ार जानवर हैं चलना  हमें  पड़ेगा  तीरो   कमान लेकर बुलबुल को बर्तनी है अतिरिक्त सावधानी सैयाद   घूमते  हैं  टोही   विमान  लेकर जिसमें मगर के हक़ में सारे नियम बने हैं चाटेंगीं मछलियाँ क्या एसा विधान लेकर जंगल ...

बिन लड़े कुछ भी नहीं...

                              शिक्षक-नेता, सरकार और संघर्ष पर                                  एक प्रहसन -'युद्धं देहि!...' औक़ात हो तो आ, लड़! -ज़िंदाबाद-मुर्दाबाद! जिंदाबाद-मुर्दाबाद!... मुर्दाबाद-जिंदाबाद! -एमएलसी का टिकट दे दें हुज़ूर, हम इन टीचरों को संभाल लेंगे! माई-बाप! हम आपकी दुआ से ही नेता बने हैं!.. -तथास्तु!.. -भाइयों और बहनों!...सॉरी!..प्यारे शिक्षक-साथियों!...आप बैठ जाइए। सकारात्मक वार्ता हुई है। सरकार ने आपकी कुछ बातें मान ली है।... -धरना-प्रदर्शन खत्म! - सरकार झुकी!.. - अब हर तीसरे महीने आधी तनख्वाह देने पर बनी सहमति!... -होहोहोहोहीहीहीहीही!.... - गुरू! बधाई हो!... ★  सावधान रहें! नेता से ज़्यादा संगठन और उसकी दशा-दिशा को समझें,           भरोसा करें! ★ क्योंकि  'बिन लड़े कुछ भी नहीं मिलता!'                   ...

ख्वाबों में जीते-मरते प्रतियोगी-विद्यार्थी की एक मर्म-कथा

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                     ख्वाबों में जीते-मरते प्रतियोगी- विद्यार्थी  की                                         एक मर्म-कथा             19-20 साल की छोटी सी उम्र में गाव की पगडंडियों से उठ कर, एक गठरी में दाल, चावल, आटा बांध कर जब एक लड़का खड़खड़ाती हुई बस में अपने हौसलो केउड़ान के साथ बैठता है तब उसके दिमाग में बत्तियां जलती है जो बत्तियां लाल होती है या नीली होती है और यही सोंचते-सोंचते वह कब इलाहाबाद /नई  दिल्ली  पहुंच जाता है उसको पता ही नहीं चलता। फिर यहाँ से शुरू होती है जिंदगी की जद्दोजहद, नौकरी की तलाश।               जब लड़का अपने कमरे में कदम रखता है उस दिन उसकी एक ऐसी साधना शुरू होती है जो कभी अकेला नहीं करता, जब वह फॉर्म डालता है तो उसकी माँ किसी देवी माँ की मनौती मान देती है, उसकी बहन मन ही मन खुश होती है। उसके पिता दस लोगो से इसका जिक्र...

शिक्षक हैं तो!...

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                                     शिक्षक हैं तो                           और सीखिए, और सिखाइए!             जीवन एक संघर्ष है और इस संघर्ष को जितना ही मानव-सभ्यता के संघर्ष से जोड़कर हम देखते हैं, उतना ही यह मजेदार लगता है। हमारी तकलीफ़ भी सिर्फ़ हमारी नहीं होती। हमें यह भी पता चलता है कि इसे झेलने वाले हम कोई विरले इंसान नहीं हैं!...           तो फिर इस पर इतना हायतौबा करते हुए जीना कैसा?...          दरअसल, यह जीवन एक विराट और न ख़त्म होने वाली यात्रा की तरह है। यह यात्रा मानव-सभ्यता की विकास-यात्रा है। एक इंसान को  इस यात्रा को हमेशा ही बेहतर और सुखद बनाने की कोशिश करना चाहिए!         हम इस संसार को जितना बेहतर देख, जान, समझ सकेंगे उतना बेहतर जी सकेंगे, इसे और बेहतर बनाने की कोशिश कर सकेंगे। तो इस संसार को ज़्यादा स...