मिथक बनाम यथार्थ: 'राधा'


                                  हे जी, जै-जै राधे!..



          'धारा विरुद्धा या सा राधा....'- जो धारा, सामाजिक मान्यताओं-सीमाओं के खिलाफ़ है, वही राधा है! हाँ, धारा को उलट दीजिए तो ध्वनि-विपर्यय से शब्द बनता है- 'राधा'! क्या यही है राधा का तात्पर्य? क्या राधा अथवा राधाओं ने धारा अथवा धाराओं को उलटने का का काम किया था? कृषि-कर्म से काले पड़े कृष्ण या कृष्णों का साथ देना, वह भी बाल-विवाहिता/ओं के लिए क्या धारा को उलट देना नहीं था? क्या कोई राधा या राधाएँ थीं? क्या कृष्ण ने अकेले ही कृषि-संस्कृति के विकास का बीड़ा उठाया था या हलधर-बलराम जैसे अनेक लोग और अनेक राधाएँ इस कृषि-कर्म की ओर उद्यत होकर कंस अथवा मधुराधिपति की जंगली-संस्कृति के खिलाफ उठ खड़े हुए थे?...क्या श्रीमद्भागवत के तथाकथित आधुनिक व्यासों/गपोलियों/टल्लीयों की तरह कोई भी कुछ भी अर्थ लगा सकता है मिथकों य प्रतीकों का? क्या लोकमानस को भरमजाल में फंसाने और इसे अपना धंधा बनाने वाले लोग ही किसी लोकग्रन्थ के एकमात्र व्यास/व्याख्याता/विशिष्ट-वक्ता हो सकते हैं?....क्या धर्मग्रन्थों में जो लिख दिया गया वह इतिहास/तथ्य/एकमात्र-सत्य है?...

      - इस तरह के न जाने कितने सवाल आपको आपने घेरे में ले सकते हैं यदि आप वृंदावन के राधारानी-मन्दिर/बरसाना अथवा गोवर्धन की ओर प्रस्थान करते हैं। यदि आप भारतीय संस्कृति के गंभीर अध्येता हैं, मूलतः भारतीय हैं तो आपके मन में अपने अतीत के इस कोने की ओर झांकने की बार-बार उत्सुकताएँ जागृत होगीं।



       आप जरूर राधारानी-मन्दिर के दर्शन कीजिए, प्रसाद चढ़ाइए और उसका एक अंश पाने की कोशिश कीजिए! साथ ही उन कल्पनाओं को अपराध मत मानिए जो आपके मन में इस विशिष्ट सांस्कृतिक-क्षेत्र के भ्रमण या 'परिक्रमा' के वक़्त आपके मन में उठती हैं!... ★★★

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