किसान आंदोलन की प्रतिबद्धता


            किसान आंदोलन की प्रतिबद्धता



                
किसान आंदोलन की प्रतिबद्धता

सचमुच यह एक अद्भुत प्रतिरोध है! इसकी मिसाल इस शताब्दी के शुरुआती दिनों में तो नहीं ही देखी जाती, पिछली शताब्दी में भी इसकी ज़्यादा मिसालें नहीं हैं। कहने वाले कुछ भी कहें 'सरकार की नकेल में नथ' डालने का काम तो इसने किया ही है!..लेकिन सरकार सिर्फ पुलिस और अफसर ही तो नहीं होते। उनके भी ऊपर बड़े सरकार हैं। और वे कोई नेता नहीं हैं। देशी-विदेशी पूंजी के घाघ हैं, बड़ी-बड़ी कम्पनियों के मालिक हैं, पूँजीपति हैं!

यद्यपि पूँजीपतियों ने इसका मतलब यही निकाला होगा कि देश की प्राकृतिक संपदा से मुनाफ़ा उठाने में उन्हें अब अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी। क्योंकि उनका काम तो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष अबाध गति से चल ही रहा है। तीनों कृषि संबंधी कानून लाने का मक़सद भले ही बेनकाब हो गया हो पर कृषि-उपज का खरीदना-बेचना, खेती को ठेके पर लेने के लिए अनुबंध करना, सस्ते में खरीदारी और कुछ समय बाद बिक्री- माल रोककर महंगा करना तथा फिर जिंस बाज़ार से मनमर्जी मुनाफ़ा कमाना नहीं रुका है। किसान आंदोलन का फ़ायदा उठाने की भी कोशिश हुई है। जनता को केवल किसानी मसले में लटकाकर खाद के दामों में मनमर्जी मूल्यबृद्धि की गई है। डीज़ल-बिजली के रेट लगातार बढाने का क्रम जारी रखा गया है।

फिर भी किसान आंदोलन कम या ज़्यादा, पूँजीपतियों और शासकों के लिए एक चुनौती है। संवैधानिक दायरों के प्रति प्रतिबद्धता के कारण इसे कुचलने की सारी कोशिशें उल्टा पड़ी हैं शासकों। यहाँ तक कि जिन किसान नेताओं को तोड़ लेने की आशंका जताई जा रही थी, उनसे भी शासकों को कुछ खास सफलता नहीं मिली। एक दो नेता और समूह किसान आंदोलन को छोड़कर घर जरूर बैठ गए, पर विशेषकर पंजाब-हरियाणा के किसानों ने आंदोलन को पूरी प्रतिबद्धता के साथ 5 महीने बाद भी इसे चलाए रखा है। यही नहीं उत्तरप्रदेश, राजस्थान, उड़ीसा, तमिलनाडु आदि राज्यों से भी इसे जबरदस्त समर्थन मिला है। यही कारण है कि देश में ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस आंदोलन की गूंज सुनाई दी है।

       यह देखना दिलचस्प होगा कि सचमुच यह किसान आंदोलन शासकों से अपनी मांगें मनवा पाता है कि नहीं। फिलहाल, निश्चित तौर पर आज़ादी के बाद का यह सबसे बड़ा किसान आंदोलन सिद्ध हुआ है।

                               ★★★★★★★

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