बिन लड़े कुछ भी नहीं...
शिक्षक-नेता, सरकार और संघर्ष पर एक प्रहसन -'युद्धं देहि!...' औक़ात हो तो आ, लड़! -ज़िंदाबाद-मुर्दाबाद! जिंदाबाद-मुर्दाबाद!... मुर्दाबाद-जिंदाबाद! -एमएलसी का टिकट दे दें हुज़ूर, हम इन टीचरों को संभाल लेंगे! माई-बाप! हम आपकी दुआ से ही नेता बने हैं!.. -तथास्तु!.. -भाइयों और बहनों!...सॉरी!..प्यारे शिक्षक-साथियों!...आप बैठ जाइए। सकारात्मक वार्ता हुई है। सरकार ने आपकी कुछ बातें मान ली है।... -धरना-प्रदर्शन खत्म! - सरकार झुकी!.. - अब हर तीसरे महीने आधी तनख्वाह देने पर बनी सहमति!... -होहोहोहोहीहीहीहीही!.... - गुरू! बधाई हो!... ★ सावधान रहें! नेता से ज़्यादा संगठन और उसकी दशा-दिशा को समझें, भरोसा करें! ★ क्योंकि 'बिन लड़े कुछ भी नहीं मिलता!' ...