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बिन लड़े कुछ भी नहीं...

                              शिक्षक-नेता, सरकार और संघर्ष पर                                  एक प्रहसन -'युद्धं देहि!...' औक़ात हो तो आ, लड़! -ज़िंदाबाद-मुर्दाबाद! जिंदाबाद-मुर्दाबाद!... मुर्दाबाद-जिंदाबाद! -एमएलसी का टिकट दे दें हुज़ूर, हम इन टीचरों को संभाल लेंगे! माई-बाप! हम आपकी दुआ से ही नेता बने हैं!.. -तथास्तु!.. -भाइयों और बहनों!...सॉरी!..प्यारे शिक्षक-साथियों!...आप बैठ जाइए। सकारात्मक वार्ता हुई है। सरकार ने आपकी कुछ बातें मान ली है।... -धरना-प्रदर्शन खत्म! - सरकार झुकी!.. - अब हर तीसरे महीने आधी तनख्वाह देने पर बनी सहमति!... -होहोहोहोहीहीहीहीही!.... - गुरू! बधाई हो!... ★  सावधान रहें! नेता से ज़्यादा संगठन और उसकी दशा-दिशा को समझें,           भरोसा करें! ★ क्योंकि  'बिन लड़े कुछ भी नहीं मिलता!'                   ...

ख्वाबों में जीते-मरते प्रतियोगी-विद्यार्थी की एक मर्म-कथा

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                     ख्वाबों में जीते-मरते प्रतियोगी- विद्यार्थी  की                                         एक मर्म-कथा             19-20 साल की छोटी सी उम्र में गाव की पगडंडियों से उठ कर, एक गठरी में दाल, चावल, आटा बांध कर जब एक लड़का खड़खड़ाती हुई बस में अपने हौसलो केउड़ान के साथ बैठता है तब उसके दिमाग में बत्तियां जलती है जो बत्तियां लाल होती है या नीली होती है और यही सोंचते-सोंचते वह कब इलाहाबाद /नई  दिल्ली  पहुंच जाता है उसको पता ही नहीं चलता। फिर यहाँ से शुरू होती है जिंदगी की जद्दोजहद, नौकरी की तलाश।               जब लड़का अपने कमरे में कदम रखता है उस दिन उसकी एक ऐसी साधना शुरू होती है जो कभी अकेला नहीं करता, जब वह फॉर्म डालता है तो उसकी माँ किसी देवी माँ की मनौती मान देती है, उसकी बहन मन ही मन खुश होती है। उसके पिता दस लोगो से इसका जिक्र...

शिक्षक हैं तो!...

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                                     शिक्षक हैं तो                           और सीखिए, और सिखाइए!             जीवन एक संघर्ष है और इस संघर्ष को जितना ही मानव-सभ्यता के संघर्ष से जोड़कर हम देखते हैं, उतना ही यह मजेदार लगता है। हमारी तकलीफ़ भी सिर्फ़ हमारी नहीं होती। हमें यह भी पता चलता है कि इसे झेलने वाले हम कोई विरले इंसान नहीं हैं!...           तो फिर इस पर इतना हायतौबा करते हुए जीना कैसा?...          दरअसल, यह जीवन एक विराट और न ख़त्म होने वाली यात्रा की तरह है। यह यात्रा मानव-सभ्यता की विकास-यात्रा है। एक इंसान को  इस यात्रा को हमेशा ही बेहतर और सुखद बनाने की कोशिश करना चाहिए!         हम इस संसार को जितना बेहतर देख, जान, समझ सकेंगे उतना बेहतर जी सकेंगे, इसे और बेहतर बनाने की कोशिश कर सकेंगे। तो इस संसार को ज़्यादा स...

नोटबन्दी की तरह 'भाषा - बंदी'

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अंग्रेज़ी_माध्यम क्यों?                                          भाषा की बंदी                                                             -  रहीम पोन्नाड नोटबंदी की तर्ज पर केरल के एक कवि #रहीम_पोन्नाड ने मलयालम में एक कविता लिखी थी #भाषा_निरोधनम जिसका अनुवाद ए आर सिन्धुऔर वीना गुप्ता ने किया और हमने थोड़ा सा संपादन ! एक नए किस्म का प्रयोग है, भाषा के जरिए नोटबंदी की स्थितियों को फिर से जिया गया है ! #बादल_सरोज की वाॅल से यह कविता हिंदी दर्शन के जरिए प्राप्त हुई है ! आप भी आंनद लें :                                      प्रस्तुति:   गुरचरन सिंह  (फेसबुक- साभार)                ...

प्रेरणा- ऐप बनाम 'शिक्षक की जासूसी'

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'शिक्षक की जासूसी' का   डिज़िटल  संस्करण 'प्रेरणा-ऐप' : वे हमें चोर समझते हैं!... वे, जिनकी चोरी की समानान्तर व्यवस्था पूरे समाज में बदबू की तरह फैली है... वे, जो अंग्रेजों के दलालों के रूप में हमारे देश और उसकी  भोली-भाली जनता को  गुलाम बनाए रखे खून चूसा... वे, जो खुद बंगलों में रहते रहे और झोपड़ियों को खाक में मिलाते रहे... वे, जो रोबदाब मतलब  शोषण और अत्याचार के पर्याय हैं वे,'आखर का उजियारा फैलाने वाले' देश के भविष्य की एक मात्र उम्मीद शिक्षक को चोर समझते हैं!... पूंजी के संचार माध्यमों से शिक्षकों को  बदनाम करने  वालों असली चोरों के असली सरदारों, समाज की चेतना के एकमात्र वाहक शिक्षक भी तुम्हें   अच्छी तरह समझते हैं!...                           - अशोक प्रकाश 'प्रेरणा-ऐप' की प्रेरणादायी परिस्थितियाँ                महान जासूस 008 जेम्स बांड के डिजिटल-अवतार       ...

वोट और शादी...

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                                   वोट और शादी                                          -  गुरचरन सिंह पहले कहा, कुछ दिन की ही बात है, पचास दिन में कर दूंगा सब सही बस ये नोटबंदी की मुश्किलें थोड़ा बरदाश्त कर लो ! फिर कहा, जीएसटी शुरू तो होने दो सब ठीक हो जाएगा धीरे धीरे। फिर कहा गंदगी मत फैलाओ, शौचालय जाओ, भले ही उसमें पानी न हो ! . फिर कहा, योग करो, व्यायाम करो देसी 'दवा दारू' करो भूल जाओ सरकारी अस्पताल, अपनी फिटनेस पर ध्यान दो ! अब फरमाते हैं, गाड़ी में सब काग़ज़ात और जेबों में नोट भर कर निकलना और दारू पीने के बाद तो गाड़ी कतई न चलाना ! भैयाजी हमने तो सिर्फ वोट ही दिया था कोई शादी थोड़ी न की थी, जो हुक्म पर हुक्म दिए जा रहे हो !!!                                  ...

'प्रेरणा' ऐप के खिलाफ दो पोस्ट

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'प्रेरणा' ऐप के खिलाफ़ दो whatsapp पोस्ट:                                         एक चिन्ता हमारे प्रिय शिक्षक साथियों !!! हमारे जो साथी यह समझ रहे है कि प्रेरणा एप्प केवल समय से आने जाने भर के लिए बनी है उनसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया इस विश्लेषण को पूरा पढ़े और सरकार की गहरी साजिश को समझे। देश मे महामन्दी की शुरुआत हो चुकी है। GDP ग्रोथ रेट कम हो गयी है,  अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में मंदी है , प्राइवेट सेक्टर से कर्मचारियों की छटनी चालू हो चुकी है । अब सरकारी क्षेत्रों से कर्मचारियों को निकालने की बारी है। हमारे राज्य में यह काम होमगार्ड से चालू हो चुका है । अगली बारी प्राथमिक के शिक्षकों की है। चुकी प्राथमिक विद्यालय कोई फैक्ट्री तो है नही जिसका आउटपुट सरकार को दिखाई दे इसलिए सरकार हमे खजाने पर बोझ मानती है। हम लोग संख्या में अधिक है, हमारा वेतन भी अच्छा है और हमारा कोई भी ताकतवर  संग़ठन  नही है ,इसलिए हम लोगों की छटनी करना आसान है। यहाँ माननीय मंत्री जी के ...