आत्मालाप -11: मैं हनुमान
मैं हनुमान!
- अशोक प्रकाश
मैं नहीं था कभी भी
बन्दर...
तुमने देखा और कहा-
वा!नर!!...
बना दिया मुझे
वानर से बंदर!
चेहरे पर मेरे
उगा दिए बाल
मुँह उभारा मेरा
पूँछ लगाई
चिल्लाए बोले- बन्दर...बन्दर!
'बैबून' से 'बाबू' की तरह
दुत्कार फटकार मार और
काम से तुम्हारे प्यार ने
सिर झुकाए मुझे
दास बनाया
दास को राजा से
बड़ा बताया...
मेरी दासता की
महानता के
लिखे-लिखाए भक्ति-गीत
यह था
मेरा अतीत!...
गुलाम हो गया मैं
मेरा वंश मेरा भविष्य!
मैं न वानर हूँ न बन्दर
तुम्हारी ही तरह
मैं भी हूँ इंसान
मैं
हनुमान
पहाड़ उठा सकता हूँ
असंभव को संभव
बना सकता हूँ
याद रखना
पहाड़ से तुम्हें
खदेड़ सकता हूँ
हमेशा के लिए
सचमुच
आदमी
बना सकता हूँ! ★★★
Hnuman bhagwan hain.
ReplyDeleteपूंजीवादी व्यवस्था ने मज़दूर को बंदर बना कर रख दिया है। अपने मुनाफे के लिए मज़दूरों से जानवरों की तरह बर्ताव और काम लेते हैं। लेकिन ये बंदर जिस दिन बिगड़ गया उस दिन पूंजीपतियों की लंका में आग लगा देगा और इनकी आदमखोर व्यवस्था का धुआं बनाकर उड़ा देगा।
ReplyDeleteठीक कह रहे हैं राकेशजी!...यह विडम्बना अत्यंत दुखदाई है!
ReplyDeleteठीक लिखा,लेकिन इसमें उतना ही विलंभ है जितना रावण के अंत के लिए श्रीराम अवतार था।
ReplyDelete'विलंभ'?...कहाँ से लाए ये विचित्र शब्द अज्ञात-बन्धु?
ReplyDelete...
और रावण-श्रीराम अवतार पर तो न जाने कितनी कविताएँ लिखी गई हैं, कल्पनाएँ की गई हैं! हर कविता-कल्पना में मरुत-नंदन विद्यमान भी नहीं हैं!
आप भी कुछ लिखिए!