तैयार है विपक्ष:
'विपक्ष' की बहुप्रचारित अवधारणा से अलग; सांसदों-विधायकों की दुनिया से कोसों दूर; चमचमाती कारों, लकदक कुर्तों, आगे-पीछे पुलिस और चमचों से भिन्न देश में एक अन्य विपक्ष भी है! जनता के रूप में मरते-खपते इस विपक्ष की भूमिकाएँ प्रायः किसी भी चुनाव के बाद नहीं बदलतीं। इसे सरकारें तब तक महत्त्व नहीं देतीं जब तक कि इसका आक्रोश सड़कों, खेतों, कारखानों में फुट नहीं पड़ता। फिर इसे 'हिंसक भीड़', 'शरारती तत्त्व', 'अराजकतावादी', 'उग्रवादी' जैसे कई नामों से पुकारा-प्रचारा जाने लगता है। संदीप खरे ने ऐसे ही विपक्ष को 'तैयार है विपक्ष' कविता में ढालने की कोशिश की है। पढ़ें:...
तैयार है विपक्ष …
- संदीप खरे
तैयार है, विपक्ष...
खेतों की मेड़ पर
कारखानों के गेट पर
चाय की दुकानों पर
पसीना बेचता चौराहों पर
अस्पतालों के गेट पर
डिग्रियां लिए
खुली सड़कों पर
बच्ची-बच्चा जनती
अस्पतालों के गेट पर
ललचाई आँखों से
अंगूठा चमकाती
कोटे की दुकान पर
पकौड़ा बेचता
स्कूल के गेट पर
खाली डब्बों सी
उदास ज़िंदगी लिए
मुफ्त नेटवर्क के मोबाइल पर...
सुलग रहा है विपक्ष
जम्बो दीप के
ज्वालामुखी की तरह
खाली हाथ, सूनी आँखें,
सूखे ओंठ, चिपकी आंतें लिए
ढूंढ़ रहा है
उस चौकीदार को
जिसने गिरवी रख दिया है
अपना ईमान और हमारा मान। ★★★
Ek dam sateek comment h present politics per
ReplyDeleteबहुत खूब ।
ReplyDeleteजनतंत्र की ताकत को बयाँ करती हुई कविता ।
🙏🙏🙏
इस मरते खपते और महत्वहीन विपक्ष के मन का ज्वालामुखी जब फूटेगा तो अन्य शोषणकारी विपक्ष इसके लावे में दबकर दम तोड़ देगा और यहीं से शोषित विपक्ष की नई शुरुआत होगी।
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