आत्मालाप-25: हे मूर्तियों...



                               हे मूर्तियों!...

                                             - अशोक प्रकाश


हे मूर्तियों,
तुम्हारा अमूर्तन कीर्तन
अब
न कोई सुनेगा
न कोई समझेगा!

जबकि वे
मॉबलिंचिंग को
समय का मुहावरा बता रहे हैं
तुम्हारे घर को ही
तुम्हारा दुश्मन बना रहे हैं
तुम
शांतिपाठ के नए श्लोक
गढ़ रहे हो
विराट-यज्ञ की आहुति के
धूम्रपाल बन रहे हो!..

हे धूम्रपाल,
भ्रमपाल होने का समय गया
तुम्हारी पोथियों में नहीं रहा
कोई दम
संसार
सूर्य और चंद्र का ग्रहण
कर रहा है
यथार्थ की धरती पर
मुक्तिबोध और मृत्युबोध की जगह
मुक्तिमार्ग का वरण
कर रहा है!...

समर्पण का कोई भी विन्यास
मानव-सभ्यता के विकास का
उपहास है
विकास और विनाश का
कोई भी भ्रम
सिर्फ़
जड़ता और कायरता का
एक और संन्यास है!...

                           ★★★★★★

Comments

  1. यह कविता भृमजाल में फँसेमन को इंगित करती है।

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  2. आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया!..

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  3. बहुत सार्थक।

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