बजट : 2 : चुनावी जुमला -एआईकेएमएस


बजट: 2019-20 

                                        चुनावी जुमला - 
                      खेती व बेरोजगारों को कोई राहत नही!

               पहली बार किसी सरकार ने देश का बजट पेश किया पर उससे पहले देश को यह नहीं बताया कि उसके मूल्यांकन में देश के आर्थिक हालात क्या हैं। यह दिखाता है कि सरकार जनता से सच छिपाना चाहती है। बजट प्रस्ताव झूठ पर आधारित हैं और धोखा देने से प्रेरित हैं।
                
                बजट में लघु व सीमान्त किसानों के लिए, यानि जो 5 एकड़ से कम के मालिक हैं, 6000 रुपये प्रति साल का आय/लागत सहयोग देने की घोषणा की है। यह ओडीशा में 10 व तेलंगाना में 8 हजार प्रति एकड़ के हिसाब से दिए गए सहयोग से बहुत कम है, लगभग उसका 1/8 व 1/6 है। एक-दो हेक्टेयर भूमि के मालिक के लिए यह सहयोग 1200 रु0 प्रति एकड़ प्रति साल बैठेगा। इसमें से 2000 रु. चुनावी रिश्वत के रूप में हाल फिलहाल खाते में आएगा जिसकी भविष्य में कोई गारंटी नहीं है। यही नहीं 55 फीसदी किसान भूमिहीन हैं जो बंटाईदार के रूप में या किराये पर जमीन लेकर काम करते हैं। इनको सरकार की योजना ने छुआ तक नहीं है।

               किसानों का संकट लागत के दाम खासकर डीजल, खाद, बीज, कीटनाशकों में तीव्र वृद्धि, सिंचाई की अव्यवस्था, एमएसपी में कुछ वृद्धि व सरकारी खरीद की गारंटी न होने से फसलों की दुर्लभ बिक्री, कर्जों का बढ़ना और आत्महत्याओं का जारी रहने के रूप में दिखा है। इन सवालों पर बजट यह झूठा दावा करता है कि उसने 22 फसलों का समर्थन मूल्य लागत के 1.5 गुना दाम पर किया है। उसने कर्जमाफी, फसलों की खरीद और लागत के दाम घटाने पर कोई कदम घोषित नहीं किया है। सिंचाई पर भी उसने कारपोरेट घरानों के लिए लाभदायक टपक सिंचाई को बढ़ावा देने की बात कही, जो बहुत मंहगी है और प्रयोग में कठिन है।

                जन कल्याण योजनाओं जैसे - स्वास्थ्य, मनरेगा, राशन, पेंशन, आदि नकद हस्तांतरण के रूप में जारी रहेंगी, हालांकि सरकार जानती है कि भ्रष्ट अफसर बार-बार लाभार्थियों के नाम हटा देते हैं और फिर रिश्वत प्राप्त करके उन्हें शुरु कर देते हैं। इसके बावजूद सरकार ने अच्छी गुणवत्ता की व उचित खर्च पर शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात व रोजगार के अवसर देने तथा पर्याप्त खाद्य सुरक्षा के लिए कोई योजना नहीं बनाई है। खाद्य सब्सिडी बिल पर सरकार ने बजट में दावा किया कि उसका 1,70,000 करोड़ रूपये का आवंटन 2014 के आवंटन से लगभग दोगुना है, जबकि यह पिछले साल के आवंटन, 1,69,000 करोड़ के लगभग बराबर है। सरकार के विजन 2030 में किसानों, मजदूरों व गरीबों के लिए कुछ भी नहीं है और इसमें देश को विदेशी कम्पनियों, कारपोरेटों, अमीरों व ताकतवर जमींदार व माफियाओं के लिए सजाया जा रहा है।

                असंगठित क्षेत्र के 42 करोड़ मजदूरों के लिए घोषित नई पेंशन योजना में बजट का कोई प्रावधान नहीं है और यह मूलतः उनके मासिक निवेश पर निर्भर है। पर यह आंकड़ा दिखाता है कि देश की एक तिहाई जनता के पास न रोजगार की सुरक्षा है, न आमदनी की। ईपीएफओ के जो आंकड़े रोजगार में वृद्धि के लिए दर्शाए गए हैं वे पूरी तरह बोगस हैं क्योंकि उसका डेटाबेस ढंग से अपडेट नहीं किया जाता।
      
                 कम आय के लोगों को दी गई आयकर में राहत बहुत लम्बे समय से वांछित थी और यह असल में बहुत छोटी सी राहत है, जैसा कि आमदनी पर इसके पड़ने वाले असर पर, 18,500 करोड़ रुपये से स्पष्ट है। यह कुल खर्च का 0.67 फीसदी है। सम्पत्तियों की बिक्री में जो टैक्स में राहत दी गयी है उससे स्पष्ट है कि आवास व निर्माण उद्योग कितने गहरे संकट में है जहां निर्माण ज्यादा है और खरीदार कम।

                 बजट में एक संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था की गहरी छाप है और सरकार इसे हल करने की कोई समझ प्रस्तुत नहीं करती। उसने खेती के संकट और अपने 4.5 साल के राज में बेरोजगारी के बढ़ते संकट को छुए बिना दावा कर दिया है कि वह “2022 तक किसानों की आमदनी दोगुना” करने जा रही है। उसका विजन 2030 की घोषणा बढ़ती बेरोजगारी, जो उसकी अपनी नेशनल स्टैस्टिकल कमीशन की रिपोर्ट से स्पष्ट है, पर पर्दा डालने के लिए है। परम्परा तो थी स्टेटमेन्ट आॅफ एकाउन्ट जारी करने की, पर उसने 2030 की संभावनाएं घोषित की हैं जो असल में जवाबदेही से बचने के लिए सभी लक्ष्यों को एक बहुत लम्बी अवधि तक टालने की भयावह योजना है।

                 किसानों और युवाओं को समझना होगा कि यह सरकार कारपोरेटों के मुनाफे और जमींदारों के पक्ष में है। यह उनकी आमदनी और जीविका को नहीं सुधारेगी और खेती और रोजगार में राहत के लिए उन्हें संघर्ष करना होगा।

-डा0 आशीष मित्तल
महासचिव
अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा, एआईकेएमएस.

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