आत्मालाप-21: सपने कभी नहीं मरते...


                           सपने कभी नहीं मरते...

                                                    - अशोक प्रकाश

सपने कभी नहीं मरते
इसलिए
अनंत काल तक बिकते हैं
बिकते रहते हैं...
सपनों में राजा
स्वर्ग से
सफेद घोड़े पर आता है
सपनों से भी तेज
घोड़े को दौड़ाता है
उसकी टापों के नीचे
पड़ता जाता है
लाल रंग का निशान
किसी को वह फूल सा भाता है
किसी को रक्त सा तड़पाता है...

सपने कभी नहीं मरते
सपनों में
मारा जाता है राजा
लोग देखते हैं
राजा के महल हो गए हैं वीरान
वीरानी के बीच
अपने पुरखों के सपनों को ढूँढ़ते
पहुँच रहे हैं इंसान...

टिकट महँगा हो या सस्ता
किलों के भीतर
उठती आवाजों, रुलाइयों और
कराहटों के बीच
सुनाई पड़ती हैं किलकारियां
राजा की बढ़ती हैं दुश्वारियां
किलों में होते जाते हैं छेद
किलों के खुलते जाते हैं भेद
राजा ईश्वर नहीं
व्यभिचारी था
रक्त की बूंद-बूंद चूसता था
अत्याचारी था...

मरे नहीं सपने
मर गया राजा
बिकाउओं के बावज़ूद
जनता ने बजाया बाजा...

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