केंद्रीय बज़ट में खेती और किसान
केंद्रीय बज़ट में खेती और किसा:
कॉरपोरेट खेती को बढ़ावा, देसी किसानी से छलावा
- अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी)
बजट ग्रामीण मांग व क्रय क्षमता को प्रोत्साहित नहीं करता जिससे कुल अर्थव्यवस्था सुधर सकती थी! एआईकेएससीसी ने कहा कि बजट ग्रामीण मांग व क्रय क्षमता को प्रोत्साहित नहीं करती जिससे कुल अर्थव्यवस्था सुधर सकती थी। यह कारपोरेट मुनाफे को बढ़ावा देती है।
बजट 2020 के प्रस्ताव विदेशी व भारतीय कारपोरेट के खेती में लागत की आपूर्ति करने, फसल की खरीद, भंडारण, कृषि प्रसंस्करण, बीमा व फसल की बिक्री में हस्तक्षेप व नियंत्रण को बढ़ावा देगी। यह प्रस्ताव किसानों को लागत के भारी दाम, उनकी फसलों की कम कीमत, फसलों की बहुत सस्ते दाम पर बिक्री व फसल की बरबादी से कोई राहत नहीं देगा। कम्पनियों का शोषण अब और बढ़ेगा जिसमें वे जमीन किराए पर लेंगी, किसानों को कर्ज में फंसाएंगी, उनकी फसलें बेहद सस्ते में खरीदेंगी और खाद्यान्न प्रसंस्करण करके व बिक्री में भारी मुनाफा कमाएंगी।
बजट में कहा गया है कि जो प्रान्त केन्द्र के तीन माॅडल कानून अपनाएंगे, जो भूमि को किराए पर देने, किसानों के उत्पादन व पशुपालन व ठेका खेती से सम्बन्धित हैं और जो फसल की बिक्री, खाद्यान्न प्रसंस्करण, भंडारण व परिवहन में निजी निवेश बढ़ाएंगे, उन्हें केन्द्र सहयोग देगा। बजट में एक जिले में झुंड में एक फसल उगाने, उसकी बिक्री व निर्यात को बढ़ावा देने की बात कही है।
इससे किसानों की न तो आमदनी बढ़ेगी, न बचत और न ही खाद्यान्न प्रसंस्करण व बेरोजगारी की समस्या हल होगी। मनरेगा, ग्रामीण मजदूरी दर, पेंशन, सिंचाई, डीजल, बिजली, खाद व बीज के लिए सब्सिडी और भूमिहीन किसानों, खेतिहर मजदूरों, बंटाईदारों की किसी भी समस्या पर बजट में कुछ नहीं कहा गया है।
मनरेगा के लिए आवंटन इस वर्ष के संशोधित खर्च, 71,001 करोड़ से 9,500 करोड़ घटाकर 61,500 करोड़ रुपये कर दिया गया है जबकि राज्यों से कुल मांग करीब 1 लाख करोड़ रुपये की है। जहां देश में ग्रामीण आमदनी को विकसित करके लोगों की क्रय क्षमता व भारतीय बाजारों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर जोर था, बजट में इन समस्याओं को हल करने का कोई कदम नहीं उठाया गया। हालांकि वित्तमंत्री बार-बार आर्थिक विकास व केयरिंग इंडिया (देखभाल) की बात कहती रहीं, बढ़ती बेरोजगारी के समाधान पर एक शब्द नहीं बोलीं।
सरकार ने खेती, सिंचाई व ग्रामीण विकास के लिए 2.83 लाख करोड़ रूपये का खर्च आवंटित किया है जो पिछले साल के 2.68 लाख करोड़ रूपये से मात्र 15 हजार करोड़ रूपये यानी 5.6 फीसदी ज्यादा है। यह मंहगाईदर से भी कम वृद्धि है।
सरकार ने खेती में उधार दिये जाने वाली रकम को बढ़ाकर 15 लाख करोड़ रुपये कर दिया है, जिससे कम्पनियों द्वारा बेचे जा रहे मंहगे लागत के सामान व मशीनों की बिक्री में मदद देगा। इसमें किसानों को मदद देने या उनकी जमीन गिरवी रखे जाने से रोकने का कोई कदम नहीं है। यह तब है जबकि हाल में ही सरकार ने बड़े कारपोरेटों को 2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के कर्ज माफ किए थे और 1.45 लाख करोड़ रुपये की टैक्स में छूट दी थी।
पीएम किसान योजना में आवरण व अमल सुधारने का भी कोई प्रस्ताव नहीं है। इसके तहत पहले वर्ष में 2000 रुपये की तीन किश्तों का लाभ 14.5 करोड़ किसान परिवारों में से मात्र 26.6 फीसदी किसानों को मिला था, जबकि 48 फीसदी किसानों को एक भी किश्त नहीं मिली। खेती की लागत के दाम पिछले 5 सालों में 33 से 100 फीसदी बढ़ गये हैं और जीवन चलाने के खर्च दो गुना हो गये हैं।
“ऐसी उम्मीद थी कि सरकार लाभकारी समर्थन मूल्य जो कुल खर्च सी2 का डेढ़ गुना हो, के लिए प्रस्ताव रखेगी और इसमें पीएम आशा योजना को और धन देगी। किसानों के कर्ज की मुक्ति के लिए व फसल के नुकसान की भरपाई फसल की आवारा पशुओं से सुरक्षा तथा फसल बीमा योजना को सुधारने की आवाज भी उठी थी। परन्तु इनको छुआ भी नहीं गया है“, ऐसा एआईकेएससीसी ने कहा। पिछले 3 सालों से निजी कम्पनियों ने 18,830 करोड़ रूपये निजी बीमा कम्पनियों ने कमाए हैं, जबकि किसान नुकसान उठाते रहे हैं।
अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने इस बजट पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा है कि “हम इन प्रस्तावों से निराश हैं, बजट दिखाता है कि देश के किसानों के लिए सरकार की योजनाओं में काई जगह नहीं है और वह केवल कम्पनियों को लाभ पहुंचा रही है।“ एआईकेएससीसी ने 13 फरवरी को बजट के कारपोरेट पक्षधर प्रस्तावों और किसानों की कर्जदारी, मंहगी लागत व फसल के अलाभकारी दामों की समस्या को हल न करने के विरुद्ध देश व्यापी संघर्ष की घोषणा की है।
मीडिया सेल
एआईकेएससीसी
संपर्क: आशुतोष - 99991 50812

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