कार्ल मार्क्स, मार्क्सवाद और उनके विरोधी



            कार्ल मार्क्स, मार्क्सवाद और उनके विरोधी

                                   
   


 हम देख रहे हैं कि आज पूरी दुनिया का शासकवर्ग आज या तो मार्क्सवाद को एक फेल विचारधारा मानता है या मार्क्सवाद की अपनी पूंजीवादी व्याख्या को सही मानता है। यहाँ तक कि तथाकथित 'समाजवादी' सरकारों द्वारा भी अपने 'सुधार' कार्यक्रमों और तत्सम्बन्धी नीतियों को इस तरह निर्मित किया जा रहा है कि वह जनता को देखने में तो समाजवादी लगे किन्तु वास्तविक रूप में पूँजीवादी ढर्रे पर ही चले। जब मार्क्सवादी समाजवाद के अकाट्य तर्कों को व्यवस्थाएं खण्डित न कर सकीं और जनता का इस विचारधारा पर विश्वास दृढ़तर होता गया तो शासकों ने यह छद्मनीति अपनाकर जनता को भ्रमित कर मार्क्सवाद से दूर करने का प्रयास किया। यह प्रयास आज और तेज हो गया है। लेकिन जैसे-जैसे पूँजीवादी विचारधारा का संकट बढ़ता जा रहा है और उसका साम्राज्यवादी स्वरूप भी इस संकट को हल करने में बुरी तरह विफल हो रहा है, वैसे-वैसे पूँजीवादी सत्ता को बचाने की कोशिशें तेज हो रही हैं। किन्तु साम्रराज्यवादी अवस्था आज उस अंधी गली में पहुँच चुकी है जहाँ उसका खात्मा तो निश्चित है ही, गेहूँ के साथ घुन की तरह जनता को भी इस व्यवस्था में पिसना ही है। पूँजीवादी सत्ताएं और उनके विभिन्न अवयव जनता को गेहूँ बनाने और स्वयं इससे बचा लेने की कोशिश में लगे हैं! लेकिन जनता के बीच घुन वहीं हैं और जैसा कि इतिहास ने यह सिद्ध किया कि जनता ही अपराजेय होती है, शासक और उनकी लूट दोनों स्थायी नहीं रह सकते। बड़े-बड़े राजे-रजवाड़े जनता की अदम्य शक्ति के सामने धराशायी हो गए।

            हम देख रहे हैं कि पूँजीवादी-साम्रराज्यवादी व्यवस्थाएं लोकतंत्र का मुखौटा ओढ़कर आज पूरी दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों, बाज़ारों और श्रमशक्ति पर कब्ज़ा करने की होड़ में लगी हुई हैं। उन्होंने बहुराष्ट्रीय/पारराष्ट्रीय कम्पनियां बनाकर स्वयं की कम से कम क्षति का इंतज़ाम कर अन्य शासकशक्तियों की भी लूट में हिस्सेदारी की व्यवस्था बनाई है किन्तु जनता से उनके अंतर्विरोध लगातार बढ़ते जा रहे हैं। वे इनका सामना करने के पहले से बने-बनाए नुस्खों जैसे फासीवाद, नस्लवाद, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद आदि के अलावा व्यापक पैमाने पर छद्मयुद्ध का भी इस्तेमाल कर रही हैं। मध्य-एशिया-यूरोप में तो प्राकृतिक संसाधनों पर कब्ज़ा करने के भयानक जनसंहारक युद्ध लगातार चल रहे हैं। यही नहीं, कब्ज़ा करने की इस होड़ में वे आपस में अप्रत्यक्ष लड़ाई में उतरी हुई हैं। ऐसे में एक और विश्वयुद्ध का खतरा दुनिया पर लगातार मंडरा रहा है।

            इन स्थितियों में दुनिया के पास मार्क्सवाद की विकसित विचारधारा के अलावा शांति का और कोई चारा नहीं। देखना यह है कि विश्व की व्यापक मानवतावादी शक्तियां कितनी जल्दी संगठित होतीं और दुनिया को जन-संहारों और लूट से बचाती हैं। शासकों से कोई भी उम्मीद व्यर्थ है क्योंकि वे अपने वर्ग-स्वार्थों से बंधे हैं।...

कार्ल मार्क्स और मार्क्सवाद को इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझने और व्यवहार में लाने की जरूरत है!


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Comments

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    1. True!.Impact of Marx on modern thought is very much visual on evolutionary process of civilization. He was a true revolutionary.

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