रहम की उम्मीद, किससे?...

आप उनसे रहम की कोई उम्मीद नहीं रख सकते जो मानते हैं कि सुख-दुःख सब पूर्वजन्म के कर्मों का फल है!..यह भी कि दुखी दुख लायक ही है और सुखी सुख के ही लायक! पूंजी के इस दर्शनशास्त्र को धर्म कहा जाता है। 



आप विश्लेषण करेंगे तो पाएंगे कि अपराधियों का ऐसा ही नीतिशास्त्र  होता है जिसकी तराजू पर वे पूरे ब्रह्मांड को तौलते हैं। आप उसे अनीति-अधर्म-मूर्खता कहें-समझें तो उनकी बला से!..वे आपको भी कुछ नहीं सेटते!

 ऐसा नहीं कि ये अनपढ़ हैं और इसे अनीति मानते हुए भी नीतिशास्त्र समझते हैं। ऐसा नहीं है, घण्टे भर पूजा करने के बाद वे मान लेते हैं की पापयोनि में पैदा हुए इस प्राणी को प्रभु समझते हैं और वह जो कुछ करता है उन्हीं के इशारे पर करता है। आखिर उनकी मर्जी के बगैर एक पत्ता भी तो नहीं हिल सकता!...

इसलिए, अगर लॉकडाउन के चलते असहाय लोग छटपटाते हुए अपने घर पहुँचने की जद्दोजहद कर रहे हैं, रोते-चीखते बच्चे आपको भी रुला रहे हैं अथवा पैसा और/या शराब के नशे में नशेड़ी खाली सड़क को अपने बाप की  मान लोगों को रौंद रहे हैं तो इसे अस्वाभाविक मत मानिए!

मूर्खों और अंधविश्वासियों को जब पूँजी का बल मिलता रहता है तो अमानवीय से अमानवीय, क्रूर से क्रूर घटनाएं साधारण बन जाती हैं, आम हो जाती हैं!...

ये आप पर है कि आप ऐसी आतातायी नीतियों-घटनाओं से कैसे निपटते हैं!...यूँ ही सब कुछ होते देखते हैं या इन्हें रोक देने, न होने देने के लिए सोचते और उपाय करते हैं!...

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