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माटी के गीत:

                                                            होइगै मोर धरोहर गायब...                                                                                         -चिंतन 'साकेतपुरी'  चम्पा और चमेली गायब ।  फुलवन से ऊ खुश्बू गायब ॥ छोट छोट चीनी के आगे ।  बडी बडी गुड भेली गायब ॥                                सरिया मह से धेनू गायब ।                                माठा मह से नैनू गायब ॥            ...

सवाल दर सवाल है!...:

                               निजीकरण का कारोबार और राजनीति                                   सवालों के घेरे                                                      -नरेश गोस्वामी                 राजनीति को सिर्फ़ चुनाव, नेता और तात्कालिक आंकड़ों के मुहावरे में क्यों  देखा जाए ? क्या उसे कहीं ओर से देखना संभव नहीं है?                 हमारे आसपास चीज़ें कितना बदल गई हैं ! सिर्फ तीसेक सालों के हेरफेर में। तीसेक साल पहले दिल्ली में भी अधिकांश लोग अपने घर- यानी अपने द्वारा बनाए गए घर में रहते थे। एनसीआर और देश के बाक़ी महानगरों से सटे देहात में यह बात अजूबी मानी जाती थी कि एक ही बिल्डिंग के पहले, दूसरे या ती...

हास्य-व्यंग्य:

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              स्वतंत्र भारत के बेटे और बेटियों !                                            -काका हाथरसी (  काका हाथरसी की यह कविता चर्चित भी रही और हँसाया भी खूब, पर वैसे नहीं कि हवा में उड़ जाय, आप भी पढ़िये! - भूपाल सिंह (प्रस्तुति)!  )                 स्वतंत्र भारत के बेटे और बेटियों! माताओं और पिताओं, आओ, कुछ चमत्कार दिखाओ। नहीं दिखा सकते ? तो हमारी हाँ में हाँ ही मिलाओ। हिंदुस्तान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान मिटा देंगे सबका नामो-निशान बना रहे हैं-नया राष्ट्र ‘मूर्खिस्तान’ आज के बुद्धिवादी राष्ट्रीय मगरमच्छों से पीड़ित है प्रजातंत्र, भयभीत है गणतंत्र इनसे सत्ता छीनने के लिए कामयाब होंगे मूर्खमंत्र-मूर्खयंत्र कायम करेंगे मूर्खतंत्र। हमारे मूर्खिस्तान के राष्ट्रपति होंगे- तानाशाह ढपोलशंख उनके मंत्री (यानी चमचे) होंगे- खट्टासिंह, लट्ठासिंह, खाऊलाल, झपट्टासिंह रक्षामंत्री-...

एक चिट्ठी- शिक्षा-व्यवस्था पर:

                        एक पत्र...- प्रधानमन्त्री के नाम प्रिय श्री मोदी जी , आप देश के लिए बहुत कुछ करना चाहते हैं , यह आपके शब्दों से ही नहीं कार्यों से स्पष्ट हो रहा है। आप उन बुनियादी समस्याओं पर ध्यान दे रहे हैं जिन पर लोगों का ध्यान जाना चाहिए पर जाता नहीं है। स्वच्छ भारत अभियान उनमें से एक है। इसके लिए आप साधुवाद के पात्र हैं। इसी दृष्टि से मैं यह पत्र आपको लिख रहा हूँ ताकि कुछ और आवश्यक बातों की ओर आपका ध्यान जा सके। क्योंकि आप मुझे जानते नहीं हैं , इसलिए मैं निवेदन करूँ कि मैं 28वर्ष तक एनसीईआरटी में कार्यरत था और वहाँ से 1988 में मैंने अवकाश ग्रहण किया। 1950 से अब तक शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत हूँ और अभी भी 86 वर्ष की अवस्था में उसी कार्य में संलग्न हूँ। मैं शिक्षा के बारे में कुछ जानता हूँ और मुझे उस क्षेत्र का कुछ अनुभव है, इसलिए यह पत्र आपको संबोधित है। यह देखकर खेद होता है कि जहाँ आप देश को सभी दिशाओं में आगे ले जाने का प्रयास कर रहे हैं , आपकी दृष्टि में शिक्षा ने वह स्थान नहीं पाया है जिसकी वह ...

उच्च-शिक्षा- 3: भारत की उच्च शिक्षा

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                         🔴भारत की उच्च शिक्षा🔴                                          -प्रोफेसर वी एस दीक्षित,                                                 दिल्ली विश्विद्यालय             आज सरकारों ने शिक्षा को अपनी नीतियों से ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहाँ से समाधान का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है।हर तरफ तबाही का आलम है चाहे वो शिक्षकों की बात हो, विद्यार्थियों की बात हो या कर्मचारियों की बात हो। शिक्षा ब्यवस्था में शिक्षक,विद्यार्थी और कर्मचारी एक दूसरे के पूरक हैं। एक दूसरे के बिना किसी की कोई गति नहीं है। आज निजीकरण और व्यापारीकरण की सरकारी नीतियों ने इन सभी को कहीं न कहीं बुरी तरह से प्रभावित किया है।    विद्यार्थियों की वजह से शिक्षक हैं ।क...

काकोरी काण्ड के शहीद:

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पंकज-पोस्टर:

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   निसार तेरी गलियों के अए वतन, कि जहाँ / फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ निसार मैं तेरी गलियों के अए वतन, कि जहाँ चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले जो कोई चाहनेवाला तवाफ़ को निकले नज़र चुरा के चले, जिस्म-ओ-जाँ बचा के चले है अहल-ए-दिल के लिये अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशाद कि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद बहोत हैं ज़ुल्म के दस्त-ए-बहाना-जू के लिये जो चंद अहल-ए-जुनूँ तेरे नाम लेवा हैं बने हैं अहल-ए-हवस मुद्दई भी, मुंसिफ़ भी किसे वकील करें, किस से मुंसिफ़ी चाहें मगर गुज़रनेवालों के दिन गुज़रते हैं तेरे फ़िराक़ में यूँ सुबह-ओ-शाम करते हैं बुझा जो रौज़न-ए-ज़िंदाँ तो दिल ये समझा है कि तेरी मांग सितारों से भर गई होगी चमक उठे हैं सलासिल तो हमने जाना है कि अब सहर तेरे रुख़ पर बिखर गई होगी ग़रज़ तसव्वुर-ए-शाम-ओ-सहर में जीते हैं गिरफ़्त-ए-साया-ए-दिवार-ओ-दर में जीते हैं यूँ ही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़ न उनकी रस्म नई है, न अपनी रीत नई यूँ ही हमेशा खिलाये हैं हमने आग में फूल न उनकी हार नई है न अपनी जीत नई इसी सबब से फ़लक का गिला नहीं करते त...