सवाल दर सवाल है!...:
निजीकरण का कारोबार और राजनीति
सवालों के घेरे
-नरेश गोस्वामी
राजनीति को सिर्फ़ चुनाव, नेता और तात्कालिक आंकड़ों के मुहावरे में क्यों देखा जाए ? क्या उसे कहीं ओर से देखना संभव नहीं है?
हमारे आसपास चीज़ें कितना बदल गई हैं ! सिर्फ तीसेक सालों के हेरफेर में। तीसेक साल पहले दिल्ली में भी अधिकांश लोग अपने घर- यानी अपने द्वारा बनाए गए घर में रहते थे। एनसीआर और देश के बाक़ी महानगरों से सटे देहात में यह बात अजूबी मानी जाती थी कि एक ही बिल्डिंग के पहले, दूसरे या तीसरे माले का मालिकाना अलग-अलग हो सकता है। अब यह नॉर्म बन गई है।
तीसेक साल पहले तक लोगबाग आर्ट्स और साइंस में लंबी पढ़ाई के लिए तैयार रहते थे। पहले ग्रेज्युएशन, फिर आगे की पढाई। अक्सर यह सिलसिला रिसर्च पर जाकर रुकता था। गांव-कस्बों –शहरों के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे सब कुछ हासिल कर दिखाते थे।
धीरे-धीरे, हमारी आंखों के सामने यह ढांचा तोड़ा गया। शिक्षा को बाक़ायदा उद्योग बना दिया। स्थानीय सेठों की बंद फैक्ट्रियों में मैनेजमेंट, लॉ, बीएड़ और फलां-फलां कोर्सेज खुलने लगे।
राजनीति में हम जिसे विपक्ष कहते हैं, क्या उसने कभी संसाधनों और संस्थाओं के इस निजीकरण पर सवाल उठाए ? मुट्ठी पर लोगों को छोड़ दें तो इस दौरान जो भी राजनीति के कारोबार में उतरा, इस निजीकरण में अपनी हिस्सेदारी के लिए उतरा।
क्या यह सब जो हुआ और होता आ रहा है, उससे व्यक्ति, नागरिक, वोटर की चेतना और नज़रिये पर फ़र्क नहीं पड़ा होगा ? क्या जीवन में बढ़ती अनिश्चितताओं, अस्थिरताओं और बेचैनियों ने उसे इस मानसिकता का शिकार नहीं बना दिया होगा कि जो हो सकता है, अभी और यहीं हो सकता है। क्या समग्र समाज के प्रति अपने दायित्व को दरकिनार करके लोगों का जीवन कॉरपोरेट के हाथों में सौंपना राजसत्ता का विफल हो जाना नहीं था ? और क्या प्रक्रिया को छोड़ सीधे परिणाम पर छलांग मारने की प्रवृत्ति ने व्यक्ति के मानस को बदल नहीं दिया होगा ?
क्या इसका लोगों की राजनीतिक समझ और विवेक पर फ़र्क नहीं पड़ा है। आज अगर जनता एक ऐसे नेता में यक़ीन किए जा रही है जिसके पास उसके कल्याण की कोई योजना नहीं है तो क्या यह इन बदलावों का संचित प्रभाव नहीं है ?
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