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दास्ताने-तालीम: एक शिक्षक की डायरी

                                  एक शिक्षक की डायरी                                                               प्रोफे. दीपक भास्कर,                                                      दिल्ली विश्वविद्यालय.          ....आज दुखी हूँ! कॉलेज में काम खत्म होने के बाद भी स्टाफ रूम में बैठा रहा, कदम उठ ही नहीं रहे थे। दो बच्चों ने आज ही एड्मिसन लिया और जब उन्होंने फीस लगभग 16000 सुना और होस्टल फीस लगभग 120000 सुनकर एड्मिसन कैंसिल करने को कहा।  गार्डियन ने लगभग पैर पकड़ते हुए कहा कि सर! मजदूर है राजस्थान से, हमने सोचा कि सरकारी कॉलेज है तो फीस कम होगी, होस्टल की सुविधा होगी सस्ते मे, ...

पर्यावरण-संरक्षण या पर्यावरण-विनाश:

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                             पर्यावरण का संरक्षण या                         पर्यावरण-विनाश का वैश्वीकरण             यह सब पहले भी होता था!...            लोग झूठ बोलते थे, कहते कुछ और थे- करते कुछ और थे। नीति-नियम बनाए जाते थे-दूसरों के लिए। अपने लिए नियम अपनी सुविधा और फायदे के हिसाब से होते थे। 'अश्वत्थामा मरो....' सत्य के आगे 'नरो वा कुंजरो...' छुपा लिए जाने के पीछे की रणनीति निश्चित नई नहीं है। विकास के बहाने विनाश की गाथा शायद इसी तरह रची जाती है! अश्वत्थामा को मैने नहीं मारा, तुमने मारा है!...तुम्हें इसका हर्ज़ाना देना होगा, तिल-तिल कर मरना होगा। मैं वातानुकूलित महल में रहूँगा, क्योंकि मैंने ही अश्वत्थामा के मारे जाने का 'सत्य' तुम्हें बताया है। 'पर्यावरण' का विनाश हो रहा है, मेरे बताने के पहले तुम जानते थे क्या??...             पर्यावरण को लेकर क...

मिथक बनाम यथार्थ: 'राधा'

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                                   हे जी, जै-जै राधे!..            'धारा विरुद्धा या सा राधा....'- जो धारा, सामाजिक मान्यताओं-सीमाओं के खिलाफ़ है, वही राधा है! हाँ, धारा को उलट दीजिए तो ध्वनि-विपर्यय से शब्द बनता है- 'राधा'! क्या यही है राधा का तात्पर्य? क्या राधा अथवा राधाओं ने धारा अथवा धाराओं को उलटने का का काम किया था? कृषि-कर्म से काले पड़े कृष्ण या कृष्णों का साथ देना, वह भी बाल-विवाहिता/ओं के लिए क्या धारा को उलट देना नहीं था? क्या कोई राधा या राधाएँ थीं? क्या कृष्ण ने अकेले ही कृषि-संस्कृति के विकास का बीड़ा उठाया था या हलधर-बलराम जैसे अनेक लोग और अनेक राधाएँ इस कृषि-कर्म की ओर उद्यत होकर कंस अथवा मधुराधिपति की जंगली-संस्कृति के खिलाफ उठ खड़े हुए थे?...क्या श्रीमद्भागवत के तथाकथित आधुनिक व्यासों/गपोलियों/टल्लीयों की तरह कोई भी कुछ भी अर्थ लगा सकता है मिथकों य प्रतीकों का? क्या लोकमानस को भरमजाल में फंसाने और इसे अपना धंधा बनाने वाले लोग ही किसी लोकग्रन्थ के...

आत्मालाप -11: मैं हनुमान

                                      मैं हनुमान!                                                 - अशोक प्रकाश मैं नहीं था कभी भी बन्दर... तुमने देखा और कहा- वा!नर!!... बना दिया मुझे वानर से बंदर! चेहरे पर मेरे उगा दिए बाल मुँह उभारा मेरा पूँछ लगाई चिल्लाए बोले - बन्दर...बन्दर! 'बैबून' से 'बाबू' की तरह दुत्कार फटकार मार और काम से तुम्हारे प्यार ने सिर झुकाए मुझे दास बनाया दास को राजा से बड़ा बताया... मेरी दासता की  महानता के लिखे-लिखाए भक्ति-गीत यह था मेरा अतीत!... गुलाम हो गया मैं मेरा वंश मेरा भविष्य! मैं न वानर हूँ न बन्दर तुम्हारी ही तरह मैं भी हूँ इंसान मैं हनुमान पहाड़ उठा सकता हूँ असंभव को संभव बना सकता हूँ याद रखना पहाड़ से तुम्हें खदेड़ सकता हूँ हमेशा के लिए सचमुच आदमी बना सकता हूँ! ★★★

शिक्षा का माध्यम:

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                राष्ट्रभाषा', सार्वजनिक शिक्षा और 'राष्ट्रवादी'               फ़ोटो- साभार फ़ेसबुक              ऐसा लगता है जैसे  शासकवर्ग सार्वजनिक शिक्षा को मटियामेट कर निजी शिक्षण संस्थानों को खुली छूट देना चाहता है। इसके लिए प्राथमिक शिक्षा के मातृभाषा में चल रहे विद्यालयों को या तो बन्द किया जा रहा है या उन्हें Englsh Medium में रूपांतरित करने की कवायद चल रही है। मातृभाषा में कम से कम प्राथमिक शिक्षा देने की संवैधानिक प्रतिबध्दता को इस तरह अंगूठा दिखाया जा रहा है।              आखिर क्यों किया जा रहा है यह सब?...उत्तर बड़ा आसान और सीधा सा है। लगता है सरकार की प्राथमिकता में देश की सार्वजनिक शिक्षा न होकर कम्पनियों के लिए जरूरी शिक्षा रह गई है।...               आखिर क्यों अपने देशवासियों को उनकी भाषा में शिक्षा नहीं दी जा सकती, उनके लिए देश में रोज़ी-रोटी की व्यवस्था नहीं हो सकती? इससे तो ऐसा ह...

कविता: विरोध-मार्च पर लाठीचार्ज

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                        विरोध मार्च पर लाठीचार्ज                                                 - हरमीस बोहेमियन अब आसमान से आग बरसे कि सामने खड़ा कर दो मौत की दीवार हम आग से गर्माहट लेंगे और मृत्यु से करेंगे दोस्ती हम अपनी हड्डियों में बारूद भरकर निकले हुए लोग हैं हम तुम्हारे खिलौनों से नहीं डरते तुम हमारे जिस्मों पर अपने कायर होने का निशान देते हो समझते हो यह हमारे लिए नया है और भूल जाते हो , यह निशान विरासत में मुझे मेरे पुरखे से मिला है अपने हक़ और आज़ादी के लिए लड़ना या लड़ते हुए कुर्बान हो जाने का इतिहास हमारे रक्त में बह रहा है सदियों से हम जानते हैं राह चलते गर अचानक से आ जाये भेड़ियों का दल तो हमें क्या करना है हम जानते हैं कि जब खतरे में पड़ जाये जान तो हमें क्या करना है हम जानते हैं कि जब कुर्सी पर बैठा हो पगलाया शैतान तो हमें क्या करना है हमें अपने साथियों का...

हम देश, हमारा देश- 2:

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                             ऐसा नहीं होना चाहिए!...                      कभी नहीं और कहीं नहीं होना चाहिए!... लगता है जैसे कोई ललकार रहा हो! हिम्मत है तो आ- हमारा लगता है जैसे कोई ललकार रहा हो!...हिम्मत है तो आ- हमारा सामना कर!...  महाभारत का यह उद्धत-आह्वान-'युद्धं देहि!...' उन सबको पसंद है जो शेरदिल हैं और तमाम प्राणियों के साथ इंसानों को भी जैसे खा जाने में विश्वास करते हैं! 'वीरभोग्या बसुंधरा' सिद्धांत के ये हिमायती 'राजा राज करने के लिए पैदा होता, प्रजा सेवा करने के लिए' -में भी विश्वास करते हैं और इसमें भी कि 'अमीर-गरीब, ऊंच-नीच, अच्छे-बुरे सब ऊपर वाले के बनाए होते हैं... और इसमें भी कि अमीर, ऊंच, अच्छा होना उनका जन्मजात अधिकार है! तो मारे जाने वालों, तुम मारे जाने के लिए ही पैदा हुए थे!... ....और हे मृतकों के शवों पर रोने वालों और इनके मरने पर मातम मनाने वाले देशवासियों, तुम व्यर्थ चिंतित हो रहे हो!...देखो तो, इनकी तरह तुम भी मरे ही हुए ह...