चुनाव-चर्चा:1: जनता मुखौटे उतरना चाहती है...
चुनना क्या है?...
● जनता अब उनके मुखौटे उतारना चाहती है! :
- साकेत सिसोदिया
2019 के आम चुनाव में विभिन्न स्तरों पर होने वाला मुक़ाबला 'मुखौटा बचाव' बनाम 'मुखौटा उतार' वर्गों में होगा। इस चुनाव में सरकार, विपक्ष, राजनीतिक दल, नेता, मीडिया, पत्रकार, विश्लेषक, सोशल मीडिया योद्धाओं द्वारा अपनी लोकछवि के मुखौटे की यथास्थिति बचाये रखने का पुरजोर प्रयास होगा क्योंकि अंदरखाने यह सब जानते हैं कि इस बार किसी विशेष राजनीतिक दल की हवा के अभाव में एवं जटिल सामाजिक-आर्थिक समीकरणों के चलते मतदाता के अंतर्मन में झांक कर एक सुनश्चित राजनीतिक धारा प्रवाह का आंकलन करना उन सभी के बूते से बाहर है।
उधर जनता भी इन 70 सालों में राजनीतिक धूर्तता के इंद्रधनुष के अमूमन सभी रंग देख चुकी है। वो भी इन मुखौटे ओढ़े ढोंगी शुभचिंतको से उकता चुकी है। जनता भले ही विभिन्न धर्मों/जातियो में बंटी हुई हो लेकिन अपने-अपने धार्मिक/जातीय प्रतिनिधित्व करने वाले राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के मुखौटो से भी वो भलीभांति परिचित हो चुकी है। इस बार राजनीतिक नंगेपन का स्तर इस स्तर तक गिर चुका है कि जनता अपने संवैधनिक दायित्व को कुछ इस तरह निभा सकती है कि हरेक राजनीतिक दल को उसके सबसे विश्वसनीय वोटबैंक वाले वर्ग से ही संपूर्ण समर्थन न मिले तथा यह ट्रेंड कमोबेश हरेक धार्मिक/जातीय समूह में अपने परंपरागत सहबद्ध राजनीतिक दलों के प्रति देखने को मिल सकता है। जनता अब मुखौटे उतारना चाहती है। चाहे वो सरकार हो या विपक्ष, राजनीतिक दल हो या नेता, पत्रकार हो या विश्लेषक, मीडिया चैनल्स के एंकर्स हो या सोशल मीडिया के योद्धा।
इस चुनाव में उपरोक्त सभी के प्रभाव का अपने-अपने क्षेत्र में स्वयं निर्धारित आंकलनों का जनता द्वारा संपादन निश्चित है।
अगर मुक़ाबला वाक़ई में मुखौटा बचाव बनाम मुखौटा उतार वर्गों में होता है तो निश्चित ही यह चुनाव भारतीय राजनीति में एक विशिष्ट चुनाव साबित होंगे तथा राजनीति की दिशा को एक नया एवं ठोस आयाम देंगे। ★★
● नेता की सोच:
- यतेंद्र कुमार
पता नहीं इस सोच के पालक कौन सी मिट्टी का अनाज खाते हैं कि हमेशा अपनी पार्टी और अपने नेता का बचाव या तो जानवरों के उदाहरण दे कर करते हैं या फिर दूसरे दलों के नेताओं या समर्थकों की मौत या विनाश का उदाहरण देकर।
ये स्वभाव से अनिष्टकारी हैं जिनके मन मे कुंठा इस कदर बसी है कि सब के विनाश का सपना पाले रहते हैं।
इस मिट्टी में वह ताकत है जो बुद्ध, कबीर, गांधी, अम्बेडकर, फुले, भगत सिंह, आजाद, बोस को फलने-फूलने का पोषण देती है न कि समाज में वैमनस्यता और आतंक फैलाने वाले गोडसे जैसे हत्यारों को। ★★
● प्रियंका गांधी और 'बेटी बचाओ' :
-डॉ ब्रज मोहन सिंह
प्रियंका गाँधी के राजनीति में आने की घोषणा मात्र से 'बेटी बचाओ' - 'बेटी पढाओ' के झूठे नारे लगाने वाले बीजेपी के स्त्रीविरोधी जेंडरवादी नस्लवादी नेता प्रियंका की सुंदरता पर टिप्पणी कर स्त्री विरोधी संस्कार और मानसिकता का परिचय दे रहे हैं। ये मूल रूप से अपनी सोच में लोलुप, कामी, स्त्री विरोधी और नारी को सामान, उत्पाद ,उपभोग की वस्तु समझनेवाले नेता हैं। इनको डर लगता है कि इनकी सोच वाली स्त्री पैर की जूती रही है और अगर ये जूती इनको हरा दे, लडाई में मात कर दे तो तो इनका वर्चस्व खत्म हो जायेगा!...इनको स्त्रियों से हारने में डर लगता है।... ★★
● भारत की महानता :
- रवींद्र पटवाल
भारत तो महान था ही, है भी और रहेगा भी, क्योंकि भारत की 130 करोड़ मेहनतकश ने इसे अपने पुरखों सहित इसे महान बनाया है! लेकिन हमारी ही धरती का खाकर हमारी ही धरती का नुक़सान पहुँचाने वाले टुकड़खोर, जो इस महान देश की सम्पदा को कुछ चुनिंदा काले अंग्रेजों और विदेशी बहुराष्ट्रीय निगमों के हाथों अंधाधुंध लुटवा रहे हैं, उनको इसका श्रेय नहीं लेने दिया जा सकता!
ये 15 अगस्त और 26 जनवरी इस देश के सामूहिक उल्लास के त्यौहार हैं। इसे मैं याद करता हूँ भगत सिंह, सहजानन्द, राहुल सांकृत्यायन, गाँधी, अंबेडकर, नेहरू और सबसे अधिक 1857 के जनता के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से हासिल आजादी के उल्लास और उस सपनों को हकीकत में बदलने के तारीख के रूप में!
किन्तु उल्लास मनाने से अधिक इस आजादी का हमने किया ही क्या है? भगत सिंह और उनके साथियों के सपने का भारत बना या नई गुलामी की जंजीरें इस देश के हिन्दू मुस्लिम ईसाई सिख और दलितों वंचितों के माथे मार दी गईं? क्या इसका कोई लेखा-जोखा है?
क्या हमने वैसा भारत बनाया या शहीदों के सपनों से दगाबाजी की?यह प्रश्न मैं अपने आपसे पूछता हूँ! आप भी जरूर पूछिए अपने दिल से।...★★
Sahi bat hai...
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