चुनाव-चर्चा :3: जनांदोलनों की आवाज बनेगी एसयूसीआई (कम्युनिस्ट)...


चुनाव-चर्चा:

       एसयूसीआई (कम्युनिस्ट)  119 सीटों पर लड़ेगी चुनाव

                              महासचिव प्रभास घोष 
             द्वारा संसदीय चुनाव के लिए वितरित प्रेस हैंडआउट

17वीं लोकसभा गठित करने के लिए चुनावों की तारीखों की घोषणा कर दी गई है। इस घोषणा से पहले कई महीनों से राष्ट्रीय और क्षेत्रीय बुर्जुआ पार्टियाँ, मतदाताओं को धोखा देने के लिए चुनाव-पूर्व ढेर सारे वादों की बौछारें करने में व्यस्त हैं। साथ ही वे एक-दूसरे पर कीचड़-उछालने में लगे हुए थे।
17वीं, 18वीं और 19वीं सदी में अपने आगमनकाल में, पूँजीवाद ने निरंकुश सामंती-राजतंत्रीय व्यवस्था को उखाड़ फेंक कर वैज्ञानिक विचारों, लोकतंत्र, लोकतांत्रिक मूल्यों, धर्म से मुक्त धर्मनिरपेक्ष मानवतावाद की अवधारणा, समानता-स्वतंत्रता के उदात्त आदर्शों को बुलंद किया था और बुर्जुआ लोकतांत्रिक क्रांति संपन्न की थी। उस समय, पूँजीवाद की राजनीतिक प्रणाली के रूप में बहुदलीय संसदीय लोकतंत्र स्थापित किया गया था। राज्य के तीनों अंगों विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच सत्ता की सापेक्ष स्वायत्तता और अलग-अलग शक्तियां निर्धारित की गई थी। उदीयमान पूँजीवाद के शुरुआती दिनों में, उभरते हुए प्रगतिशील बुर्जुआ वर्ग ने इन सभी सिद्धांतों को काफी हद तक लागू किया था। लेकिन इतिहास के अटल नियम के अनुरूप ही पूँजीवाद के एकाधिकारी पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के चरण में प्रवेश करने के बाद, इसका पतन और प्रतिक्रियात्मक चरित्र सुस्पष्ट रूप से प्रकट होने लगा। जाहिर है, सभी पूँजीवादी-साम्राज्यवादी देशों में पूँजीवादी शासकों ने उन सभी लोकतांत्रिक अधिकारों, मूल्यों, प्रथाओं और आचार संहिताओं को रौंदना शुरू कर दिया, जिनके वे कभी चैंपियन होते थे। लोकतांत्रिक अधिकार की अवधारणा को एकाधिकारी पूँजीपतियों के लिए कच्चे माल की तरह लोगों को बेरहमी से लूटने का निरंकुश अधिकार बना दिया गया। घोर दमनकारी प्रणाली के संचालन के जरिये लोकतंत्र के नारे- ‘‘लोगों का, लोगों के द्वारा और लोगों के लिए’’ को बदल कर ‘‘एकाधिकारी पूँजीपतियों का, एकाधिकारी पूँजीपतियों द्वारा और एकाधिकारवादियों के लिए’’ बना दिया गया। तर्कसंगत सोच प्रक्रिया को कुंद करने के लिए धर्मांधता के साथ समझौता करने और धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देने का सहारा लिया गया। प्रेस की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, दार्शनिक सहिष्णुता और इस तरह की अन्य सभी पूर्ववर्ती लोकतांत्रिक अवधारणाओं की जब चाहे मनमाने ढंग से धज्जियाँ उड़ाई जाने लगीं। विरोध की आवाज का मुँह बंद कर दिया गया और सभी वैध विरोधों को बेरहमी से दबा दिया गया। साथ ही, संसदीय लोकतंत्र को संसदीय फासीवादी निरंकुशता में बदल दिया गया। लोकतंत्र को विभिन्न देशों में अलग-अलग रूपों और मात्रा में फासीवाद द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है। ‘बहुदलीय लोकतंत्र’ को वस्तुतः ‘दो दलीय लोकतंत्र’ बना दिया गया है।
पूँजीवादी-साम्राज्यवादी देश के रूप में भारत इसका कोई अपवाद नहीं रहा है। यह भी सड़े-गले प्रतिक्रियावादी पूँजीवाद की इन सभी बुराइयों से भी दागी है। 
चुनावी मोर्चे पर क्या हो रहा है? सत्तारूढ़ पूँजीपति वर्ग अपने राजनीतिक प्रबंधक के रूप में अपनी भरोसेलायक इस या उस पार्टी का चयन कर रहा है और फिर इसे धनबल, बाहुबल, मीडियाबल और प्रशासनिक शक्ति का उपयोग करके सत्ता में लाता है। जब सत्ताधारी पार्टी उसकी जनविरोधी पूँजीपतिपरस्त नीतियों के कारण लोगों के सामने बदनाम हो जाती है और उसके खिलाफ असन्तोष जमा होने लगता है, तो सत्ताधारी पूँजीपति अपने सामने एक अन्य राजनीतिक प्रबंधक का चयन कर उसे सामने ले आता है और इस दूसरे प्रबंधक को लाकर पूर्ववर्ती प्रबंधक को हटाना सुनिश्चित करता है। समय-समय पर सरकारों की अदला-बदली और रस्म-रिवाज के तौर पर चुनाव कराने के इस खेल का नतीजा क्या होता है? अमीर और भी अमीर होता जा रहा है और गरीब और भी गरीब। कुल एक प्रतिशत धनासेठ देश की 73 प्रतिशत संपत्ति के मालिक हैं। भारत एक तिहाई वैश्विक गरीबों का घर बन गया है। यहाँ 20 करोड़ 30 लाख लोग हर दिन भूखे रहते हैं। न्यूनतम स्वास्थ्य सेवा के अभाव में 4000 से अधिक लोग प्रतिदिन मरते हैं। कारखानाबंदी, तालाबंदी, कामगारों की छंटनी लगातार बढ़ती जा रही है। स्थायी पक्की नौकरियों की जगह अस्थायी कच्चे अनुबंध की नौकरियों ने ले ली है। एकाधिकारी और बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ मध्यम और छोटे व्यापारियों को मार रही हैं। बेरोजगारी विकराल रूप लेती जा रही है। 70 करोड़ से अधिक लोग बेरोजगार और अर्ध-नियोजित हैं, यूपी में चपरासी के 368 पदों के लिए अच्छी संख्या में पोस्ट ग्रेजुएट और डॉक्टरेट डिग्रीधारियों सहित 23 लाख से अधिक आवेदन प्राप्त होना इसकी साफ गवाही देता है। उत्पादित फसलों का लाभकारी मूल्य पाने में असमर्थ गरीब किसान आत्महत्या कर रहे हैं। अब तक 3 लाख 50 हजार से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। काले धन का पता लगाने के नाम पर जो किया गया है वह काला धन और भी तेजी से बढ़ाने वाला है। लोक दिखावे के लिए केवल कुछ छोटे अपराधियों को हिरासत में लिया जाता है, जबकि बड़े-बड़े मगरमच्छ अर्थात् बड़े-बड़े धनकुबेर अदण्डित रहते हुए शासक वर्ग और इसकी ताबेदार सरकारों की सरपरस्ती में काले धन के अम्बार लगा रहे हैं। गंभीर आर्थिक हमले, राजकोषीय बर्बरता, आकाशछूती महंगाई, भिखमंगी, वेश्यावृत्ति, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, तस्करी, ऑनर किलिंग, लिंचिंग, प्रवासी मजदूर, परिवारों का टूटना - सब कुछ खतरनाक रफ्तार से बढ़ रहा है। मूलभूत स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा का लगातार बढ़ते पैमाने पर आम लोगों के हाथ से दूर जाना जारी है। शोषित-पीड़ित देशवासियों की बढ़ती दुख-तकलीफों, कंगाली-बदहाली, धोखाधड़ियों और वंचनाओं की सूची अब और भी लंबी हो सकती है।
चुनाव भी आज हास्यास्पद और एक बहुत बड़ा धोखा हो गया है। चुनाव आयोग की आचार-संहिता और नियमों को धता बताते हुए, सत्ता-लोभी बुर्जुआ पार्टियाँ वोटों पर कब्जा करने के लिए बड़ी रकम खर्च करती हैं। वे धन और अन्य क्षुद्र लाभों से लोगों को लुभाने के लिए लोगों की दुर्दशा और राजनीतिक अज्ञानता का फायदा उठाती हैं। असहाय असंगठित लोग भी आसानी से उनके जाल में फंस जाते हैं, उन्हें लगता है कि जो भी थोड़ा-बहुत मिल रहा है उसे ले लेना चाहिए। चुनाव के बाद, वे पाते हैं कि उन्हें कैसे धोखा दिया गया है, पूरी तरह से और उनका जीवन और भी बदतर हो गया है।
चुनावी मैदान में अब सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय बुर्जुआ दल केंद्र या राज्य में सत्ता-सुख चख चुके है। और क्यों भ्रष्टाचार पूँजीवाद के पतन की एक बानगी बन गया है और वस्तुतः देश के दस्तूर के मुताबिक, इनमें से कोई भी पक्ष इससे मुक्त नहीं है। वे कहते हैं कि उनके सांसद और विधायक जन प्रतिनिधि हैं। लेकिन पिछली लोकसभा में 545 में से 442 (यानी 82%) सांसद करोड़पति थे, सबसे अमीर के पास 683 करोड़ रुपये थे। क्या तब वे गरीब उत्पीड़ित लोगों का प्रतिनिधित्व करते थे या मुट्ठी भर अमीरों का? पहले लोग राजनीतिक नेताओं का सम्मान करते थे। अब, कड़वे अनुभव से, वे राजनेताओं से नफरत करते हैं। ऐसा क्यों है? क्योंकि, जब धर्म प्रगतिशील था, तो उसने उच्च चरित्र के महापुरुषों को जन्म दिया था। लेकिन बाद में जब धर्म सामंती राजशाही के लिए अपनी सेवा में प्रतिक्रियावादी बन गया तो यह नैतिकता प्रदान करने में विफल रहा। तब लोकतांत्रिक क्रांति के समय, बुर्जुआ मानवतावाद ने अपने उभरने के दौर में उच्च चरित्रों का निर्माण किया। हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं में भी उच्च नैतिक चरित्र था। लेकिन अब पूंजीवाद अपने आप में भ्रष्ट, जनविरोधी और नैतिक मूल्यों से रहित है, स्वाभाविक रूप से मौजूदा भ्रष्ट व्यवस्था के ताबेदार रहने वाले नेता पूरी तरह से भ्रष्ट, पाखंडी और धोखेबाज बन जाते हैं। वे अब शराब की दुकानें खोलने में व्यस्त हैं, लॉटरी व्यापार का दायरा बढ़ा रहे हैं, फिल्म, टीवी और अन्य मीडिया के माध्यम से सभी प्रकार की अश्लीलता, सेक्स-विकृतियों और सड़ी हुई संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं ताकि मानव सार को नष्ट किया जा सके, लोगों को अमानवीय बनाया जा सके और उन्हें, विशेष रूप से युवाओं को भीतर से पंगु बनाया जा सके ताकि वे विरोध की आवाज न उठा सकें और इन दलों के लिए बाहुबलियों के रूप में उन्हें खरीदा जा सके।
एक लंबे समय तक कांग्रेस ने देश पर शासन किया और ‘समाजवादी तर्ज के समाज’, ‘गरीबी हटाओ’ जैसे लुभावने नारों के साथ लोगों से मक्कारी की गई। जब कांग्रेस एक पर एक महाघोटोलों में धंसते जाने सहित अपनी घोर जन-विरोधी एकाधिकारी पूंजीपतिपरस्त नीतियों के कारण पूरी तरह से बदनाम हो गई तो शासक पूंजीवादी वर्ग ने संसदीय राजनीति में विकल्प के रूप में भाजपा को पेश किया और उसका समर्थन किया। भाजपा ने भी चुनाव से पहले ‘अच्छे दिन’ लाने के ढेर सारे झूठे वादे किये। लेकिन इसके 5 साल के शासन में स्थिति बद से बदतर होती चली गई है। लोगों की दुर्दशा कई गुना बढ़ गई है। यह याद दिला दें कि बीजेपी के संरक्षक यानी आरएसएस ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का पूरी तरह से विरोध किया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक एम एस गोलवलकर ने स्पष्ट रूप से कहा था कि 'ब्रिटिश-विरोधी क्षेत्रीय राष्ट्रवाद’ के सिद्धांतों ने लोगों को हिंदू राष्ट्र की सकारात्मक और प्रेरक सामग्री से वंचित कर दिया था। इसलिए, उनके अनुसार राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष प्रतिक्रियावादी था और स्वतंत्रता आंदोलनों के श्रद्धेय नेता और शहीद प्रतिक्रियावादी, देशद्रोही और गैर-देशभक्त के सिवा और कुछ नहीं थे। वास्तव में, आरएसएस ने ब्रिटिश साम्राज्यवादियों का पूरा सहयोग किया। अब वही आरएसएस और भाजपा, राष्ट्रवादी और देशभक्त होने का दावा कर रही हैं।
मार्क्सवादी के रूप में हम नास्तिक हैं, लेकिन हम यह भी जानते हैं कि सभी धर्म प्रचारक महापुरुष थे और वे सभी, उस अवधि के दौरान जब धर्म की एक प्रगतिशील भूमिका थी, सामाजिक हित-उद्देश्य के लिए लड़े थे, उन्हें तत्कालीन शासकों का कोपभाजन होना पड़ा था और उनके द्वारा उन्हें सताया भी गया था। उनमें से किसी ने भी कभी किसी अन्य धर्म के खिलाफ घृणा का प्रचार नहीं किया। लेकिन अब आरएसएस-भाजपा इसके ठीक विपरीत काम कर रही है। वे धर्म के नाम पर सांप्रदायिकता- कट्टरता को उकसा रहे हैं। क्या चैतन्य, रामकृष्ण या विवेकानंद ने बाबरी मस्जिद को गिराने या उसकी जगह राममंदिर बनाने का आह्वान किया था? क्या तुलसीदास के रामचरित मानस में बाबरी मस्जिद के बारे में ऐसा कोई संदर्भ है कि यह राम की जन्मभूमि पर बनायी गयी है? ये कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे, जिन्होंने बाबरी मस्जिद का ताला खोला और चुनावी लाभ के लिए वहाँ रामलला की पूजा की अनुमति दी। इसके अलावा, हम जानते हैं कि कट्टर हिंदू सांप्रदायिक आरएसएस-भाजपा ने कैसे इसका पूरा फायदा उठाया। इनकी राह पर चलते-चलते सांप्रदायिक दंगे-फसादों का देशव्यापी प्रसार हुआ जिसने कई बेकसूर लोगों की जान ले ली, इतने सारे परिवारों को शोक संतप्त और बेघर कर दिया, कई महिलाओं की इज्जत-आबरू को लूटा गया, सांप्रदायिक तनाव और जुनून के साथ माहौल को बिगाड़ दिया गया और पूंजीवाद के तहत समान रूप से शोषित, उत्पीड़ित और दमित विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच घृणा और अविश्वास भर देने में मदद की। तब यह क्या कोई धर्म का  पालन है? कौन नहीं जानता कि ये सब बड़ी चतुराई से ध्रुवीकरण के माध्यम से वोट बैंक बनाकर चुनावी लाभ लेने और उत्पीड़ित लोगों की लोकतांत्रिक एकता को नष्ट करने के लिए रची गई चाल हैं? अक्सर ये शासक धार्मिक, जातिगत, इलाकापरस्त तनावों और दंगे-फसादों को भड़काते और आग लगाते हैं। दलित और आदिवासी भी शोषित-उत्पीड़ित और दमित हैं।
इसके अलावा, देश में फासीवादीकरण पर जोर देने के लिए वे वैज्ञानिक सोच को नष्ट कर रहे हैं और धार्मिक अंध विश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं और लोगों को यह विश्वास दिलाने में लगे हुए हैं कि ‘जीवन ईश्वरीय आदेश द्वारा संचालित होता है’ और उनके दुखों का कारण ‘पिछले जन्म में किया हुआ पाप’ है और अमीर ‘सर्शक्तिमान ईश्वर के आशीर्वाद’ से अमीर होते हैं। 
अब जब भाजपा अलोकप्रिय हो गई है, तो विकल्प के रूप में कांग्रेस को वापस लाने का प्रयास है। लेकिन वे दोनों एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। कांग्रेस कभी भी धर्मनिरपेक्ष नहीं थी। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान, इसके नेताओं ने एक सुधारवादी किस्म के विरोधी की भूमिका निभाई, धार्मिक विचारों को बढ़ावा दिया और हिंदू धर्म का प्रमुख रूप से संरक्षण किया। इसलिए, एक सच्चे धर्मनिरपेक्ष मानवतावादी फलक पर विकसित होने की बजाय भारतीय राष्ट्रवाद वस्तुतः एक हिंदू धर्म-उन्मुख राष्ट्रवाद बन कर रह गया। केवल नेताजी सुभाष, भगत सिंह, रवींद्रनाथ, शरत चंद्र, प्रेमचंद, सुब्रमणयम भारती, नजरुल - इसके अपवाद थे। कांग्रेस ने राउरकेला, भागलपुर, नेल्ली और दिल्ली में भी दंगे करवाये। कांग्रेस अध्यक्ष बीजेपी नेताओं के साथ मंदिरों में जाने की प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं और ‘नरम हिंदुत्व’ का प्रचार कर रहे हैं। उसी कांग्रेस ने देश पर आपातकाल लगाया था, कई काले कानून, जैसे टाडा, मीसा, एस्मा आदि लागू किये थे, कई आंदोलनों को बेरहमी से कुचल दिया था, कई किसानों, श्रमिकों, छात्रों और युवाओं को मार डाला था। इसलिए कांग्रेस कभी भी धर्मनिरपेक्ष या लोकतांत्रिक नहीं थी। यह खेद की बात है कि उसी कांग्रेस को अब सीपीआई (एम)-सीपीआई द्वारा संसद में कुछ सीटें हासिल करने के लिए ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘लोकतांत्रिक’ के रूप में पेश किया जा रहा है। इससे पहले, सीपीआई (एम) ने विशुद्ध रूप से तुच्छ चुनावी स्वार्थ के लिए कांग्रेस की ‘निरंकुशता’ का विरोध करने की आड़ में 1977 में आरएसएस-जनसंघ को लेकर बनी जनता पार्टी से हाथ मिलाया था। इसके बाद, सीपीआई (एम) वीपी सिंह को प्रधानमंत्री पद के लिए अभिषेक करने में भाजपा के साथ मिल गई थी और अब सीपीआई (एम) भाजपा की सांप्रदायिकता के विरोध के नाम पर कांग्रेस से मिल रही है।
पहले से ही स्वतःस्फूर्त छिटपुट आंदोलन और प्रतिवादी आंदोलनों के रूप में जन असंतोष फूट पड़ रहा है। हमारी पार्टी की दृढ़ राय है कि ऐसे फूट पड़ रहे जन प्रतिवादों को संगठित रूप और उचित दिशा प्रदान करना लाजिमी फर्ज बनता है। जन जीवन की ज्वलंत समस्याओं पर वर्ग संघर्षों और जन आंदोलनों को गठित और तीव्र करने की आवश्यकता है। इसके अलावा, विभिन्न बुर्जुआ पार्टियों की एक-दूसरे के साथ अनबन है। क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पूँजी के बीच तीव्र द्वंद्व साफ प्रकट है। यहाँ तक कि एकाधिकारी पूँजीपति घराने भी विभिन्न आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर बंटे हुए हैं। इस तरह की अनुकूल स्थिति का तकाजा है कि बुर्जुआ सत्ता की राजनीति के विकल्प के रूप में संयुक्त शक्तिशाली वाम आंदोलन उमड़ें। हमने उनसे एकजुट प्रयासों के साथ शक्तिशाली वर्ग संघर्ष और जन संघर्ष विकसित करने का आग्रह किया। लेकिन उन्होंने वह उम्मीद पूरी नहीं की। बस कुछ सीटें हासिल करने के लिए सीपीआई (एम) और सीपीआई संघर्षशील वामपंथ का रास्ता छोड़ कर बेशर्मी से कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय बुर्जुआ पार्टियों की पिछलग्गू बनने में लिप्त हैं और इस तरह से वे वामपंथ को और भी बदनाम और कमजोर कर रही हैं।
हमारी पार्टी हमारी संगठनात्मक ताकत के आधार पर विभिन्न राज्यों में लोगों की विभिन्न मांगों पर वर्ग संघर्ष और जन आन्दोलन खड़े कर रही है। निसन्देह, इस प्रक्रिया में चल रहे संघर्षों के एक अंग के रूप में, हम चुनाव में भाग लेंगे। हम लोगों के सामने यह ऐतिहासिक सच्चाई रखेंगे कि केवल सरकार बदलने से ही जीवन में दुख-तकलीफों का खात्मा नहीं होगा। इस भीषण उत्पीड़न से मुक्ति केवल पूँजीवाद-विरोधी समाजवादी क्रान्ति सम्पन्न करने से ही मिल सकती है। क्रांति की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए, सही रास्ते पर और सर्वहारा क्रांतिकारी विचारधारा और उच्च संस्कृति के आधार पर वर्ग संघर्ष और जन आन्दोलन गठित करने और तेज करने की आवश्यकता है। यदि हमारा कोई भी उम्मीदवार निर्वाचित होता है, तो वह निर्भीकता से जन हित के उद्देश्य को बुलंद करेगा और सदन के अंदर जन आंदोलनों की आवाज को प्रतिबिंबित करेगा ताकि जन संघर्ष के साथ संसदीय संघर्ष का समन्वय हो सके। ◆◆◆

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