नीम का एक देवता
नीम का देवता
एक ग्राम देवता की कहानी
हमारे ग्राम देवता अनेक रूप धारण कर आते हैं।
इन देवताओं में देवियों के स्वरूप भी हैं और देवों के भी।
ये प्रायः इंसानों के सर पर सवार होकर आते हैं, पर कभी-कभी इनका अवतरण पौधो और जानवरों के रूप में भी होता है।
अलग-अलग इलाकों में वहाँ फैलने वाली बीमारियों, अक्सर आने वाली आपदाओं, अप्राकृतिक मौतों, मौसमी विपत्तियों और न समझ में आई वाली आसमानी या जमीनी हलचलों-हरक़तों के अनुसार इन देवताओं के स्वरूप बनते-बिगड़ते देखे जा सकते हैं।
इन देवताओं की भगवानों की तरह कोई निश्चित कहानियाँ या गाथायें नहीं हैं। वे देश-काल के अनुसार निर्मित होती हैं। इनमें अनेक अलौकिक-आध्यात्मिक तत्त्वों के साथ-साथ भूत-प्रेत, पिशाच, बरमबाबा, डायन, डाकिन, चुड़ैल, जिन्न, माई, मूड़कट्टन आदि आधिभौतिक तत्त्वों का अस्तित्व पाया जाता है।
पीपल, नीम, बरगद, बबूल, रूस(ष), गूलर, आम, कैथ आदि पेड़ों में देश-काल के अनुसार अलग-अलग प्रकार के आधिभौतिक तत्त्वों की कल्पना की जाती रही है।
इस नीम के देवता के पीछे शीतला-माई की संकल्पना है। पूरे गाँव के लोग इस नीम के पेड़ में अपनी कल्पनाओं के हिसाब से शीतला-माई का दर्शन करते और उन्हें जल-फूल-अच्छ्त-सिंदूर-रोट-पूड़ी आदि प्रसाद चढ़ाते रहे हैं। अपनी-अपनी क्षमता और आवश्यकता के अनुसार लाए गए प्रसाद में से कुछ बाँट देते रहे हैं या देवी-देवता को मिल गया तो समझो सबको मिल गया, मानकर घर जाकर प्रसाद से तृप्ति पाते रहे हैं।
लेकिन शीतला-माई को इतने से शांति नहीं मिलती। इसलिए साल में कम से कम एक बार माली इनके कदमों में पचरा गा और गांव-घर का दुखड़ा सुना उन्हें संतुष्ट करने की कोशिश करता रहा है। बदले में उसे जो कोई जो कुछ रूपया-पैसा सीधा-पिसान दे-दे उसे वह ले, वह गांव को शीतला-माता के प्रकोप से बच जाने का अहसास कराता रहा है।
ऐसे में एक दिन ऐसा आया कि न जाने कितना (सैकड़ों!) साल पुराना यह नीम का पेड़ तेज आये अंधड़ में धरासाई हो गया। कोई कहता है यह गांव पर आने वाले किसी अनिष्ट का सूचक है, कोई कहता है कि शीतला-माता रूठकर यहां से कहीं और चली गईं, कोई कुछ सोचता-कहता है, कोई कुछ। पर ग्राम-देवता का यह आश्रय अब लकड़ियां बन चुका है। ★★■■

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