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एक कवि:

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                                    स्वाधीन कलम                                    - गोपाल सिंह नेपाली राजा बैठे सिंहासन पर, यह ताजों पर आसीन क़लम, मेरा धन है स्वाधीन क़लम! जिसने तलवार शिवा को दी रोशनी उधार दिवा को दी पतवार थमा दी लहरों को खंजर की धार हवा को दी अग-जग के उसी विधाता ने, कर दी मेरे आधीन क़लम मेरा धन है स्वाधीन क़लम! रस-गंगा लहरा देती है मस्ती-ध्वज फहरा देती है चालीस करोड़ों की भोली किस्मत पर पहरा देती है संग्राम-क्रांति का बिगुल यही है, यही प्यार की बीन क़लम मेरा धन है स्वाधीन क़लम! कोई जनता को क्या लूटे कोई दुखियों पर क्या टूटे कोई भी लाख प्रचार करे सच्चा बनकर झूठे-झूठे अनमोल सत्य का रत्‍नहार, लाती चोरों से छीन क़लम मेरा धन है स्वाधीन क़लम! बस मेरे पास हृदय-भर है यह भी जग को न्योछावर है लिखता हूँ तो मेरे आगे सारा ब्रह्मांड विषय-भर है रँगती चलती संसार-पटी,...

ज्वलंत:

                          अहंकार की 'राजनीति' उत्तर प्रदेश के कई जिलों में गत 26 नवंबर को सम्पन्न हुए चुनाव में एक प्रवृत्ति आम थी : चुनाव-आयोग की भरसक कोशिशों के  बावज़ूद लोग चुनाव में बहुत कम वोट डालने पहुँचे! क्यों?...इसका सटीक उत्तर किसी के पास नहीं है। पर एक बात आम तौर पर देखी गई। राजनीतिक दलों के  अपने-अपने चुनाव-चिह्नों से चुनाव लड़ने की घोषणा करने के बावज़ूद न तो इन दलों ने और न ही इनके प्रत्याशियों ने मतदाताओं से कोई विशेष संपर्क किया! शायद इन्हें यह विश्वास हो चला है कि इनके वोटर जाएंगे कहाँ!...आख़िर लौट के उन्हें इनके पास ही आना है...इन्हें ही वोट देना है। इसीलिए सिवाए एकाध रैलियों और किसी प्रांतीय नेता की एकाध जनसभा के  इन्होंने सिर्फ़ अपने ही टिकट से वंचित रहे नेताओं को मनाने का काम किया। इन्हें डर था तो सिर्फ़ रूठे नेताओं के 'वोट-बैंक' को साधने का। उधर आम मतदाता अपने प्रति इनकी इस बेरुखी से अपने को उपेक्षित महसूस करता रहा!             दलों और प्रत्याशियों की...

उत्तर प्रदेश में निकाय-चुनाव

     उत्तर प्रदेश में आजकल निकाय चुनाव चल रहे हैं। नगर-निगमों और महानगरों की व्यवस्थाओं को देखने के लिए इनका इस्तेमाल होता है। किन्तु बहुधा देखा गया है कि जनता की असुविधाएं जस की तस रहती हैं, पर चुने गए प्रतिनिधियों के वारे-न्यारे हो जाते हैं। यही कारण है कि संसदीय चुनावों की तरह इन चुनावों में भी आम जनता की रुचि ज़्यादा नहीं है। ज़्यादातर प्रत्याशियों, उनके रिश्तेदारों, उनके यारों की ही इन चुनावों में विशेष रुचि देखी जाती है। बाकी लोग तो बस इसे 'त्यौहार' मानते हैं। सब जगह छुट्टी होती है, इसलिए 'चलो, वोट दें आएं'...'मज़मा देख आएं'...-जैसा दृष्टिकोण सर्वत्र दिखाई पड़ता है। 'पब्लिक' इसे 'तमाशा' सिद्ध करती है। लगभग पचास से साठ फीसदी वोटिंग इस बात का सबूत है कि जन-प्रतिनिधि कहे जाने वाले लोगों को बड़ी संख्या में लोग अपना नुमाइंदा नहीं मानते।          इसका मुख्य कारण हमारे हुक्मरानों द्वारा इन और उन चुनावों के बाद 'पब्लिक' को अपने से अलग कर स्वयं को 'राजा' जैसा दिखाना है। 'विकास' के नाम पर सड़कों आदि की कुछ मरम्मत हो जाने मात्र से ज...

कलीम आजिज़

तुम क़त्ल करो हो की करामात करो हो! दिन एक सितम, एक सितम रात करो हो वो दोस्त हो, दुश्मन को भी जो मात करो हो. मेरे ही लहू पर गुज़र औकात करो हो मुझसे ही अमीरों की तरह बात करो हो हम खाकनशीं तुम सुखन आरा ए सरे बाम पास आके मिलो दूर से क्या बात करो हो हमको जो मिला है वो तुम्हीं से तो मिला है हम और भुला दें तुम्हें? क्या बात करो हो दामन पे कोई छींट न खंजर पे कोई दाग तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो यूं तो कभी मुँह फेर के देखो भी नहीं हो जब वक्त पड़े है तो मुदारात करो हो बकने भी दो आजिज़ को जो बोले है बके है दीवाना है, दीवाने से क्या बात करो हो.

'संविधान-दिवस' और 'हम भारत के लोग'!

            'संविधान-दिवस' और 'हम भारत के लोग '                                                          -अशोक प्रकाश आज 'संविधान-दिवस' है!...पता नहीं क्यों पिछले कुछ सालों से भारत की आज़ादी के संघर्षों के प्रतीकों से कुछ लोगों को विशेष लगाव प्रदर्शित करने की जरूरत पड़ रही है! पता नहीं, आज़ादी के संघर्षों से उन्हें विशेष प्यार उमड़ आया है या वे इस प्रदर्शन से अपने पुरोधाओं के सद्कर्मों से संतुष्ट नहीं हैं और उन्हें बताना पड़ रहा है कि देखो, हम भी देशप्रेमी हैं, देशभक्त हैं...हम भी आज़ादी के संघर्षों से खुद को जोड़ते हैं। 'संविधान-दिवस' के प्रचार-प्रसार के इस नए दौर से कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। वरना, हम सब जानते हैं कि आज ही के दिन-26 नवम्बर, 1949 को देश के संविधान को 'आत्मार्पित' किया गया था! इस 'आत्मार्पण' की प्रक्रिया से दूर रहे कुछ लोग मनुस्मृति के संविधान को आज भी अपना सर्वश्रेष्ठ मार्ग-दर्शक मानते हैं और च...
किसान मुक्ति संसद:

एक रिपोर्ट :

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                                            किसान मुक्ति संसद             20-21 नवम्बर को दिल्ली ने रामलीला मैदान से संसद मार्ग तक किसानों के किसानों के जत्थे ही जत्थे देखे। पूरे देश के हज़ारों किसानों ने किसानों के प्रति सरकारों की बेरुखी के खिलाफ ' किसान मुक्ति संसद ' के माध्यम से सम्पूर्ण कर्ज़ा-मुक्ति और उपज का डेढ़ गुना मूल्य की प्रमुख मांगों से सम्बंधित प्रस्ताव पास कर केंद्र-सरकार के समक्ष रखा!             प्रस्तुत है सत्यवान की एक रिपोर्ट:                दिल्ली के संसद मार्ग पर आयोजित 'किसान मुक्ति संसद' में एकत्र हुए हजारों किसानों को संबोधित करते हुए स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव ने कहा कि सभी किसान यहाँ नरेंद्र मोदी की ओर ऊँगली उठा कर इशारा कर रहे हैं कि उन्होंने किसानों को गर्त में धकेल दिया है। बिहार भाजपा अध्यक्ष ने एक विवादित बयान देते हुए कहा था...