उत्तर प्रदेश में निकाय-चुनाव

     उत्तर प्रदेश में आजकल निकाय चुनाव चल रहे हैं। नगर-निगमों और महानगरों की व्यवस्थाओं को देखने के लिए इनका इस्तेमाल होता है। किन्तु बहुधा देखा गया है कि जनता की असुविधाएं जस की तस रहती हैं, पर चुने गए प्रतिनिधियों के वारे-न्यारे हो जाते हैं। यही कारण है कि संसदीय चुनावों की तरह इन चुनावों में भी आम जनता की रुचि ज़्यादा नहीं है। ज़्यादातर प्रत्याशियों, उनके रिश्तेदारों, उनके यारों की ही इन चुनावों में विशेष रुचि देखी जाती है। बाकी लोग तो बस इसे 'त्यौहार' मानते हैं। सब जगह छुट्टी होती है, इसलिए 'चलो, वोट दें आएं'...'मज़मा देख आएं'...-जैसा दृष्टिकोण सर्वत्र दिखाई पड़ता है। 'पब्लिक' इसे 'तमाशा' सिद्ध करती है। लगभग पचास से साठ फीसदी वोटिंग इस बात का सबूत है कि जन-प्रतिनिधि कहे जाने वाले लोगों को बड़ी संख्या में लोग अपना नुमाइंदा नहीं मानते।
         इसका मुख्य कारण हमारे हुक्मरानों द्वारा इन और उन चुनावों के बाद 'पब्लिक' को अपने से अलग कर स्वयं को 'राजा' जैसा दिखाना है। 'विकास' के नाम पर सड़कों आदि की कुछ मरम्मत हो जाने मात्र से जनता स्वयं को इनसे अलग मान लेती है। दूसरी तरफ, 'जनता के ये प्रतिनिधि' हर चुनाव के बाद जनता से दूर होते चले जाते हैं। बिल-बॉउचर उन्हें 'राजा' बना देता है और जनता को 'प्रजा'! अगर शासकों ने यह नज़रिया नहीं बदला तो दोनों शक्तियों में यह दूरी बढ़ती ही जानी है।...

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