ज्वलंत:

                        अहंकार की 'राजनीति'

उत्तर प्रदेश के कई जिलों में गत 26 नवंबर को सम्पन्न हुए चुनाव में एक प्रवृत्ति आम थी : चुनाव-आयोग की भरसक कोशिशों के  बावज़ूद लोग चुनाव में बहुत कम वोट डालने पहुँचे! क्यों?...इसका सटीक उत्तर किसी के पास नहीं है। पर एक बात आम तौर पर देखी गई। राजनीतिक दलों के  अपने-अपने चुनाव-चिह्नों से चुनाव लड़ने की घोषणा करने के बावज़ूद न तो इन दलों ने और न ही इनके प्रत्याशियों ने मतदाताओं से कोई विशेष संपर्क किया! शायद इन्हें यह विश्वास हो चला है कि इनके वोटर जाएंगे कहाँ!...आख़िर लौट के उन्हें इनके पास ही आना है...इन्हें ही वोट देना है। इसीलिए सिवाए एकाध रैलियों और किसी प्रांतीय नेता की एकाध जनसभा के  इन्होंने सिर्फ़ अपने ही टिकट से वंचित रहे नेताओं को मनाने का काम किया। इन्हें डर था तो सिर्फ़ रूठे नेताओं के 'वोट-बैंक' को साधने का। उधर आम मतदाता अपने प्रति इनकी इस बेरुखी से अपने को उपेक्षित महसूस करता रहा!
            दलों और प्रत्याशियों की आम जनता के प्रति बढ़ रही बेरुखी और हवाई मुद्दों के चुनाव के बाद हवा हो जाने के कारण मतदाता खुद को ठगा महसूस करते हैं। इस चुनाव में भी ऐसा ही हुआ है, ऐसा ही हो रहा है। मतदाता जानता है कि ये सब एक थैली के चट्टे-बट्टे हैं, कभी इस दल में तो कभी उस दल में! इसलिए अगर वह और कुछ नहीं कर सकता तो वोट न डालकर अपना मौन-विरोध तो जता ही सकता है। जनता ने यही किया है। भले ही राजनीतिक दलों और उनके नेताओं पर इससे कोई ख़ास फर्क़ न पड़े....जिसको जीतना है,  जीतेगा ही! पर अगर जनता अगर ऐसे ही अपनी हार मानती रही तो इस व्यवस्था के लिए यह अशुभ संकेत है!🔺

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