माटी के गीत-2:
अवधी भाखा कै कविताई, कइसे न पढ़ै कै मन ललचाई!... ★ अमरेंद्र अवधिया कै दुइ कविता: (१) बसंत पंचमी कै सुभकामना! सिरसई कै डारी लउँचि उठी बरगद बाबा मुसक्याइ दिहिन पिपरे कै बरम सवाँचि उठे अमऊ डउँगी पुलक्याइ दिहिन। ताले पै धूप परी जइसे नैनू रचि जाय गदोरी पै गोरू-बछरू चिरई-परई हुलसै लागे सब ओरी कै। यक चाँद सुरतिया गमकि उठी सगरौ सेवान हरखाय गवा कुछ कसक उठा कुछ मसक उठा कुछ ऊभ-चूभ सुधियाय गवा.. (२) कवन सपेरा : कवन सपेरा बीन बजावै न्याव, प्रसासन, बिधि-बिधायिका : सबका नाच नचावै जाति-धरम चिनगी परचावै, धूँ-धूँ लपट उठावै बेकारन क भाँगि क गोला, टूका दयि ...