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माटी के गीत-2:

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                                                                                           अवधी भाखा कै कविताई,                            कइसे न पढ़ै कै मन ललचाई!...  ★ अमरेंद्र अवधिया कै दुइ कविता: (१) बसंत पंचमी कै सुभकामना! सिरसई कै डारी लउँचि उठी बरगद बाबा मुसक्याइ दिहिन पिपरे कै बरम सवाँचि उठे अमऊ डउँगी पुलक्याइ दिहिन। ताले पै धूप परी जइसे नैनू रचि जाय गदोरी पै गोरू-बछरू चिरई-परई हुलसै लागे सब ओरी कै। यक चाँद सुरतिया गमकि उठी सगरौ सेवान हरखाय गवा कुछ कसक उठा कुछ मसक उठा कुछ ऊभ-चूभ सुधियाय गवा.. (२) कवन सपेरा : कवन सपेरा बीन बजावै न्याव, प्रसासन, बिधि-बिधायिका : सबका नाच नचावै जाति-धरम चिनगी परचावै, धूँ-धूँ लपट उठावै बेकारन क भाँगि क गोला, टूका दयि ...

गणतंत्र दिवस:

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                                            गणतन्त्र-दिवस की शुभकामनाएं! हर बार गणतंत्र-दिवस के शुभ-अवसर पर नागार्जुन की यह कविता हमें बहुत-कुछ याद दिलाती है! अब भी यह वैसी ही समीचीन लगती है!...क्या सचमुच इसकी प्रासंगिकता कभी कम न हो पाएगी?...                         🔴  किसकी है जनवरी...  🔴                                                         -नागार्जुन किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है? कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है? सेठ है, शोषक है, नामी गला-काटू है गालियां भी सुनता है, भारी थूक-चाटू है चोर है, डाकू है, झूठा-मक्कार है कातिल है, छलिया है, लुच्चा-लबार है जैसे भी टिकट मिला, जहां भी टिकट मिला शासन के घोड़े पर वह भी सवार है उसी की जनवरी छब्बीस उ...

आया वसंत!:

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                              वसंत पर चार कविताएँ         साभार: राजकमल प्रकाशन सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला': सखि, वसंत आया भरा हर्ष वन के मन नवोत्कर्ष छाया सखि, वसंत आया! किसलय-वसना नव-वय-लतिका मिली मधुर प्रिय उर तरु-पतिका, मधुप-वृन्द बंदी पिक-स्वर नभ सरसाया सखि, वसंत आया! लता-मुकुल हार गंध-भार भर, बही पवन बन्द मन्द मन्दतर जागी नयनों में वन- यौवन की माया सखि, वसंत आया! आवृत सरसी उर सरसिज उठे केशर के केश कली के छुटे स्वर्ण शस्य अँचल पृथ्वी का लहराया सखि, वसंत आया! ■ सोहनलाल द्विवेदी: सरसों खेतों में उठी फूल बौरें आमों में उठीं झूल बेलों में फूले नये फूल पल में पतझड़ का हुआ अंत आया वसंत आया वसंत। लेकर सुगंध बह रहा पवन हरियाली छाई है बन बन, सुंदर लगता है घर आँगन है आज मधुर सब दिग दिगंत आया वसंत आया वसंत। भौरे गाते हैं नया गान, कोकिला छेड़ती कुहू तान हैं सब जीवों के सुखी प्राण, इस सुख का हो अब नही अंत घर-घर में छाये नित वसंत। ■ सुमित्रान...

एक कविता: वे तुमको गोली मारेगें

                                 वे तुमको गोली मारेगें!..                                                            - नागार्जुन बापू की प्रतिमा वाली बटनें चमकाते फौजी वर्दी में तानाशाह पधारेंगे, सच बोलोगे तो जीभ काट ली जायेगी चौराहे पर वे तुमको गोली मारेंगे। सैनिक अदालतों में जज होंगे अभिनेता तब घुट घुट कर इंसाफ गुहार लगाएगा, भू पर आते यम की नानी सकुचायेगी नंगा असत्य हिंसा से ब्याह रचायेगा। जय वीर गोडसे की ध्वनियाँ मुखरित होंगी छात्रो,श्रमिकों, का लहू बहाया जायेगा, मार्शल ही होंगे हिटलर के नाती-पोते पार्टी विहीन जनतन्त्र रंग दिखलायेगा।                                            ★★★★★  

उच्च-शिक्षा- 5: उत्तर प्रदेश

                                               उत्तर प्रदेश में उच्च-शिक्षा का खेल                                                                                प्रस्तुति: -  डॉ. राजेश चन्द्र मिश्र             विश्वविद्यालयों, अखबार और संचार माध्यमों की विभिन्न सूचनाओं के अनुसार उत्तर प्रदेश में लगभग 6000 स्ववित्तपोषित महाविद्यालय है, किन्तु उच्च शिक्षा विभाग उत्तर प्रदेश शासन की अपुष्ट सूचनाओं के अनुसार 3016 स्ववित्तपोषित महाविद्यालय हैं! महाविद्यालयों की सुनिश्चित सूचना के अभाव में इनकी संख्या को लेकर कई संदेह और शंकाएँ पैदा होती हैं!...             कुछ उदाहरणों से इसे समझ जा सकता है: ● इसे उच्च शि...

माटी के गीत-१ :

बघेली किसानी-गीत:               'पानी परिगा, पथरा परिगा सरि  गई सगरी पियाजु                        किसनवा कै मरही होइ गै रे!..' देश का किसान आज एक अभूतपूर्व स्थिति से गुज़र रहा है। जहां भूमिहीन किसान-मजदूर शहरों की तरफ भाग कर दिहाड़ी-मज़दूर बनकर जैसे-तैसे ज़िन्दगी काटने को मजबूर हैं, वहीं छोटे-मझोले किसान खाद-बीज-पानी-बिजली के अलावा कर्ज़ के शिकार होने के कारण लगातार बदहाल हो रहे हैं!...         ऐसी ही स्थितियों को बयां करता है बघेली का यह मार्मिक किसानी-गीत:                                               साभार -राजेश मिश्र, यू-ट्यूब

श्रद्धांजलि: दूधनाथ सिंह

                                                  श्रद्धांजलि: प्रो.दूधनाथ सिंह वे एक अलग अध्यापक थे! उनकी कक्षा में कोई विद्यार्थी बोर नहीं महसूस करता था। अपनी स्पष्ट समझ और धारदार शैली से वे हम सबके प्रिय अध्यापकों में से थे!...हम सब इंतज़ार करते कि प्रेमचंद पढ़ते हुए हमें अपने गाँव-गिरांव की सैर करने के अलावा और बहुत कुछ मिलेगा! गोदान- किसी होरी की कथा-व्यथा नहीं है, यह सामंती व्यवस्था की प्रतिकार-कथा है! मेहता-मालती कोई श्रेष्ठ बुद्धिजीवी पात्र नहीं हैं, वे समाज के उस मध्यवर्ग के प्रतिनिधि हैं जिसे मार्क्स ने समाज का थूक कहा है!...उनके ये शब्द मुझे आज भी नहीं भूलते!          उनकी कक्षा हमेशा उत्तेजना पैदा करने वाली होती। निराला के प्रति विद्यार्थियों के पूज्य-भाव को तोड़कर उनकी कविताओं के संघर्ष से वे उन्हें रूबरू कराते! विश्वविद्यालय से बेहतर उनके घर पर हम जैसों की क्लास होती!...            'निराला:आ...