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कविता: विरोध-मार्च पर लाठीचार्ज

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                        विरोध मार्च पर लाठीचार्ज                                                 - हरमीस बोहेमियन अब आसमान से आग बरसे कि सामने खड़ा कर दो मौत की दीवार हम आग से गर्माहट लेंगे और मृत्यु से करेंगे दोस्ती हम अपनी हड्डियों में बारूद भरकर निकले हुए लोग हैं हम तुम्हारे खिलौनों से नहीं डरते तुम हमारे जिस्मों पर अपने कायर होने का निशान देते हो समझते हो यह हमारे लिए नया है और भूल जाते हो , यह निशान विरासत में मुझे मेरे पुरखे से मिला है अपने हक़ और आज़ादी के लिए लड़ना या लड़ते हुए कुर्बान हो जाने का इतिहास हमारे रक्त में बह रहा है सदियों से हम जानते हैं राह चलते गर अचानक से आ जाये भेड़ियों का दल तो हमें क्या करना है हम जानते हैं कि जब खतरे में पड़ जाये जान तो हमें क्या करना है हम जानते हैं कि जब कुर्सी पर बैठा हो पगलाया शैतान तो हमें क्या करना है हमें अपने साथियों का...

हम देश, हमारा देश- 2:

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                             ऐसा नहीं होना चाहिए!...                      कभी नहीं और कहीं नहीं होना चाहिए!... लगता है जैसे कोई ललकार रहा हो! हिम्मत है तो आ- हमारा लगता है जैसे कोई ललकार रहा हो!...हिम्मत है तो आ- हमारा सामना कर!...  महाभारत का यह उद्धत-आह्वान-'युद्धं देहि!...' उन सबको पसंद है जो शेरदिल हैं और तमाम प्राणियों के साथ इंसानों को भी जैसे खा जाने में विश्वास करते हैं! 'वीरभोग्या बसुंधरा' सिद्धांत के ये हिमायती 'राजा राज करने के लिए पैदा होता, प्रजा सेवा करने के लिए' -में भी विश्वास करते हैं और इसमें भी कि 'अमीर-गरीब, ऊंच-नीच, अच्छे-बुरे सब ऊपर वाले के बनाए होते हैं... और इसमें भी कि अमीर, ऊंच, अच्छा होना उनका जन्मजात अधिकार है! तो मारे जाने वालों, तुम मारे जाने के लिए ही पैदा हुए थे!... ....और हे मृतकों के शवों पर रोने वालों और इनके मरने पर मातम मनाने वाले देशवासियों, तुम व्यर्थ चिंतित हो रहे हो!...देखो तो, इनकी तरह तुम भी मरे ही हुए ह...

इतिहास-कथा: ढिल्लिका से दिल्ली वाया गज़नी -संजीव सिंह

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                                                                             ढिल्लिका से दिल्ली वाया गज़नी                                                   - संजीव सिंह …लोगों की पदचाप से इस विशाल परिसर की खामोशी टूट जाती है! बड़े-बड़े क्वार्टजाइट के प्रस्तर खंड सहम जाते हैं! अब उनमें कुछ भी नया देखने की ना तो चाह बची है और ना ही हिम्मत ... किसी अजनबी के आते ही प्राचीर के ऊपरी भाग में स्थित विशाल पत्थर एक दूसरे के साथ और दृढ़ता से मिल जाते हैं मानो इन नए आने वालों से घबरा रहे हो!...                  ...उन्हें नहीं पसंद कि कोई यहाँ आये! लेकिन लोग हैं कि आज भी इनको परेशान करते रहते हैं!... टूटी हुई शराब की बोतलें ...

दास्ताने-तालीम (कहानी) : 'दंपोली' से बचाओ!..

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                            'दंपोली' से बचाओ!...                                                                    -अशोक प्रकाश                          उस दिन क्लास के सामने पहुंचते ही दो बच्चों को जूझते देख विनीता मैडम का दिमाग और खराब हो गया!...              दिमाग खराब करने के लिए विभाग ही क्या कम है!...जूते की क्लास-बालक-बालिका-नाप सहित फीती लगाकर बोरों में भरने के बाद एमडीएम का राशन लाने के लिए बुग्गी वाले से चिरौरी-विनती कर जैसे ही मैडम विनीता लौटीं, कक्षा चार के बच्चे धमचाचर मचाए थे। कोई कुछ कह रहा था, कोई कुछ। सब गड्डमड्ड। कक्षा दो की सकीना रोए जा रही थी। बबलू मैडम की कुर्ती पकड़कर कुछ बताने या शिकायत करने की जिद कर रहा था।...

गज़ब!: शासक ब्राह्मणवादी ही होता है!...

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                        शासक ब्राह्मणवादी ही होता है!...             यह बहस छुपाई जाएगी!...खास तौर पर तथाकथित 'दलित' 'माननीय' के कारण! तथाकथित अम्बेडकरवादी इसे पचा नहीं सकते। क्योंकि वे मानते और मनवाना चाहते हैं कि 'जन्मना जायते शूद्र:' महामंत्र पर उन्हीं का पैटेंट है!ब्राह्मणवादी-मनुवादी भी इसे छुपाना चाहेंगे क्योंकि इससे उनकी पार्टी की छवि खराब होती है, उनके ब्राह्मणवाद पर पलीता तथाकथित एक 'ब्राह्मण' ही लगा रहा है।                       तथाकथित 'दलित और अम्बेडकरवादी' माननीय एक तथाकथित 'ब्राह्मण' से कह रहा है- आप कर्मकाण्डी बनिए!... तथाकथित 'ब्राह्मण' स्वाभाविक तौर पर इसे अपनी बेइज़्ज़ती समझता है!  जो समाज-चिंतक है, अर्थशास्त्री है, ब्राह्मणवाद-विरोधी है, वह कर्मकाण्डी-ब्राह्मणवादी कैसे हो सकता है?...अर्थशास्त्री डी. एम. दिवाकर यही सिद्ध कर रहे हैं।          असल मेें सत्ता धाारी ब्राह्मण ही होता है, उ...

हम देश, हमारा देश- 1: ऐ बनारसी विकास

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                                ऐ बनारसी विकास!..         सुनकर बहुत  बुरा लगता है, सोचकर और भी बुरा!...पर क्या आम इंसान के दिल से यही आह नहीं निकलती?...विकास की बलिवेदी पर न जाने कितने चढ़े हैं, न जाने कितने चढ़ाए गए हैं, पर क्या कोई उन बेमौत मारे गए लोगों के घरवालों को कभी संतुष्ट कर पाएगा कि 'विकास' के लिए कुछ लोगों की बलि कोई खास बात नहीं?...पर ऐसा इस देश में होता रहा है। लोग बलि चढ़ाए जाते रहे हैं। शायद ऐसे लोगों के लिए ही यह परिकल्पना गढ़ी गई है- ' उसकी मर्ज़ी के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता, इसलिए किसी को दोष मत दो!' 'अमर उजाला' के पत्रकार अजय राय इसका जवाब कुछ इस तरह देते हैं!... इंजीनयर अपना शास्त्र लेकर सर के बल खड़े हो जाएं तब भी नहीं बता पाएंगे कि चौकाघाट पुल के बीम गिरे क्यों। दरअसल बीम इंजिनीयरिंग की गलती से गिरा ही नहीं। यह पुलिस के भ्र्ष्टाचार और वसूली के चलते गिरा।  पुलिस चांदपुर चौराहे और लहरतारा पर पैसे लेकर 35-40 ओवरलोड बालू की ट्रकों को रात में 10 रोज स...

अटेवा: सरकार की 'ना' को 'ना'!

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                      ' पुरानी पेंशन बहाली' आंदोलन:                                   बढ़ता जनाक्रोश            कोई भी सरकार अपने आदेशों के खिलाफ़ जनाक्रोश का उभार नहीं देखना चाहती!...लेकिन लोगों के बर्दाश्त की भी एक हद होती है! आप सत्ता में होते हैं तो अपने सारे वायदों, सारे भाषणों को भूलकर अपने या अपने लोगों के नफ़े-नुक़सान के हिसाब से फैसले करने लगते हैं। आपको अपना वर्गीय हित सबसे ऊपर नज़र आता है। आप यह भी भूल जाते हैं कि आपको दुबारा जनता के बीच जाना है। नहीं, आप समझते हैं कि आप जनता की इच्छाओं से नहीं अपने हितैषियों के कंधे पर चढ़कर सत्ता पाते हैं। इसीलिए आपको जनता की कोई फिक्र नहीं होती। आप ऐसा कर सकते हैं, इसलिए ऐसा करते हैं!...            पर जनता क्या करे?...वह सिर्फ आपका विरोध कर पाती है। आपको वह भी अच्छा नहीं लगता! आप नहीं चाहते कि आपको लोग बेनक़ाब करें!...पर ऐसा नहीं होता। ऐसा कभ...