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'चुनाव'...- धूमिल

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' चुनाव': धूमिल की कविता मैंने देखा हर तरफ रंग-बिरंगे झण्डे फहरा रहे हैं गिरगिट की तरह रंग बदलते हुये गुट से गुट टकरा रहे हैं वे एक- दूसरे से दाँत-किलकिल कर रहे हैं एक दूसरे को दुर-दुर, बिल-बिल कर रहे हैं हर तरफ तरह -तरह के जन्तु हैं श्रीमान् किन्तु हैं मिस्टर परन्तु हैं कुछ रोगी हैं कुछ भोगी हैं कुछ हिंजड़े हैं कुछ रोगी हैं तिजोरियों के प्रशिक्षित दलाल हैं आँखों के अन्धे हैं घर के कंगाल हैं गूँगे हैं बहरे हैं उथले हैं,गहरे हैं. गिरते हुये लोग हैं अकड़ते हुये लोग हैं भागते हुये लोग हैं पकड़ते हुये लोग हैं गरज़ यह कि हर तरह के लोग हैं. एक दूसरे से नफ़रत करते हुये वे इस बात पर सहमत हैं कि इस देश में असंख्य रोग हैं और उनका एकमात्र इलाज- चुनाव है. लेकिन मुझे लगा कि एक विशाल दलदल के किनारे बहुत बड़ा अधमरा पशु पड़ा हुआ है उसकी नाभि में एक सड़ा हुआ घाव है जिससे लगातार-भयानक बदबूदार मवाद बह रहा है उसमें जाति और धर्म और सम्प्रदाय और पेशा और पूँजी के असंख्य कीड़े किलबिला रहे हैं और अन्धकार में डूबी हुई पृथ्वी (पता नहीं किस अनहोनी की प्रतीक...

शहीद' इन्हें कहते हैं...-23 मार्च

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23 मार्च, शहादत दिवस: शहीद अवतार सिंह 'पाश' की कविताएं 23 मार्च ------------ उसकी शहादत के बाद बाक़ी लोग किसी दृश्य की तरह बचे ताज़ा मुंदी पलकें देश में सिमटती जा रही झाँकी की देश सारा बच रहा बाक़ी उसके चले जाने के बाद उसकी शहादत के बाद अपने भीतर खुलती खिड़की में लोगों की आवाज़ें जम गयीं उसकी शहादत के बाद देश की सबसे बड़ी पार्टी के लोगों ने अपने चेहरे से आँसू नहीं, नाक पोंछी गला साफ़ कर बोलने की बोलते ही जाने की मशक की उससे सम्बन्धित अपनी उस शहादत के बाद लोगों के घरों में, उनके तकियों में छिपे हुए कपड़े की महक की तरह बिखर गया शहीद होने की घड़ी में वह अकेला था ईश्वर की तरह लेकिन ईश्वर की तरह वह निस्तेज न था उनके शब्द लहू के होते हैं --------------------------------- जिन्होंने उम्र भर तलवार का गीत गाया है उनके शब्द लहू के होते हैं लहू लोहे का होता है जो मौत के किनारे जीते हैं उनकी मौत से जिंदगी का सफर शुरू होता है जिनका लहू और पसीना मिटटी में गिर जाता है वे मिट्टी में दब कर उग आते हैं वफा ------------- बरसों तड़पकर तु...

'रेणु' की होली!....

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                                 'रेणु' की होली 🔴 मशहूर  कथाकार  फणीश्वर  नाथ  रेणु  के  बारे  में  " ८  मार्च  से  ११  अप्रील  ( जन्म - ८  मार्च  १९२१  औराही  हिंगना  तथा  मृत्यु  ११  अप्रील  १९७७  पटना  अस्पताल  में  )  तक  चर्चा  चलती  है  ।  रेणु  के  उपन्यास ,  कविता  में   होली  का  जिक्र  कई  तरह  से  आया  है  ।  ' नई  दिशा ' २ मार्च  १९५०  के   ' होली  अंक  में  उनकी  दो  कविताएँ  "  मँगरू  मियाँ  के  नए  जोगीडे ,  और  ' धमार  फगुआ  "  प्रकाशित  हुई   थी  -------                 "...

चुनाव-चर्चा :3: जनांदोलनों की आवाज बनेगी एसयूसीआई (कम्युनिस्ट)...

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चुनाव-चर्चा:         एसयूसीआई (कम्युनिस्ट)  119 सीटों पर लड़ेगी चुनाव                               महासचिव प्रभास घोष                द्वारा संसदीय चुनाव के लिए वितरित प्रेस हैंडआउट 17वीं लोकसभा गठित करने के लिए चुनावों की तारीखों की घोषणा कर दी गई है। इस घोषणा से पहले कई महीनों से राष्ट्रीय और क्षेत्रीय बुर्जुआ पार्टियाँ, मतदाताओं को धोखा देने के लिए चुनाव-पूर्व ढेर सारे वादों की बौछारें करने में व्यस्त हैं। साथ ही वे एक-दूसरे पर कीचड़-उछालने में लगे हुए थे। 17वीं, 18वीं और 19वीं सदी में अपने आगमनकाल में, पूँजीवाद ने निरंकुश सामंती-राजतंत्रीय व्यवस्था को उखाड़ फेंक कर वैज्ञानिक विचारों, लोकतंत्र, लोकतांत्रिक मूल्यों, धर्म से मुक्त धर्मनिरपेक्ष मानवतावाद की अवधारणा, समानता-स्वतंत्रता के उदात्त आदर्शों को बुलंद किया था और बुर्जुआ लोकतांत्रिक क्रांति संपन्न की थी। उस समय, पूँजीवाद की राजनीतिक प्रणाली के रूप में बहुदलीय संसदीय लोकतंत्र स्...

चुनाव-चर्चा :2: दल नहीं, देश है अधिक महत्वपूर्ण...

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                                     दल नहीं, देश !                                                      - कुमार प्रशांत                                              अध्यक्ष, गाँधी शांति प्रतिष्ठान                          2019 के आम चुनाव सामने आ खड़ा हुआ है. तारीखें भी घोषित हो चुकी हैं, अौर इस कदर क्षत-विक्षत घोषित हुई हैं कि लगता है यह बेहद घायल चुनाव होने जा रहा है. चुनाव अायोगों ने इस बात के लिए एक-दूसरे से जैसे स्पर्धा कर रखी है कि कौन सबसे लंबा चुनाव अायोजित करता है ! हमारा लोकतंत्र शुरू वहां से हुअा था कि एक ही दिन में सारे देश का, अौर वह भी लोकसभा अौर विधानसभा का ...

आत्मालाप-22: आज पुरुष-दिवस नहीं है...

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                            आज पुरुष-दिवस नहीं है...                                                 -अशोक प्रकाश भारत-माता के पुरुषों! आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है मतलब कम से कम आज पुरुष-दिवस नहीं है!... मनाइए सुबह की चाय आप बनाइए आठ रुपये में से दो रुपये श्रमशक्ति का मूल्य बचाइए फिर दिन भर का हिसाब लगाइए... हाल फ़िलहाल अगर आपने  जूते की लय के साथ कोई 'सांसद'-भाषा देखी-सुनी है तो कम से कम आज 'असंसदीय' हो जाइए आज किसी को माँ-बहन की गालियाँ मत सुनाइए... भारत-माता के श्रीमान पुरुषों! शंका-संदेह के किसी बियावान से अगर आपके मन में आज तलाक-तलाक की कोई धुन सुनाई पड़ रही हो  तो अपना छप्पन इंच का सीना पाकिस्तान में कूदकर बढ़ाइए जाइए सैनिकों और असैनिकों की  विधवाओं का दुःख-दर्द बँटाइए... और भारत-माता की हे महिलाओं! तुमसे भी एक विनती है श्रृंगार के अपने...

क्या मिलिये ऐसे लोगों से....- साहिर लुधियानवी

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                      क्या मिलिये ऐसे लोगों से.... 👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏 क्या मिलिये ऐसे लोगों से, जिनकी फ़ितरत छुपी रहे नकली चेहरा सामने आए, असली सूरत छुपी रहे,  खुद से भी जो खुद को छुपायें क्या उनसे पहचान करें क्या उनके दामन से लिपटें, क्या उनका अरमान करें  जिनकी आधी नीयत उभरे, आधी नीयत छुपी रहे  नकली चेहरा सामने आए, असली सूरत छुपी रहे  दिलदारी का ढोंग रचाकर जाल बिछायें बातों का जीते जी का रिश्ता कहकर सुख ढूँढें कुछ रातों का रूह की हसरत लब पर आये, जिस्म की हसरत छुपी रहे नकली चेहरा सामने आए, असली सूरत छुपी रहे जिनके जुल्म से दुखी है जनता, हर बस्ती और गाँव में दया-धरम की बात करें वो बैठ के सजी सभाओं में दान का चर्चा घर घर पहुँचे, लूट की दौलत छुपी रहे नकली चेहरा सामने आए, असली सूरत छुपी रहे देखें इन नकली चेहरों की कब तक जयजयकार चले उजले कपड़ों की तह में कब तक काला संसार चले कब तक लोगों की नजरों से छुपी हक़ीकत छुपी रहे नकली चेहरा सामने आए, असली सूरत छुपी रहे।       ...