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कार्ल मार्क्स, मार्क्सवाद और उनके विरोधी

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            कार्ल मार्क्स, मार्क्सवाद और उनके विरोधी                                          हम देख रहे हैं कि आज पूरी दुनिया का शासकवर्ग आज या तो मार्क्सवाद को एक फेल विचारधारा मानता है या मार्क्सवाद की अपनी पूंजीवादी व्याख्या को सही मानता है। यहाँ तक कि तथाकथित 'समाजवादी' सरकारों द्वारा भी अपने 'सुधार' कार्यक्रमों और तत्सम्बन्धी नीतियों को इस तरह निर्मित किया जा रहा है कि वह जनता को देखने में तो समाजवादी लगे किन्तु वास्तविक रूप में पूँजीवादी ढर्रे पर ही चले। जब मार्क्सवादी समाजवाद के अकाट्य तर्कों को व्यवस्थाएं खण्डित न कर सकीं और जनता का इस विचारधारा पर विश्वास दृढ़तर होता गया तो शासकों ने यह छद्मनीति अपनाकर जनता को भ्रमित कर मार्क्सवाद से दूर करने का प्रयास किया। यह प्रयास आज और तेज हो गया है। लेकिन जैसे-जैसे पूँजीवादी विचारधारा का संकट बढ़ता जा रहा है और उसका साम्राज्यवादी स्वरूप भी इस संकट को हल करने में बुरी तरह विफल हो रहा है, वैसे-वै...

चीनी #कोरोना_वायरस

         ⚫ चीनी #कोरोना_वायरस पर एक देसी विचार ⚫ 🔴 चीनी कोरोना से डरना बेकार है ! कोरोना तो वैसे ही पिलपिला है ! ठंडे देश से आया ठंडा वायरस ! एकाध हफ़्ता और रुक जाइये ! ग़ुस्सैल सूरज महाराज चढ बैठेंगे इस पर ! चीं निकल जायेगी इसकी ! वैसे भी कोरोना में दम नहीं कि वो हिंदुस्तानियों को मार सके ! हमने ये ज़िम्मेदारी टीबी और मलेरिया को सौंप रखी है ! टीबी और मलेरिया के होते हम किसी विदेशी वायरस से मर जाये ये स्वदेशी की भावना के ख़िलाफ़ है ! टीबी- मलेरिया की दवा ढूँढ़ी जा चुकी और कभी- कभार सरकारी अस्पतालों में मिल भी जाती हैं ! आदमी पूरा कोर्स कर लें तो ठीक भी हो जाता है, इसके बावजूद जब हम ठान लें और हमारे डॉक्टर हमारा मरना तय कर ही दें तो हम बतौर बहाना इन्हीं बीमारियों को चुनते है !  हर साल मलेरिया से दो लाख हिंदुस्तानियों का राम-नाम-सत्य होता है तो साढ़े चार लाख मरने के लिये टीबी को चुनते है ! ये भले लोग इस देश से इन बीमारियों के देशी वायरस से इतना प्यार करते हैं कि बिना हल्ला-गुल्ला किये चुपचाप मर जाते हैं ! देश पर मरने वाले इन जवानों की कहीं कोई चर्च...

हम देश, ये हमरा देश!

                                        धत्तेरे की...                                                   - देसीराम धत्तेरे की पाकिस्तानी निखट्टुओं, तुम्हारा बेड़ा गर्क तो हो ही रहा है और क्या होगा!... मगर ये बताओ, अगर तुम्हारा ये पाकिस्तान नहीं बना होता और हमारा भारत महान आर्यावर्त बना रहता तब तुम्हारा क्या होता?...तुम लोग मूली छीलते कि आलू?... इसीलिए कहे देते हैं कि पाकिस्तान-पाकिस्तान कहकर राजनीति मत करो वरना जनता तुम्हें सचमुच चौराहों पर खड़ा करने लगेगी!..सारा रंग-रोगन भूल जाओगे!! पाकिस्तान न हुआ गंगूबाई का मोहल्ला हो गया जहाँ तुम छिप-छिपकर कुकरम करने जाते हो!... अरे मंगरू की औलाद, क्या कभी हैदराबादी बिरियानी भी खाई है?...चख के देख, तेरा पाकिस्तान ट्रम्पवा के घर पानी माँगने न दौड़े तो कहना!... और सुन, तेरा पाकिस्तनवा तो चुल्लू भर पानी में डूबेगा ही, तु...

केंद्रीय बज़ट में खेती और किसान

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                        केंद्रीय बज़ट में खेती और किसा :           कॉरपोरेट खेती को बढ़ावा, देसी किसानी से छलावा                   - अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति                                             (एआईकेएससीसी)                         बजट ग्रामीण मांग व क्रय क्षमता को प्रोत्साहित नहीं करता जिससे कुल अर्थव्यवस्था सुधर सकती थी! एआईकेएससीसी ने कहा कि बजट ग्रामीण मांग व क्रय क्षमता को प्रोत्साहित नहीं करती जिससे कुल अर्थव्यवस्था सुधर सकती थी। यह कारपोरेट मुनाफे को बढ़ावा देती है।                                               बजट 2020 के प्रस्ताव विदेश...

केंद्रीय बज़ट में शिक्षा

                          #केंद्रीय_बज़ट में #शिक्षा                                              - डॉ.रमेश बैरवा                                               प्रांतीय संयुक्तसचिव                                               (RUCTA), राजस्थान         *केंद्रीय बजट 2020-21 में शिक्षा की भी की गई है घोर उपेक्षा *शिक्षा के व्यावसायीकरण को बढ़ावा देना जनविरोधी कदम  *इस बजट का विरोध करने की शिक्षक साथियों से है पुरजोर अपील मोदी सरकार का  बजट 2020-21 घोर जन विरोधी है। इस बजट में शिक्षा की भी घोर उपेक्षा की गई है,जिस पर शिक्षक समुदाय भी कड़ा विरोध...

इंटरनेट और हमारे सामाजिक रिश्ते

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                                                      इंटरनेट का दौर और  समाज के रिश्ते                                               साभार- AAAO एक बार मैं अपने अंकल के साथ एक बैंक में गया, क्यूँकि उन्हें कुछ पैसा कही ट्रान्सफ़र करना था। ये स्टेट बैंक एक छोटे से क़स्बे के छोटे से इलाक़े में था। वहां एक घंटे बिताने के बाद जब हम वहां से निकले तो उन्हें पूछने से मैं अपने आप को रोक नहीं पाया। अंकल क्यूँ ना हम घर पर ही इंटर्नेट बैंकिंग चालू कर ले? अंकल ने कहा ऐसा मैं क्यूँ करूँ ? तो मैंने कहा कि अब छोटे छोटे ट्रान्सफ़र के लिए बैंक आने की और एक घंटा टाइम ख़राब करने की ज़रूरत नहीं, और आप जब चाहे तब घर बैठे अपनी ऑनलाइन शॉपिंग भी कर सकते हैं। हर चीज़ बहुत आसान हो जाएगी। मैं बहुत उत्सुक था उन्हें नेट बैंकिंग की दुनिया के बारे मे...

हमसब #रोहिंग्या: नागरिकता कानून से हासिल क्या हुआ?

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                नागरिकता कानून से हासिल क्या हुआ ?                                                           - गुरचरन सिंह अगर सरकार की मंशा वही है जो मीडिया बता रहा है, तो क्यों हो रहा है पूरे देश में उसका विरोध ? क्यों एक खास तबका ही इसके पक्ष में खड़ा दिखाई दे रहा है ? लेकिन जवाब देने की परंपरा तो संघ-भाजपा में कभी रही ही नहीं ! बस सवाल पूछना आता है, आरोप मढ़ना आता है, मेरी कमीज़ तुम्हारी कमीज़ से उजली है, ऐसा कह कर और अधिक गलत काम करने का नैतिक आधार पाना ही आता है !...  News State के मुताबिक भारत ही नहीं, विदेशों में रह रहे भारतीय भी अब इस कानून के खिलाफ सड़क पर उतर आए हैं। जर्मनी के एक छात्र को यह विरोध महंगा पड़ गया जब  आईआईटी मद्रास के छात्रों के साथ वह भी इसके खिलाफ आ गया था। जैकब लिडेंथल नामक मद्रास आईआईटी में भौतिक विज्ञान के छात्र को पढ़ाई पूरी होने से पहले ही जर्मनी भेज ...