Mee-Too मसला:- गुरचरन सिंह



              #MeToo_ का मसाला और मीडिया का नशा

                                                          -गुरचरन सिंह

          क्या सोशल मीडिया और क्या टुकड़खोर 'गैर सोशल मीडिया' सब जगह इसी का जादू सर चढ़ कर बोलने लगा है ! देश की सबसे बड़ी समस्या बन गई है यह जिस पर बहस चलना जीने मरने के सवाल जैसा लगने लगा है। महंगाई, गरीबी, सामाजिक और आर्थिक गैर-बराबरी, बेरोजगारी कहीं हैं नहीं ! लगता है जैसे अच्छे दिन आ ही गए आखिरकार! गुजरे जमाने की सिने तारिकाएं और महिला पत्रकार तो खुल कर आ गई हैं मैंदान में और इस #मीडिया_ट्रायल की आंच कई नामी गिरामी लोगों तक पहुंचने लगी है। और इसी के साथ आमने सामने हैं  औरतों की सस्ती सहानुभूति बटोरने वाले समर्थक और राजनीतिक झंझावात में भी अपना फोकस बनाए रखने की कोशिश करते लोग ! इसलिए मेरी प्रार्थना है कि इसे महिलाओं के प्रति मेरा असम्मान न समझा जाए भले ही वे अभिजात्य वर्ग की ही क्यों न हों !

दरअसल मेरी चिंता की वजह इसमें छिपा मेरा डर है कि ऐसे खाते पीते घरों की पढ़ी लिखी महिलाओं के साथ यदि ऐसा हो सकता है तो सोचिए जरा देहात की औरतों के साथ क्या नहीं होता होगा !! स्मार्टफोन, इंटरनेट, metoo तो वे तब जान पाएं जब उन्हें चूल्हे-चौके, खेत- खलियान के बीच खटने और चक्करघिन्नी बनी रहने से फुरसत मिले !! 

चलिए कुछ तस्वीरें दिखाता हूं मैं आपको इस देहाती #metoo की। बैठ जाइए जरा दिल थाम कर ! मदर इंडिया फिल्म की तो याद होगी ही न ! अरे वही कर्ज में डूबी एक जवान विधवा किसान और उसके दो बच्चों की कहानी, सूदखोर लाला सुखिया का उस पर लाइन मारना, उसीकी खुली लूट से तंग आ कर छोटे बेटे का डाकू बन जाना और उसी लाला की बिटिया की लाज बचाने के लिए उसी बेटे पर गोली चलाना , बरसों तक झझकोरती रही है यह फिल्म जनमानस को ! ऐसी ही कुछ तस्वीरें हैं ये !

तस्वीर एक:

पति परदेश गया है कमाने क्योंकि दो ही बीघा तो कुल जोत है, और कोई काम धंधा है नहीं, सास ससुर बीमार रहते  हैं, बनिए की उधारी और कर्जा बढ़ता ही जा रहा है सुरसा के मुंह की तरह। लाला बार बार कहता है या तो सूद समेत पैसा चुका दो या फिर रात को चली आओ यहां ! क्यों जवानी यूं ही गवां रही हो। पति परदेश में है तो तेरा मन भी तो करता ही होगा ?#metoo 

तस्वीर दो :

घर का खर्च चलाने के जिमीदार के खेत में रोपाई, निराई ,कटाई जैसे कई काम करने पड़ते हैें भूमिहीन किसानों की बहू- बेटियों को, आधाई पर पालने के वास्ते लिए गए पशुओं का चारा लेने भी तो वहीं जाना पड़ता है! कभी जिमीदार का भाई तो कभी बेटा कुछ देने के बहाने ट्यूबवेल के साथ बने कमरे में बुला लेता है और ... #metoo

तस्वीर तीन :

गांव के किराने की दूकान। एक ही दुकान,वह भी बेइमान लेकिन जाना तो फिर भी वहीं है जजमान ! सब की उधारी का खाता खुला रहता है वहां पर खासकर गरीब शोषित वर्ग के घरों का ! अक्सर ये उधारी चुका नहीं पाते वो, ब्याज पर ब्याज चढ़ता चला जाता है और उसी अनुपात में बढ़ता जाता है उसका तकाजा ! दिलफैंक  दुकानदार इसके बदले में जवान बहू से फेवर मांगता है, न कहते ही उधारी खाता बंद कर पुराना हिसाब पेश कर देता है ! #metoo

तस्वीर चार:

पति महीनों से खटिया पर पड़ा है, या बीबी के चांदी के एक दो गहने अथवा घर के बर्तन बेच कर दारू पी कर इधर उधर लोटता रहता है । बच्चे भूखे हैं, दे सकने वाले जिस किसी के पास भी उधार मांगने जाती है, वहां इंकार तो कोई नहीं करता ,जितना चाहिए ले लो पर आज की रात.. ! #metoo

तस्वीर पांच:

कितने ही ग्रामीण इलाके हैं जहां सरकार मनरेगा जैसे कार्यक्रम चलाती है और ठेकेदार ईंट भट्ठा, सड़क और दूसरे निर्माण कार्य चलाते हैं जिनमें काफी महिला मजदूर काम करती हैं। इनमें से कौन सी जगह है जहां पर यौन उत्पीड़न, यौन-शोषण, बलात्कार नहीं होता ! नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो (इंडिया) के मुताबिक साल 2016 में दर्ज़ 38882 बलात्कार के मामलों में से मात्र 5.6% मामले फ़र्ज़ी थे! मतलब 100 में से अधिकतम 6 मामले!   इससे भी बड़ा सच यह भी है कि 80-90% मामले दर्ज़ ही नहीं होते!#metoo

ऐसी कितनी ही और तस्वीरें दिखा सकता हूं देहाती महिलाओं की जो #metoo वाली खाई अघाई 'बेचारी, और मासूम' महिलाओं की तो हो ही नहीं सकती! इनके लिए न सोशल मीडिया है और न ही 'गैरसोशल' मीडिया और न किसी #metoo का प्लेटफार्म जहां वे बता सकें कैसे उन्हें गांव के प्रधान, लेखपाल, साहूकार, जमींदार ईंट-भट्ठा मालिक, ठेकेदारों लूटा है, यौन हिंसा की है !

शहरों के अभिजात्य और उच्च मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी समस्या है ऊब, जिंदगी में थ्रिल का अभाव ! यही उसे कभी रेव पार्टियों की ओर धकेलता है तो कभी सनसनीखेज मुद्दे उछालने के लिए प्रेरित करता है। यही कारण है कि इससे कहीं बुरी स्थितियों से रोजाना गुजरने वाली देहात की औरतें ऐसे मुद्दों से नहीं जुड़ पातीं। वहां के कठोर जीवन में तो तुरंत फैसला हो जाता है, इधर या उधर। बरसों बाद छाती का बोझ हल्का नहीं किया जाता।  हिसाब किताब बराबर नहीं हुआ तो फिर उसे भुला दिया जाता है बुरे सपने की तरह ! गांव के कठिन जीवन में ऐसे 'जरूरी' मुद्दों के लिए समय ही कहां है ? जबकि शहरों में  समय कैसे कटे, बहुत बड़ी समस्या है। #me_too जैसे मुद्दे उसे आराम से एक दो महीने कट जाने का बहाना दे देते हैं। 


हमें तो लगता है कि ये सब प्रयोजित मुद्दे हैं क्योंकि इन्हें उठाने के पीछे मीडिया की असल मंशा ही संदेह के घेरे में है। चुनावी साल में उपलब्धियों कै नाम पर सरकार के पास दिखाने के लिए कुछ है ही नहीं। इसीलिए शायद सरकार का सहयोग करके वे पेट के असली मुद्दों से फोकस हटाना चाहते हैं !  ★★★



     

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