आत्मलाप-12: 'मी-टू'...
'मी-टू' के लिए...
-अशोक प्रकाश
बलात्कार के पहले
अब
जरूरी कर दिया गया है
हासिल करना
प्रेम-प्रमाणपत्र
यौन-हिंसा के लिए
गढ़ लिए गये हैं
यौन-सहयोग के नए व्याकरण
ताकि
अनारो और चमेली
कभी भी
चमकती आंखों से न देखें
बसंत के सपने
जानें न पाएं हाथ से
उनके
जो हर फूल की खुशबू का हकदार
सिर्फ़ स्वयं को मानते हैं!
लिखा ली गई हैं
चार-पांच चिट्ठियां...
बिखेर दिए गये हैं
शरद ऋतु के कुछ पुष्प
कापियों पर...
विद्यालयों में
पढ़ा दिए गये हैं
नायिका-भेद और नखशिख-वर्णन
यौन-शिक्षा के बहाने...
ताकि
गले से निकली हर चीख
हृदय का हर रक्त-प्रवाह
सिद्ध किया जा सके
किसी प्रेमोन्माद का अतिरेक
किसी ऊढ़ा नायिका का रतिराग !
हे बचाई और पढ़ाई जाने वाली बेटियों,
'मी-टू' के लिए ही तो
तुम्हें तैयार किया गया है...
सहो और चुप रहो
देखो,
स्तन और जांघें नहीं काटी गई हैं तुम्हारी
आदिवासी स्त्रियों की तरह
किसी बियावान खोह या
काले नाले में नहीं दफ़ना दी गई हो
जीते जी!...
चलो
सुनो
जीती रहो जैसे भी...
जनतंत्र के जनपथ पर
मोमबत्तियां जला
आत्मा को बचाने के प्रयास के पहले
आत्महत्या करने या मारी जाने से पहले...
सोच सको तो सोचो
क्या कुछ और नहीं किया जा सकता?
जैसे कि
ऐसी दुनिया ही ध्वस्त कर दी जाय
और
बना ली जाय अपने लिए
कोई और
नई दुनिया! ★★★
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