आत्मलाप-13: 'हे राम! हाय राम!!...'


                               हे राम! हाय राम!!...

                                                   - अशोक प्रकाश





हे राम!
महत्त्वपूर्ण यह नहीं कि
तुम कब थे?
या
तुम नहीं थे!

महत्त्वपूर्ण यह है कि
तुम हो...
कहाँ हो?
'रामायण' में,
'उत्तर राम चरितं' में,
कबीर की साखियों और पदों में,
'राम चरित मानस' में,
'कम्बन रामायण' में,
'रामचंद्रिका' में,
'मेघनाथ वध काव्य' में,
रवींद्र के 'काब्बेर उपेक्षिता' में,
महावीर प्रसाद द्विवेदी के-
'कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता' में,
मैथिली शरण गुप्त के 'साकेत' में,
निराला की-
'राम की शक्तिपूजा' और 'तुलसीदास' में,
ललई यादव की 'सच्ची रामायण' में,
नरेन्द्र कोहली की 'रामकथा' में,
भगवान सिंह के 'अपने-अपने राम' में,
रामानन्द सागर के 'रामायण' में,
चंदन एन सिंह लिखित-
जी-टीवी के 'रावण' में,
मणिरत्नम की फ़िल्म 'रावण' में...

हे राम!...
तुम कहाँ-कहाँ हो?...
कैसे-कैसे हो?...


तुम हो तो
रावण है
रावण है तो
युद्ध है
युद्ध है तो
विभीषण है
विभीषण है तो
रॉफेल है
रॉफेल है तो
दल्ले हैं
दल्ले हैं तो
राम-रावण का युद्ध
चलते ही रहना है
इस देश की जनता को
युद्ध सहना ही है!...




न जाने कितने लोग
दिहाड़ी न पाने पर भी
आज 'राम' बनेंगे
'रावण' बनेंगे
गाएंगे-चिल्लाएंगे
बच्चे शोर मचाएंगे
आनंद मनाएंगे...


राम, तुम क्या थे?
क्या न थे??
किन्तु राम,
तुम वो तो नहीं हो,
जो तुम आज हो!
मंदिर के मलवे में शयन
मस्ज़िद के ढेर में दफ़न...
हे राम! हाय राम!!   
★★★



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