आत्मालाप-17: भाग्य से न कुछ मिले...


                                   एक कुपद

                                           -अशोक प्रकाश

भाग्य क्या है? -तुम न जानो,
जो भरे हो भूतभ्रम मन में, उसे ही भाग्य मानो।

देखकर भी देखते बिल्कुल नहीं तुम,
श्रमिक का श्रम है किसी से तो नहीं कम
कितना श्रम हैं कर रहे आकाश वाले
महल की ऊंचाइयां हैं लूट का श्रम
फायदा है न इसी में? बैठो संग में बूटी छानो।

अज्ञान का किस्सा सुना था एक जो
आकाश की उम्मीद झूठी ही थी वो
श्रम का अपना फल भी थे पाये नहीं तो
इक भरोसे पर लो जीवन पार कर लो
तो चलो आश्वासनों की एक लंबी चादर तानो।

माना श्रम से ही बने सुंदर किले
बोलो इनमें किसके थे तो दिन खिले
राजा-नवाबों के ही इनमें दिल मिले
मांगी गर मजदूरी तेरे मुंह सिले
भाग्य से न कुछ मिले इसलिए संघर्ष ठानो।

                      ★★■★★

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