करतार सिंह सराभा शहादत-दिवस

शहादत दिवस:


                   अंग्रेजी राज के लिए सबसे बड़ा खतरा': 
                        क्रांतिकारी करतार सिंह सराभा

                                                 प्रस्तुति: सुनील सिंह

“हे भगवान मेरी यह प्रार्थना है कि मैं भारत में उस समय तक जन्म लेता रहूँ, जब तक कि मेरा देश स्वतंत्र न हो जाये!”...

फाँसी पर चढ़ने से पहले ये शब्द थे 19 साल के उस भारतीय क्रांतिकारी नौजवान के -जिसे ब्रिटिश मानते थे ‘अंग्रेजी राज के लिए सबसे बड़ा खतरा’. मुकदमे के दौरान ब्रिटिश जज के आरोपों के जवाब में करतार सिंह ने पंजाबी में कहा था,

“सेवा देश दी जिंदड़िये बड़ी औखी

गल्लां करनियां ढेर सुखल्लियाँ ने

जिन्हें देश सेवा विच पाइर पाया

ओहना लाख मुसीबतां झल्लियां ने”.

सिर्फ 19 साल की उम्र में देश के लिए फांसी के फंदे पर झूल जाने वाले इस सपूत को उसके शौर्य, साहस, त्याग एवं बलिदान के लिए हमेशा याद किया जाता रहेगा.

24 मई, 1896 को  एक संपन्न पंजाबी परिवार मेंकरतार सिंह का जन्म हुआ था.पंजाब के लुधियाना जिले के सराभा गाँव के रहने वाले थे. बचपन में ही पिता का साया
उठ जाने के बाद उनके दादा बदन सिंह ने उनका तथा छोटी बहन का लालन-पालन किया.सराभा ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा लुधियाना में ही प्राप्त की थी.

1912 में ऊंची पढ़ाई क् लिए अमेरिका गए.अमेरिका की धरती पर कदम रखते ही उन्हें गुलामी का अहसासहोने लगा.दरअसल, जब जहाज से वे अमेरिका की सरजमीं पर उतरे तो उन्हें वहां अधिकारीयों ने रोक लिया.उनसे काफी पूछताछ हुई और उसके बाद उनके सामान आदि की तलाशी हुई.करतार यह देखकर हैरान थे, क्योंकि बाकी यात्रियों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं हुआ था.जब उन्होंने इसका कारण पूछा तो जबाव मिला, ‘तुम भारत से आये हो जो एक गुलाम देश है!’इस एक वाकये ने अमेरिका में पढ़ने आए करतार सिंह की सोच को, जिंदगी की दिशा को और जीने के उद्देश्य को पूरी तरह से बदल दिया.दाखिला लेने के बाद वो बाकी भारतियों से गुलामी से मुक्ति और अमेरिका में रहकर देश के लिए कुछ करने की बातें करने लगें.

करतार का सम्पर्क लाला हरदयाल से हुआ, जो अमेरिका में रहते हुए भी भारत की स्वतंत्रता के लिए प्रयत्नशील थे.करतार हमेशा उनके साथ रहते थे.लाला हरदयाल और भाई परमानंद ने भारतीय विद्यार्थियों के दिलों में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह पैदा करने में बड़ी भूमिका निभाई.1857 की तरह की क्रांति एक फिर दोहराकर देश को आज़ाद करने के लिएसाल 1913 में ‘ग़दर पार्टी’ की स्थापना की गयी .

साल 1914 में जब ‘प्रथम विश्व युद्ध’ प्रारम्भ हुआ, तो अंग्रेज़ युद्ध में बुरी तरह फँस गये.ऐसी स्थिति में ‘ग़दर पार्टी’ के कार्यकर्ताओं ने सोचा और योजना बनाई कि यदि इस समय भारत में विद्रोह हो जाये, तो भारत को आज़ादी मिल सकती है.करतार और अन्य क्रांतिकारियों के प्रभाव में लगभग 4000 लोग भारत के लिए निकल पड़े.अंग्रेजी सरकार को यह पता चल गया और सभी बंदी
बना लिए गए.हालांकि, करतार अपने कुछ साथियों के साथ बच गए.वे गुप्त रूप से पंजाब पहुंचकर लोगों को जागरूक करना शुरू कर दिया.उन्होंने सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, रासबिहारी बोस, शचीन्द्रनाथ सान्याल आदि क्रांति कारियों से भेंट की.इन लोगों ने अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध क्रांति छेड़ने के लिए प्रभावित किया.योजना के अनुसार 21 फ़रवरी, 1915 ई. का दिन समस्त भारत में क्रांति के लिए निश्चित किया गया था. पर ब्रिटिश सरकार को पहले ही इसका पता चल गया.पुलिस का एक गुप्तचर के द्वारा जैसे ही 21फरवरी की योजना के बारे में पता लगा वैसे ही 16 फरवरी सेचारों ओर जोरों से गिरफ्तारियाँ होने लगीं.

रासबिहारी बोस किसी प्रकार लाहौर से वाराणसी होते हुए कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) चले गये और वहाँ से फर्जी नाम से पासपोर्ट बनवाकर जापान चले गये.उन्होंने करतार को भी अफगानिस्तान जाने की सलाह दी पर करतार नहीं गये.लायलपुर की चक नंबर 5 में उन्होंने विद्रोह करवाने की कोशिश की और गिरफ्तार हो गए. वो चाहते तो बाकी नेताओं की तरह निकल सकते थे, लेकिन इससे गदर का नाम बदनाम होता और वो ये नहीं चाहते थे.

करतार सिंह सराभा पर हत्या, डाका, शासन को उलटने का आरोप लगाकर ‘लाहौर षड़यन्त्र’ के नाम से मुकदमा चलाया गया.उनके साथ 63 दूसरे क्रांतिकारियों पर भी मुकदमा चलाया गया था.16 नवंबर 1915 को करतार को फाँसी हुई.

भगत सिंह करतार को अपना गुरु मानते थे. वे करतार की तस्वीर हमेशा अपनी जेब में रखते थे. ‘नौजवान भारत सभा’ नामक युवा संगठन की हर जनसभा में करतार के चित्र को मंच पर रख कर उसे पुष्पांजलि दी जाती थी.
करतार की लिखी हुई जो एक ग़ज़ल भगत सिंह को बहुत प्रिय थी--
“यहीं पाओगे महशर में जबां मेरी बयाँ मेरा,
मैं बन्दा हिन्द वालों का हूँ है हिन्दोस्तां मेरा;
मैं हिन्दी ठेठ हिन्दी जात हिन्दी नाम हिन्दी है,
यही मजहब यही फिरका यही है खानदां मेरा;
मैं इस उजड़े हुए भारत का यक मामूली जर्रा हूँ,
यही बस इक पता मेरा यही नामो-निशाँ मेरा;
मैं उठते-बैठते तेरे कदम लूँ चूम ऐ भारत!
कहाँ किस्मत मेरी ऐसी नसीबा ये कहाँ मेरा;
तेरी खिदमत में अय भारत! ये सर जाये ये जाँ जाये,
तो समझूँगा कि मरना है हयाते-जादवां मेरा.”

साभार- फेसबुक (सुनील सिंह)
★★★

Comments

Popular posts from this blog

हम देश, हमारा देश- 1: ऐ बनारसी विकास

नियमकाल में बुलडोजर के नियम

Stephen Hawking: The man of a different human strength