ये किसका घर तोड़ा है तूने?...


                           ये किसका घर तोड़ा है तूने?
                पानी बिन जाता जनवा तूरि ले मकनवा...


          अधिकारियों से अनेक बार अनुनय-विनय करने के बावज़ूद भोजपुरी के लोककवि विनोद मित्रा का घर तोड़ दिया गया!... जब घर तोड़ा जा रहा था विनोद मित्रा बेहोश हो गए! बेहोशी हालात में उन्हें अस्पताल ले जाया गया।...लौटे तो घर की जगह घर का मलवा पड़ा था! बाल-बच्चे बेघर!...

उन्हीं मनःस्थितियों में कवि द्वारा यह मार्मिक भोजपुरी लोकगीत लिखा गया। उन्होंने अपनी आपबीती को कुछ इस तरह सुनाया! --

पानी बिन जाता जनवा तूरि ले मकनवा
धनवा लूटि ले गइले ना!
तड़पे धूप में परनवा धनवा लूटि ले गइले ना!...

दिन दुपहरिया के रतिया अंधरिया में
संझवा के सखी संग रहले कोठरिया में
चोरवा चिकरवा पे कईला विचरवा
धनवा लूटि ले गइले ना!
तड़पे धूप में परनवा धनवा लूटि ले गइले ना!...

सेठ साहूकार मिलि गांव के जमीदरवा हो
धरती माता पे कइले बाटे अधिकरवा हो
हमके देखावे आपन कोट जेलखनवा
धनवा लूटि ले गइले ना!
तड़पे धूप में परनवा धनवा लूटि ले गइले ना!...

योजना बनावे मिलि गांव के परधनवा हो
गुंडन के संग में लेके बनेला महनवा हो
हमरा के देवे धमकी मारे खातिर जनवा
धनवा लूटि ले गइले ना!
तड़पे धूप में परनवा जनवा मारि ले गइले ना!...

कहत बिनोद गाई दुखवा बिपतिया हो
खुनवा पसीनवा बहाई दिन रतिया हो
जब ले न लाल होई खेत खलिहनवा
धनवा लूटि ले गइले ना!
तड़पे धूप में परनवा धनवा लूटि ले गइले ना!..


भावानुवाद~

पानी बिना ऐसे लगता है जैसे जान चली जाएगी, और ऐसी हालात में वे मेरा घर तोड़कर चले गए-
मेरी धन-सम्पत्ति लूट ले गए!
मेरे प्राण भारी धूप में तड़प रहे हैं,
वे मेरी धन-सम्पत्ति, मेरा घर लूट ले गए!...

दिन में, दुपहरिया में, रात के अंधकार में,
अभी सांझ को सखी (पत्नी) के साथ वहीं कोठरी में हम रहते थे, चोरों धोखेबाजों पर हम वहीं सोच-विचार कर रहे थे, पर वे-
मेरी धन-सम्पत्ति लूट ले गए!
मेरे प्राण भारी धूप में तड़प रहे हैं,
वे मेरी धन-सम्पत्ति, मेरा घर लूट ले गए!...

सेठों-साहूकारों से मिलकर गांव के जमींदार ने हमारी धरती माता पर कब्ज़ा कर लिया है... और अब वह हमें अपने कोर्ट और जेलखाने का भय दिखा रहा है!...वे-
मेरी धन-सम्पत्ति लूट ले गए!
मेरे प्राण भारी धूप में तड़प रहे हैं,
वे मेरी धन-सम्पत्ति, मेरा घर लूट ले गए!...

गांव का प्रधान उनसे मिलकर योजना बनाता है, गुंडों को साथ रखता है और उल्टे महान बनता है,
वह हमें जान से मार डालने की धमकी देता है!...वे सब-
मेरी धन-सम्पत्ति लूट ले गए!
मेरे प्राण भारी धूप में तड़प रहे हैं,
वे मेरी धन-सम्पत्ति, मेरा घर लूट ले गए!...

विनोद अपनी दुख-विपत्ति को गा-गाकर कह रहा है कि वह
दिन-रात अपना खून-पसीना बहाकर काम करता है!...(और उसकी यह हालत है),
लगता है कि जब तक खेत-खलिहान लाल नहीं हो जाएंगे, तब तक उसकी हालत ऐसी ही रहेगी! वे-
मेरी धन-सम्पत्ति लूट ले गए!
मेरे प्राण भारी धूप में तड़प रहे हैं, वे मेरी धन-सम्पत्ति, मेरा घर लूट ले गए!...

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