क्रांतिवीर संगोल्ली रायण्ण: जानिए इस योद्धा को


                        क्रांतिवीर संगोल्ली रायण्ण: 
                             जानिए इस योद्धा को

 

क्या आप क्रांतिवीर संगोल्ली रायण्ण से परिचित हैं?...
शायद नहीं!...लेकिन अगर आप भारत देश के निवासी हैं और राष्ट्रीय भावना को सचमुच महत्त्व भी देते हैं तो आपके लिए क्रांतिवीर संगोल्ली रायण्ण के बारे में जानना बेहद जरूरी है!...

दरअसल 3 फरवरी, २०१६ को साउथ सेन्ट्रल रेलवे के सिकंदराबाद पब्लिक रिलेशन ऑफिस से एक नोटिफिकेशन जारी किया गया जिसके अनुसार तब तक के बेंगलुरु सिटी रेलवे स्टेशन का नाम बदल कर क्रांतिवीर संगोल्ली रायण्ण रख दिया गया. कर्नाटक के लोगों के लिए तो यह इस मिटटी के एक सपूत को याद करना भर था किन्तु बेंगलुरु रेलवे स्टेशन सुनने-जानने के आदी देश-दुनिया के अन्य लोगों के लिए यह चौंकाने वाला था!...

              कौन हैं ये क्रांतिवीर संगोल्ली रायण्ण ?...
दक्षिण भारत का पांचवां सबसे व्यस्ततम रेलवे स्टेशन है बेंगलुरु! यहाँ से प्रतिदिन लगभग 2 लाख 50 हज़ार रेलयात्री यात्रा करते हैं. १० प्लेटफार्म वाले दक्षिण भारत के इस अत्यंत महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन का नाम क्रांतिवीर संगोल्ली रायण्ण उस क्रन्तिकारी विरासत से लोगों को जोड़ने या कहें उसे याद रखने के लिए रखा गया है. ..
            
           क्रांतिवीर संगोल्ली रायण्ण उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के वह नायक थे जिन्होंने केवल ३२ साल की उम्र में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी की फौज से संघर्ष करते हुए वीरगति पाई. उनका जन्म १५ अगस्त, १७९८ को बेलगाम रियासत के संगोल्ली नामक गाँव में हुआ था. बड़े होकर वे  किट्टूर राज्य की रानी चेन्नम्मा की फौज में शामिल हो उसके सेना-प्रमुख बने. सन् १८२४ में अंग्रेजों की राज्य हड़पो नीति के खिलाफ रानी चेन्नम्मा के नेतृत्त्व में विद्रोह हुआ. यह विद्रोह लम्बे समय तक चला और अंग्रेजों की अपेक्षाकृत ज़्यादा सुसज्जित फौज से लोहा लेने के लिए क्रांतिवीर संगोल्ली रायण्ण ने गाँव-गाँव घूम जनता के बीच से गुरिल्ला छापामार सेना बनाई थी. वे और उनके छापामार दस्ते एक स्थान से दूसरा स्थान बदल-बदल कर कम्पनी की संपत्तियों  पर एकाएक हमले कर उसे तहस-नहस करते तथा उसके खजानों पर अधिकार जमाते. उन्होंने जमींदारों पर कर लगाकर जनता की सेना के सहारे अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध चलाया. सीधे तौर पर उन्हें पकड़ पाने में असफल रहने पर अंग्रेजों ने गुप्त रूप से अप्रैल १८३० में उन्हें पकड़ा और कथित अभियोग चलाकर २६ जनवरी, १८३१ को फांसी पर चढ़ा दिया.

... तो अब आप जब भी बेंगलुरु जाइए या उस रास्ते से गुज़रिये तो क्रांतिवीर संगोल्ली रायण्ण को सलाम जरूर पेश करिए ! और उन्हें क्रांतिकारी अभिवादन करते समय यह भी जरूर जानने –समझने की कोशिश कीजिये कि किसी गुलामी से आखिर कैसे लड़ा जाता है!...
                                 
                                      ★★★

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