चटपटा सिनेमा नहीं है साहित्य
चटपटा सिनेमा नहीं हो सकता साहित्य
- डॉ. मिश्कात आब्दी
https://youtu.be/3sGCKR92fw8
चटपटा सिनेमा नहीं हो सकता साहित्य!...उसकी मर्यादाएं अलग हैं. वह जीवन की सर्वांगीण व्याख्या का प्रयास है जबकि सिनेमा का मुख्य काम है- मनोरंजन!...यद्यपि यह सच है कि सिनेमा ज़्यादा जीवंत, ज़्यादा मुखर होता है पर साहित्य की संवेदना और विचार-प्रवणता कहीं ज़्यादा प्रभावशाली और दीर्घकालिक होती है! वह हमारे जीवन का हिस्सा बन जाता है. जबकि सिनेमा का प्रभाव अपेक्षतया अल्पकालिक होता है.
https://youtu.be/bAgVDqchaXs
- डॉ. मिश्कात आब्दी टीका राम कन्या महाविद्यालय, #अलीगढ़ में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं.

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