आत्मालाप-23: 'शब्दार्थ'


                                    शब्दार्थ

                                                - अशोक प्रकाश

शब्द ही नहीं ढोते हमेशा अर्थ
समय भी ढोता है
समाज और उसका इतिहास भी
ढोता और गढ़ता है शब्द के नए अर्थ!..
शब्द का ब्रह्मार्थ
गायब हो चुका है
गूढार्थ और भावार्थ के मुखौटे
उतर चुके हैं
जंगल पहाड़ और नदियां
बता रही हैं
शब्द के सच्चे अर्थ
धरती की कोख से
उग रहे हैं अभिधार्थ!...

हे अर्थवान लोगों,
तुम्हारे पास ज़्यादा नहीं है
वक़्त
शब्द को निरर्थक बनाने की
तुम्हारी कोशिश
तुम्हें ही बना देगी निरर्थक
संभल जाओ!

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