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अटेवा: सरकार की 'ना' को 'ना'!

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                      ' पुरानी पेंशन बहाली' आंदोलन:                                   बढ़ता जनाक्रोश            कोई भी सरकार अपने आदेशों के खिलाफ़ जनाक्रोश का उभार नहीं देखना चाहती!...लेकिन लोगों के बर्दाश्त की भी एक हद होती है! आप सत्ता में होते हैं तो अपने सारे वायदों, सारे भाषणों को भूलकर अपने या अपने लोगों के नफ़े-नुक़सान के हिसाब से फैसले करने लगते हैं। आपको अपना वर्गीय हित सबसे ऊपर नज़र आता है। आप यह भी भूल जाते हैं कि आपको दुबारा जनता के बीच जाना है। नहीं, आप समझते हैं कि आप जनता की इच्छाओं से नहीं अपने हितैषियों के कंधे पर चढ़कर सत्ता पाते हैं। इसीलिए आपको जनता की कोई फिक्र नहीं होती। आप ऐसा कर सकते हैं, इसलिए ऐसा करते हैं!...            पर जनता क्या करे?...वह सिर्फ आपका विरोध कर पाती है। आपको वह भी अच्छा नहीं लगता! आप नहीं चाहते कि आपको लोग बेनक़ाब करें!...पर ऐसा नहीं होता। ऐसा कभ...

अटेवा-30 अप्रैल: पुरानी पेंशन बहाली आंदोलन

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                         पुरानी पेंशन बहाली आंदोलन               पुरानी पेंशन बहाली आंदोलन का आज एक जीवंत नाम हो गया है - 'अटेवा'! अटेवा 'बुढ़ापे की लाठी' अर्थात् 'पुरानी पेंशन' की एकमात्र मांग को लेकर आज एक व्यापक आंदोलन का रूप ले चुका है। सभी सरकारी-सहायता प्राप्त शिक्षक-कर्मचारियों के अलावा लगभग हर सार्वजनिक क्षेत्र से जुड़े कर्मचारियों का इसे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन प्राप्त है। लम्बे समय से संघर्षरत और उत्तर प्रदेश के अलावा देश के अन्य राज्यों में भी जन-जागरूकता फैला चुका यह संगठन 30 अप्रैल को दिल्ली में बड़ी रैली कर रहा है। यह रैली एक तरह से केंद्र सरकार के लिए एक और चुनौती खड़ी करेगी।              एक तरफ सार्वजनिक क्षेत्र को पूरी तरह कूड़ा-कबाड़ा सिद्ध करने और बनाने में जुटीं सरकारें एक-एक कर शिक्षकों-कर्मचारियों की सारी सुविधाओं में कटौती करती जा रही है, दूसरी तरफ बढ़ते जन-दबाव एवं आक्रोश का उसे सामना करना पड़ रहा है। अटेवा में अन्य लोगों ...

ज्ञान और धर्म- 1:

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                                    धर्म, तर्क और ज्ञान                                                     - अर्पित द्विवेदी सेमटिक रिलिजन्स(यहूदी, ईसाई, इस्लाम) के धार्मिक ग्रंथों में आदम और हव्वा को प्रथम मानव कहा गया है जिनको ईश्वर ने रचना के उपरांत जन्नत के बाग़ में रखा था लेकिन शैतान द्वारा उकसाने पर उन्होंने ज्ञान के वृक्ष का फल खा लिया और उनको ज्ञान हो गया जिसके कारण ईश्वर ने उनको जन्नत से निष्कासित कर दिया। शैतान का चरित्र सेमेटिक धर्मों के ग्रंथों में एक ऐसे पात्र की तरह है जो लोगों के मन में धर्म के प्रति संदेह डालता है और उन्हें ईश्वर के बताये मार्ग से भटका देता है। क्या कभी आपने विचार किया कि इस कथा और इसके पात्रों के जरिये वास्तव में क्या सन्देश देने की कोशिश की गई है? धर्मगुरु इस बारे में कुछ भी कहते रहें लेकिन सन्देश साफ़ है- “ईश्वर मनुष्य के ज्...

कहानी: 'दुर्गा'- सत्यवीर सिंह

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                                     🔵 दुर्गा... 🔵                                                                          - सत्यवीर सिंह             रसोई से बर्तन खड़कने की आवाज़ आ रही है. आज लेकिन कुछ अलग आवाज़ क्यों आ रही है? अच्छा, बाई जैसे किसी बच्चे से बात कर रही है, बीच बीच में डांटती है , हंसती भी है. ये दुर्गा आज बच्चा किसका ले आई ? देखें ! ये क्या , दुर्गा बच्चे से बातें किये जा रही है, हंस भी रही है लेकिन आँखों से आंसू बह रहे हैं, प्लेट पर ऐसे हाथ फेर रही है मानो बच्चे के  सर पर हाथ फेर रही हो, दुलार रही हो. बोल समझ नहीं आ रहे, कैसे आएंगे, मुझे बंगला कहाँ आती है और दुर्गा को बंगला के सिवा कुछ नहीं आता , वो तो हिंदी भी बंगला में ही बोलती है. ऐसी खोई हुई है की ...

धर्म और अध्यात्म:

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                                      अधूरी चर्चा...                 वे कहते हैं-मनुष्य का विषय 'ईश्वर' नहीं है, अनीश्वर नहीं है, आस्तिकता नहीं है, नास्तिकता नहीं है क्योंकि गौतम बुद्ध ने इसके बारे में कोई चर्चा नहीं की!...आज बुद्ध के नाम पर उसी तरह पालि भाषा का शब्द 'धम्म' है, जैसे उनके समय/उससे भी पहले से पण्डित/आचार्यों का शब्द 'धर्म' था। स्वाभाविक रूप से इन पर चर्चाएं ईश्वर-अनीश्वर के साथ जुड़ती रही होंगी। दोनों के पक्ष-विपक्ष आज की ही तरह तब भी होते रहे होंगे!...अनीश्वरवादी-नास्तिकों को सजाएं और उनके 'अधर्म' का नाश हो -के फ़रमान धार्मिक राजाओं के माध्यम से ही निकलते रहे होंगे!...'कुधर्म का नाश हो' का नारा आज भी नहीं है, पर 'हर-हर महादेव' के साथ 'अधर्म का नाश हो' का नारा है। 'धम्म' का इस विषय में क्या योगदान रहा है, सम्राट अशोक से लेकर बृहद्रथ तक -इस पर चर्चा क्यों नहीं होना चाहिए? चर्चा पुष्यमित्र शुंग के धर्म पर भी होना चाहिए और उसके कृत्यों-...

लेनिन:

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                    लेनिन के जन्‍मदिवस (22 अप्रैल) पर                              बेर्टोल्‍ट ब्रेष्‍ट की कविता लेनिन की मृत्‍यु पर कैंटाटा* 1. जिस दिन लेनिन नहीं रहे कहते हैं, शव की निगरानी में तैनात एक सैनिक ने अपने साथियों को बताया: मैं यक़ीन नहीं करना चाहता था इस पर। मैं भीतर गया और उनके कान में चिल्‍लाया: 'इलिच शोषक आ रहे हैं।' वह हिले भी नहीं। तब मैं जान गया कि वो जा चुके हैं। 2. जब कोई भला आदमी जाना चाहे तो आप कैसे रोक सकते हैं उसे? उसे बताइये कि अभी क्‍यों है उसकी ज़रूरत। यही तरीक़ा है उसे रोकने का। 3. और क्‍या चीज़ रोक सकती थी भला लेनिन को जाने से? 4. सोचा उस सैनिक ने जब वो सुनेंगे, शोषक आ रहे हैं उठ पड़ेंगे वो, चाहे जितने बीमार हों शायद वो बैसाखियों पर चले आयें शायद वो इजाज़त दे दें कि उन्‍हें उठाकर ले आया जाये, लेकिन उठ ही पड़ेंगे वो और आकर सामना करेंगे शोषकों का। 5. जानता था वो सैनिक, कि लेनिन सारी उमर लड़ते रहे थ...

जंतर-मंतर:

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                  हर दिन अस्वीकार और क्षोभ का मंजर                        भारतीय सत्ता के केंद्र दिल्ली में एक स्थान है- जंतर-मंतर! वैसे तो यह जंतर-मंतर महाराजा जयसिंह द्वितीय द्वारा समरकंद के रिगिस्तान स्थित एक वास्तु को टक्कर देने के लिए 1724 ई. में बनवाया गया, किन्तु यह दिल्ली के एक अजूबे के रूप में ही ज़्यादा विख्यात रहा है। आज इस स्थान की प्रसिद्धि 'धरना-प्रदर्शन स्थल' के रूप में ही ज़्यादा है। यहाँ से राजसत्ता के प्रतीक 'संसद' की दूरी ज़्यादा न होने के कारण ऐसा मान लिया जाता है कि सत्ताधारी लोग यहाँ आई जनता के आवाज़ को सुन लेंगे, समझ लेंगे और शायद समस्याओं का समाधान भी कर देंगे! लोकतंत्र में जनता अपनी आवाज़ उठाने के सिवा और कर भी क्या कर सकती है?...इसलिए जब देश के विभिन्न भीतरी भागों में जनता की समस्याओं की सुनवाई नहीं होती तो मजबूर होकर वह लोकतंत्र के सबसे बड़े प्रतीक संसद के समक्ष अपना दुखड़ा सुनाने आती है। पिछले कुछ समय से शासकों को शासितों का यह रवैय्या ठीक नहीं लग रहा और व...