धर्म और अध्यात्म:


                                      अधूरी चर्चा...



                वे कहते हैं-मनुष्य का विषय 'ईश्वर' नहीं है, अनीश्वर नहीं है, आस्तिकता नहीं है, नास्तिकता नहीं है क्योंकि गौतम बुद्ध ने इसके बारे में कोई चर्चा नहीं की!...आज बुद्ध के नाम पर उसी तरह पालि भाषा का शब्द 'धम्म' है, जैसे उनके समय/उससे भी पहले से पण्डित/आचार्यों का शब्द 'धर्म' था। स्वाभाविक रूप से इन पर चर्चाएं ईश्वर-अनीश्वर के साथ जुड़ती रही होंगी। दोनों के पक्ष-विपक्ष आज की ही तरह तब भी होते रहे होंगे!...अनीश्वरवादी-नास्तिकों को सजाएं और उनके 'अधर्म' का नाश हो -के फ़रमान धार्मिक राजाओं के माध्यम से ही निकलते रहे होंगे!...'कुधर्म का नाश हो' का नारा आज भी नहीं है, पर 'हर-हर महादेव' के साथ 'अधर्म का नाश हो' का नारा है। 'धम्म' का इस विषय में क्या योगदान रहा है, सम्राट अशोक से लेकर बृहद्रथ तक -इस पर चर्चा क्यों नहीं होना चाहिए? चर्चा पुष्यमित्र शुंग के धर्म पर भी होना चाहिए और उसके कृत्यों-कुकृत्यों पर भी। फिर भी...

                चलिए, 'ईश्वर' पर चर्चा करना आज से छोड़ देते हैं!...'भगवान' का क्या करें?...और 'भगवान'-बुद्ध का, देवियों का, देवताओं का, हनुमानजी का, रामजी का, श्रीकृष्ण और मुहम्मद साहब का, ईशा मसीह का, फ़ादर-पंडित-मुल्ला-भंते-सन्त-साधु-अजामिल-निरंजन-निराकार-साकार... वगैरह-वगैरह का?...ये सब कहीं ईश्वर-भगवान-परमात्मा-जनता-जनार्दन-पण्डित-भंते-व्यास से जुड़ते हैं कि नहीं?...
            
            आप के-मेरे चर्चा करने-न करने से क्या होगा?...बच्चे के सामने देवी-जागरण, पूजा, नमाज़, विपश्यना, घण्टी-घंटियां और गिरजाघर का घण्टा सब चर्चा के विषय हैं!
            
           आप मत करिए ईश्वर-अनीश्वर-आस्तिक-नास्तिक पर चर्चा पर आपके घर के बाहर उससे बहुत बड़े समाज में उसे जो कुछ दिखेगा, उस पर उसे सोचना भी पड़ेगा-चर्चा भी करनी पड़ेगी!...

           किन्तु, हम ऐसे और न जाने कितने मुद्दों पर अनन्तकाल तक बहस करते रहे सकते है!...हमारे देश के शासकवर्ग और उसके आकाओं को इससे कोई परहेज भी नहीं। धर्म और संस्कृति उत्पाद हैं या उत्पादक?...अगर ये उत्पाद हैं तो इनका उत्पादन करने वाली कोई शक्ति भी है कि नहीं? देखते-देखते पिछले 20-25 वर्षों में देवी-जागरण से लेकर करवा-चौथ, उर्स और क्रिसमस-नवरोज़ के ग्रीटिंग कार्डों तक किस दृष्ट-अदृष्ट-ब्रह्म का तेज समाया हुआ है?...धर्म-ईश्वर-परमात्मा-संस्कृति के रोज़-रोज़ नए अर्थशास्त्र और उसके व्याकरण निर्मित किए जा रहे हैं और हम सोचते हैं रोटी-रोज़ी के लिए दिन-रात गली-मोहल्लों से लेकर जंगलों-रेगिस्तानों में भटकने वाले लोग इससे चिपके हुए हैं!...महत्त्वपूर्ण यह है कि आप क्या देखते हैं और क्या नहीं देखते हैं, आपके ज़ेहन में पहले क्या आता है और क्या नहीं आता है। आप क्या करना चाहते और क्या नहीं करना चाहते हैं! आप कह रहे हैं कि बदलाव लाए अन्य देशों में धर्म-ईश्वर-संस्कृति नहीं थी या जनता उनसे अलग थी!!...
         
              जिनके विचार बदले और जिन्होंने अपने बदले विचारों के लिए सर्वस्व स्वाहा कर देने का संकल्प लिया, उसके लिए मिटे-मरे क्या वे एक समय इसी धर्म-संस्कृति का हिस्सा नहीं थे???
       
              इसलिए चर्चा जरूरी है, उसका सही संदर्भ भी जरूरी है। चर्चा अभी पूरी नहीं हुई, अधूरी है!....चर्चा हर विषय पर जरूरी है, रहेगी! चर्चा कीजिए!....★★★

Comments

  1. आज धर्म की चर्चा तो हर कोई करना चाहता है ।किन्तु धर्म के वास्तविक अर्थ को जानने के लिए कोई प्रयास नहीं करना चाहता।

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  2. बिलकुल। इसीलिए धर्म कुधर्म होता जा रहा है जबकि 'अधर्म का नाश हो!'... का नारा लगाया-लगवाया जाता है!

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