जंतर-मंतर:


                  हर दिन अस्वीकार और क्षोभ का मंजर
                      

भारतीय सत्ता के केंद्र दिल्ली में एक स्थान है- जंतर-मंतर! वैसे तो यह जंतर-मंतर महाराजा जयसिंह द्वितीय द्वारा समरकंद के रिगिस्तान स्थित एक वास्तु को टक्कर देने के लिए 1724 ई. में बनवाया गया, किन्तु यह दिल्ली के एक अजूबे के रूप में ही ज़्यादा विख्यात रहा है। आज इस स्थान की प्रसिद्धि 'धरना-प्रदर्शन स्थल' के रूप में ही ज़्यादा है। यहाँ से राजसत्ता के प्रतीक 'संसद' की दूरी ज़्यादा न होने के कारण ऐसा मान लिया जाता है कि सत्ताधारी लोग यहाँ आई जनता के आवाज़ को सुन लेंगे, समझ लेंगे और शायद समस्याओं का समाधान भी कर देंगे! लोकतंत्र में जनता अपनी आवाज़ उठाने के सिवा और कर भी क्या कर सकती है?...इसलिए जब देश के विभिन्न भीतरी भागों में जनता की समस्याओं की सुनवाई नहीं होती तो मजबूर होकर वह लोकतंत्र के सबसे बड़े प्रतीक संसद के समक्ष अपना दुखड़ा सुनाने आती है। पिछले कुछ समय से शासकों को शासितों का यह रवैय्या ठीक नहीं लग रहा और वे किसी न किसी बहाने जनता को यहां आने और उन्हें 'डिस्टर्ब' करने से रोकना चाहते हैं!...
            फ़िलहाल जंतर-मंतर अभी 'लाइव' है और धरना-प्रदर्शन का केंद्र बना हुआ है।

            जनता की समस्याओं पर शासकों का रवैया इन प्रदर्शनों से ज़्यादा बदलता है, यह तो नहीं देखा गया पर वे इससे बेनक़ाब होते हैं, जनता में उनके प्रति निराशा और आक्रोश फैलता है, यह प्रभाव जरूर पड़ता दिखता है। सार्वजनिक-शिक्षा को निजीकरण की मार से बचाने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय सहित देश के अनेक प्रसिद्ध संस्थानों और संगठनों ने पिछले कई महीनों से इसके लिए मुहिम चला रखी है। देखा यह गया है कि जब-जब किसी बड़े प्रदर्शन की घोषणा होती है, सातवें वेतन आयोग के लागू करने सम्बन्धी कोई न कोई सरकारी बयान या सूचना जरूर आ जाती है। केंद्रीय विश्वविद्यालयों और संस्थानों में सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा इसका एक उदाहरण है। यद्यपि यह घोषणा अपर्याप्त मानी गई पर जंतर-मंतर का कुछ प्रभाव तो पड़ा ही।
         उम्मीद करना चाहिए कि जंतर-मंतर और उसका प्रभाव 'लाइव' ही रहेगा! ■■■

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