कहानी: 'दुर्गा'- सत्यवीर सिंह
🔵 दुर्गा...🔵
-सत्यवीर सिंह
रसोई से बर्तन खड़कने की आवाज़ आ रही है. आज लेकिन कुछ अलग आवाज़ क्यों आ रही है? अच्छा, बाई जैसे किसी बच्चे से बात कर रही है, बीच बीच में डांटती है , हंसती भी है. ये दुर्गा आज बच्चा किसका ले आई ? देखें ! ये क्या , दुर्गा बच्चे से बातें किये जा रही है, हंस भी रही है लेकिन आँखों से आंसू बह रहे हैं, प्लेट पर ऐसे हाथ फेर रही है मानो बच्चे के सर पर हाथ फेर रही हो, दुलार रही हो. बोल समझ नहीं आ रहे, कैसे आएंगे, मुझे बंगला कहाँ आती है और दुर्गा को बंगला के सिवा कुछ नहीं आता , वो तो हिंदी भी बंगला में ही बोलती है. ऐसी खोई हुई है की उसे मालूम भी नहीं, मैं उसके नज़दीक खड़ा हूँ . बाई-बाई, किससे बातें हो रही हैं, ये क्या गाना गा रही हो? दुर्गा चौककर जोर से हंसी लेकिन आँखों से आंसू उससे भी जोर से बहे. मांतू से बात कर रही थी, अपने पोते से! आज के दिन पैदा हुआ था. पूरे आठ साल का हो गया. मुझे याद है. स्कुल जाता है. मेरी रोज़ बात होती है, रोज़ मिठाई मांगता है, रोज़, कहकर, बैठ गई. खुद बच्चे की तरह देर तक सुबकती रही. आज फिर वही कहानी सुनाना चाहती है जिसे वो कई बार सुना चुकी है लेकिन ना मेरा सुनने से मन भरा है ना उसका सुनाने से. तुम अपना घर बार छोड़कर इतना दूर कैसे आए, बाई? मेरा सवाल सुनकर दुर्गा पालथी मार कर बैठ गई, दुनिया जहान से बेख़बर.
मुर्शिदाबाद के मज़दूर टोला में रहते थे हम. किसना के बाबा जूट कारखाने में काम करते थे. पूरी गली में हमारे घर में सबसे पहले इंटा का घर बना था. किसना उसी घर में पैदा हुआ था. किसना के बाबा की उमर जाने की नहीं थी लेकिन क्या करते, मारवाड़ी का जूट कारखाना बंद पड़ा और इन्हें बीमारी ने घेर लिया. खांसी रहने लगी, खांसी जान लिए बगैर नहीं गई. दिनभर हंसने हंसाने वाला किसना गुमसुम रहने लगा, रोज़ सुबह काम की तलाश में जाता. कुछ भी पूछने पर बरस पड़ता. काम मिलता लेकिन कुछ दिन का. अब वो बोलता नहीं था, बस चिल्लाता था. चैन हमारे घर से हर रोज़ दूर जाता जा रहा था. रोज़ झगड़े, गालियाँ, मार पिटाई. कलह का हमारे घर से गहरा नाता बन गया. मुझे कई दिन से बुखार था. किसना खुद ही बोला था, मा, मैं दवा ले आऊंगा. उस दिन वो देर से घर लौटा था. दवा लाया क्या, मैंने पूछा? किसना और बहु जोर जोर बोल रहे थे. कुछ देर बाद मैंने फिर पूछा, अरे किसनवा, दवा लाया या नहीं? क्या दवा दवा लगा रखा है! बच्चा बीमार है, तुझे दवा की पड़ी है. किसकिस का देखूं, क्या करूँ, मुझसे नहीं होता. मर क्यों नहीं जाती. अपना घर देखूं या तुझे. जब देखो दवा-दवा. चल यहाँ से. उसने मेरा हाथ पकड़ के खींचा, घसीटता हुआ घर से बहार धकेल दिया और दरवाज़ा ज़ोर से बंद कर लिया. मुझे कुछ भी नहीं समझ रहा था, लगा जैसे मुझे चक्कर आ रहा है. धरती जोर जोर घूम रही थी. ना जाने कब मुझे नींद आ गई. घर से कोई आवाज़ नहीं थी. नींद खुली तो कुत्ते जोर से भोंक रहे थे. रात ढलाव पर थी. मुझे लगा गुस्से में था आएगा हाथ जोड़ने. एक बार सोचा दरवाज़ा पिटूं. फिर मेरे दिल से आवाज़ आई, ना, ये नहीं करुँगी. मर जाऊँगी पर बिन बुलाए घर में पांव नहीं धरुँगी. बड़ी मुसीबत छोटी को दबा देती है. बुखार कहाँ गया मालूम नहीं पड़ा. कुछ देर उंघती पड़ी रही तभी टांगों में जोर ताक़त महसूस हुई. मैं उठी और स्टेशन की ओर चलती गई. जो गाड़ी आई, चढ़ गई. अगले दिन शाम को खूब बड़े स्टेशन पर गाड़ी रुक गई. खूब भीड़. धक्का मुक्की. कुली बोला कलकत्ता स्टेशन है. जोर की भूख लगी थी पर मैंने भीख नहीं मांगी. सामने एक होटल था वहां बिन पूछे बर्तन धोने लगी. महिनाभर रही फिर एक बाई के साथ दिल्ली फिर फरीदाबाद पहुँच गई.
-और उसी बेटे को अब २५०० रु हर महीने भेजती हो जिसने बुखार में धक्के माकर घर से निकला था? मैंने गुस्से में बोला. किसना ऐसा लरका नहीं है. बाप जल्दी चला गया. उसकी उमर ही क्या थी. काम नहीं-धंधा नहीं. क्या करता? कहीं बैठकर पीकर आया था उस रोज़. पूरे एक साल बाद आया था, मिलने . देखते ही बिलखकर रो पड़ा बिलकुल बच्चे की तरह. मेरे पांव पकड़कर बैठ गया. मुझे माफ़ करदे मा. मुझसे बहुत पाप हो गया. मुझे रोज़ तेरी याद आती है मा. तू घर चल. क्या करता काम नहीं मिल रहा था. मैं कुछ भी करने को तैयार था. दवा को पैसे नहीं थे. रमलू ने पीने को बिठा लिया. मुन्ना की दवाई को भी पैसे नहीं बचे. मुझे माफ़ करदे मा. मैं उसके बालों में हाथ फेरती थी वो चुप नहीं हो रहा था. झुग्गियों के सब लोग जमा हो गए थे. मरे पांव नहीं छोड़ता था. मेरे साथ चल मा. मुझे माफ़ कर दे. वहां सब तुझे पूछते हैं. सारी रात बतियाता रहा. तुझे लिए बिना नहीं जाऊंगा. तीन दिन रहा. फिर खुद मेरे कपडे झोले में रखके खड़ा हो गया. अब चल मा, देर हो रही है. मेरा तो अब ये ही घर है बेटा. मैं तो अब अपनी इसी झुग्गी में मरूंगी. उसने बहुत जिद की, मैं नहीं गई. मेरा किसना बुरा नहीं है. करता क्या बेचारा. हां, एक बात ज़रूर कहूँगी, वो मुझे कहता, काम नहीं मिल रहा. उसका बाप मरा था, मां नहीं मरी थी. हिम्मत कर उसे डांट के घर भेजा. जा, मुन्ना और बहु अकेले हैं. फिर जब जी करे आ जाना.
खूब रौला है, आज फिर लगता है झुग्गियों में कोई पीकर दंगा कर रहा है. शोर कम नहीं हो रहा. अरे ये तो अपनी दुर्गा की आवाज़ है. ये इतना चीख़ क्यों रही है. जाके देखा जाए. अरे, ये तो पुलिस है, साथ में बुलडोज़र और तोड़फोड़ अमला. उस दिन मालूम पड़ा झुग्गियों में इतने लोग रहते हैं. सब घबराए हुए, चिल्लाते हुए, हम कहाँ जाएँ, कहीं नहीं जाएँगे हम. दरोगा अपनी जिप्सी से बाहर निकल कर रॉब से बोल रहा है. तुम लोगों को कितने नोटिस दिए जा चुके हैं, अपना सामान लेकर निकल जाओ, ये झुग्गियां तोड़ी जाएंगी. ये सब गैरकानूनी हैं. ये फोरेस्ट लैंड है. “ये फोरेस्ट लैंड है और फोरेस्ट तुम्हारे बाप का है.” दुर्गा अपनी झुग्गी से चीखते हुए बाहर निकली. उसके हाथ में खुखरी थी. दुर्गा का ऐसा विकराल रूप किसी ने नहीं देखा था. ये तेरे बाप की ज़मीन है. हम दो सौ लोग रह रहे हैं ये फोरेस्ट है. ये गैरकानूनी है! ये जो दिल्ली की पहाड़ी वाली सड़क के दोनों ओर महल बने खड़े हैं, जहा शादियों के तमाशे होते हैं, वो फोरेस्ट नहीं है. वो क्या लगते हैं तेरे. असल बाप का है तो उन्हें उन्हें तोड़के आ. हमारे तो चार कपडे, चार बर्तन हैं लेके चले जाएँगे. “ये पागल है क्या?” दरोगा गुर्राया. हाँ मैं पागल हूँ, मेरा बाप भी पागल था, उसका बाप भी पागल था. पागल हैं तब ही रात दिन खटते हैं और नाले के किनारे मछरों के साथ झुग्गियों में रहते हैं, पागल ही तो हैं. जो पागल नहीं हैं वो कोठियों में रहते हैं गाड़ियों में घूमते हैं. बोल दुर्गा के सिर्फ़ मुंह से ही नहीं निकल रहे थे, उसका रोम रोम चीख़ रहा था. मुंह से झाग आ रहे थे. वो एक मानव बम सी नज़र आ रही थी, फटने को तैयार. हाथ में खुखरी लहराती पुलिस जीप की ओर बढ़ रही थी. हम सब पागल हैं, पागलों को मत छेड़ो, भसम हो जाओगे. कोई कहीं नहीं जाएगा रे, आज यहीं फैसला होगा. अदालत यहीं लगेगी. कौन पागल है आज ये फैसला होना है, दुर्गा ललकार रही थी. सारी मज़दूर बस्ती अब संकरी की आवाज़ में आवाज़ मिला रही थी. हम यहीं जिएंगे, यहीं मरेंगे. दरोगा जी के, माथे पे पसीना नज़र आने लगा था, चहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. हाथ से बुलडोज़र और अमले को वापस लौटने का इशारा करते हुए जीप की सीट पर टिक लिए. ★★★

कोई भी महिला दुर्गा बन सकती है। बस अपने अंदर दबी हुई शक्ति को पहचानना होगा।बस फिर क्या होगा-- एक नया सबेरा ,एक नयी दुनिया ।न कोई अबला बस सब सबला ही सबला।
ReplyDeleteजी!...लगता है बढ़ती विषमताओं से अब 'दुर्गाएँ'ही निपटेंगी!
ReplyDeleteदुर्गा की कहानी करोड़ों लोगों की कहानी है।बेरोजगारी के कारण लोगों की आर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि जीवन- यापन करना मुश्किल हो गया है। कितने ही किसना रोजगार की तलाश में इधर-उधर भटकते है।
ReplyDeleteबिलकुल सही कह रहे हैं राकेशजी!...जब तक किसान जैसे लोग दर-दर भटकते, ठोकरें खाते और अकारण मरते रहेंगे...दुर्गा का 'पागलपन' क्या रूप ले लेगा, कहा नहीं जा सकता!...क्योंकि वह पागल नहं देश के सबसे मेहनती और ईमानदार लोगों की प्रतीक है!
ReplyDeleteअशोक प्रकाश जी हम आप के आभारी है
ReplyDeleteआप का लेख जन चेतना की संघर्ष मे मील का पत्थर साबित होगा
क्रान्तिकारी अभिनन्दन